मतदान कल, प्रचार थमा, धड़कनें बढ़ीं

झाबुआ विधानसभा के 336 मतदान केंद्रों पर लगभग 3000 पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई है। 61 मतदान केंद्र संवेदनशील माने गए हैं लेकिन दोनों ही दलों को एक-एक वोट की चिंता है। अब तक चुनाव में पेज प्रभारी बनते आए हैं लेकिन झाबुआ में आधा पेज के प्रभारी बनाए गए। माइक्रो मैनेजमेंट के चलते बाहर से भी उन मतदाताओं को झाबुआ में वापस बुलाया गया है जो पढ़ाई या रोजगार के सिलसिले में शहर से बाहर थे। आदिवासी बहुल झाबुआ विधानसभा में दोनों ही दलों के नेताओं में पिछले 1 महीने से डेरा डाले हुए थे। शुरुआती दौर में जहां कांग्रेस प्रत्याशी पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया की मजबूत स्थिति मानी जा रही थी लेकिन जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ा वैसे-वैसे भाजपा प्रत्याशी भानु भूरिया मुकाबले में आ गए।

कांग्रेस की ओर से जहां मुख्यमंत्री कमलनाथ के साथ-साथ लगभग एक दर्जन मंत्री झाबुआ में प्रतिष्ठा की जंग लड़ रहे हैं वहीं भाजपा ने भी अपने पूरे संगठन को दांव पर लगा दिया है। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर और प्रहलाद पटेल के भी क्षेत्र में दौरे कराए गए। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने अपने भाषणों के माध्यम से मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को प्रभावित करने की कोशिश की वहीं पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रोड शो, सभाएं करने के साथ-साथ अंतिम दिन कांग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया के गांव में रात्रि विश्राम करके चुनाव प्रचार के तमाम हथकंडे को आजमाया।

बहरहाल झाबुआ विधानसभा का चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि इसके परिणाम से प्रदेश का राजनैतिक वातावरण प्रभावित होगा। कांग्रेस जहां यह चुनाव जीतकर ना केवल अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार कहलाने का गौरव प्राप्त करेगी वहीं प्रदेश में वातावरण बनाएगी कि 10 महीने के कार्यकाल में कमलनाथ ने प्रदेशवासियों का दिल जीता है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने चुनाव प्रचार के अंतिम दिन शनिवार को एक सभा को संबोधित करते हुए आम जनता से भूरिया के नाम और मेरे काम पर वोट देने की अपील की। इस दौरान उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर भी जमकर हमले किए जिसमें उन्होंने यहां तक कहा कि 15 वर्षों तक झूठ बोलने की आदत पड़ गई है जो आसानी से नहीं जा रही। कहते हैं किसानों का कर्ज माफ नहीं हुआ जबकि किसानों का प्रदेश में कर्जा माफ हुआ है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता ने पहले प्रदेश से बाहर किया है अब झाबुआ की जनता बाहर करेगी। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने संगठन की जमावट कुछ इस तरह से की है जिसमें पार्टी अपने पक्ष के अधिकतम वोट डलवा सके। भाजपा ने चुनाव को युवाओं का चुनाव बनाने की भी पूरी कोशिश की है जबकि कांग्रेस ने सहानुभूति बटोरने के लिए कांतिलाल भूरिया का यह अंतिम चुनाव कहकर वोट मांगे हैं।

कुल मिलाकर चुनाव भले ही लो प्रोफाइल स्टाइल में लड़ा गया हो लेकिन दोनों ही दलों ने अंदरूनी तौर पर चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी है लेकिन झाबुआ के बारे में पूर्व अनुमान लगाना आसान नहीं है। 2015 में झाबुआ लोकसभा के उपचुनाव में जिस तरह से तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा ने अपनी पूरी ताकत लगाई थी इसके बाद भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। उस समय कांग्रेस के तमाम क्षत्रप नेताओं ने अपने समर्थकों के साथ दिन-रात मेहनत की थी। परिस्थितियां पलटी हैं। इस समय कांग्रेसी सरकार के मंत्री जहां एक पखवाड़े से डेरा डाले हुए हैं वहीं भाजपा के नेता भी अपने-अपने स्तर पर अपने-अपने प्रभाव वाले इलाके में सक्रिय रहे। झाबुआ किस दल के खाते में जाएगा यह तो 24 अक्टूबर को ही पता चलेगा लेकिन 21 अक्टूबर को जो भी दल अपने वोट डलवाने में सफल हो जाएगा उसकी दिवाली पहले ही मनाई जाएगी।

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