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विवादों में क्यों रहता है जे.एन.यू.?

देश के विवादित विश्वविद्यालयों में से एक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जे.एन.यू.) वापिस गलत कारणों से चर्चा में है। यह स्थिति तब है, जब भारतीय करदाताओं की गाढ़ी कमाई पर शत-प्रतिशत आश्रित और 8,500 छात्रों से सुसज्जित जे.एन.यू. पर औसतन वार्षिक 556 करोड़ रुपये, अर्थात् प्रति एक छात्र 6.5 लाख रुपये का व्यय होता है। इससे भी बढ़कर, यह संस्था दक्षिण दिल्ली स्थित एक हजार एकड़ की बहुमूल्य भूमि पर निर्मित है और सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त है।

जेएनयू में 5 जनवरी को हुई हिंसा, जिसमें कई छात्र और प्राध्यापक घायल हो गए- उसके पीछे शुल्क वृद्धि विरोधी वह छात्र-आंदोलन है, जिसमें वामपंथियों द्वारा संचालित जेएनयू छात्रसंघ शनिवार (4 जनवरी) को परीक्षा का बहिष्कार करने हेतु विश्वविद्यालय के ‘सर्वर रूम’ को नुकसान पहुंचाते हुए उसे ठप कर देता है। इस दौरान वहां उपस्थित सुरक्षाकर्मियों से मारपीट भी की जाती है। पुलिस ने इस संबंध में छात्रसंघ अध्यक्ष के खिलाफ सहित कुल तीन प्राथमिकियां दर्ज की है।

इस घटनाक्रम पर कांग्रेस, तृणमूल सहित अधिकांश स्वयंभू सेकुलरिस्ट दल यह स्थापित करना चाह रहे है कि जे.एन.यू. का संकट मोदी सरकार की देन है। क्या वाकई ऐसा है? इस विश्वविद्यालय की स्थापना 1969-70 में हुई थी, उसके बाद से ही यह कई विवादों, शिक्षकों/कुलपति से अभद्र व्यवहार और हिंसक आंदोलन का साक्ष्य बन चुका है। इस विश्वविद्यालय में छात्रों का सबसे उग्र प्रदर्शन वर्ष 1980-81 के कालखंड में तब हुआ, जब छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे राजन जी. जेम्स को तत्कालीन कार्यकारी कुलपति के.जे. महाले को अपशब्द कहने पर निलंबित कर दिया था।

उस समय स्थिति इतनी बिगड़ गई कि तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार को 16-नवंबर-1980 से 3-जनवरी-1981 के बीच इस विश्वविद्यालय को 46 दिनों तक लगातार बंद करना पड़ा था। इस दौरान आंदोलित छात्रों (निष्कासित और निलंबित छात्र सहित) से छात्रावास खाली कराने हेतु पुलिसबल की सहायता लेनी पड़ी थी, जिसमें जेम्स सहित कई छात्रों के कमरों के दरवाजे तोड़ते हुए पुलिस को अंदर घुसना पड़ा। इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट अंग्रेजी पत्रिका इंडिया टुडे के 15 फरवरी 1981 को प्रकाशित अंक में उपलब्ध है, जिसे पाठक इंटरनेट पर आसानी से खोज भी सकते है। ऐसा नहीं कि यह विश्वविद्यालय इस घटना से पहले और बाद में फिर अशांत ही नहीं हुआ। वर्ष 1974 में यह संस्था अपने अस्तित्व में आने के छह वर्ष के भीतर ही इतिहास विषय में छात्र प्रवेश को लेकर हुए विवाद के कारण कुछ समय के लिए बंद हो गया था। उस समय इसकी कुलाधिपति देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी थीं। इस घटना से वह इतनी क्षुब्ध हुई कि उन्होंने इस विश्वविद्यालय से नाता ही तोड़ लिया और कुलाधिपति पद से इस्तीफा दे दिया। स्थिति तब भी अपरिवर्तित रही और वर्ष 1979 में यहां के भाषा विभाग को छात्रों ने एक महीने के लिए इसलिए ठप कर दिया, क्योंकि शिक्षकों ने 35 असक्रिय छात्रों को कक्षा से बाहर निकाल दिया था।

जेम्स घटनाक्रम के बाद वर्ष 1983 में जेएनयू स्थित एक कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके संबोधन का छात्रों ने जमकर विरोध किया। बताया जाता है कि इन नारेबाजियों को देश की जनता ने रेडियो पर भी सुना था। तब 300 से अधिक छात्रों को गिरफ्तार करके तिहाड़ जेल भेज दिया गया था। उसी वर्ष दुर्व्यवहार के अन्य मामले में तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष एन.आर. मोहंती सहित दो छात्र के निष्कासन पर विवाद इतना बढ़ा कि पुलिस को हिंसक जेएनयू छात्रों पर लाठीचार्ज करना पड़ा। उस समय 700 छात्रों को जेल जाना पड़ा था, जिनमें प्रख्यात अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी भी शामिल थे, जिन्हे गत वर्ष ही नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के समय जेएनयू छात्रों द्वारा भारतीय सुरक्षाबलों को अपशब्द कहना, 2010 के दंतेवाड़ा नक्सली हमले में 76 सी.आर.पी.एफ. जवानों के नरसंहार का जश्न मनाना, 2016 को ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे…इंशा अल्लाह…इंशा अल्लाह…’ जैसे नारे लगाना, गत वर्ष नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अयोध्या स्थित रामजन्मभूमि पर आए निर्णय के खिलाफ प्रदर्शन करना और अब शेष जेएनयू छात्रों से परीक्षा का जबरन बहिष्कार करवाने हेतु विश्वविद्यालय के सर्वर रूम को क्षति पहुंचाना- यह सब इसे देश का सबसे विवादित विश्वविद्यालय बना देता है।

आखिर वह कौन-सी मानसिकता है, जो जेएनयू में छात्रों के एक गुट को हिंसक आंदोलन हेतु प्रेरित करता है? इस प्रश्न का उत्तर जेएनयू के इतिहास में निहित है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना 16 नवंबर 1966 को संसद के एक अधिनियम द्वारा की गई थी, जिसे ढाई वर्ष पश्चात 22 अप्रैल 1969 को लागू किया गया। देश के शिक्षा मंत्री रहे प्रख्यात न्यायविद् मोहम्मदाली करीम छागला ने सितंबर 1965 को सर्वप्रथम राज्यसभा के समक्ष इस शिक्षण संस्थान की अवधारणा को प्रस्तुत किया था। उस समय गरीबों, वंचितों और पिछड़ों को आधुनिक विषयों में न्यूनतम शुल्क पर उच्च शिक्षा, छात्रावास आदि सुविधा देने के साथ इस संस्था को भारत को पुन: विश्वगुरु के रूप में पुनर्स्थापित करने के दिशा में प्रारंभिक सोपान बनाना- इस विश्वविद्यालय का प्रारंभिक मुख्य उद्देश्य था। किंतु नियति कुछ और ही स्वीकार था।

जिस परिकल्पना के साथ जेएनयू को प्रारंभिक आकार दिया गया, वह दुर्भाग्यवश कालांतर में विदेशी, भारत विरोधी, सनातन संस्कृति और बहुलतावादी परंपराओं से घृणा करने वाली वामपंथी विचारधारा का प्रमुख प्रयोगशाला बन गया। यही कारण है कि यहां छात्रों और प्राध्यापकों का एक वर्ग लेनिन, स्टालिन और माओ इत्यादि जैसे क्रूर शासकों को अपना प्रेरणास्रोत मानता है, जिनका चिंतन मानवाधिकार और असहमति के प्रति असहिष्णु रहा है। यह इसलिए भी स्वाभाविक है, क्योंकि वामपंथ के केंद्र में ही हिंसा और विरोधी स्वर का गला घोटना है।

जेएनयू की इस स्थिति का कारण 1970 के दशक का वह कालखंड है, जब तत्कालीन इंदिरा सरकार में देश के अति-महत्वपूर्ण शिक्षा मंत्रालय का कार्यभार वामपंथी नुरुल हसन को सौंप दिया। यह सब एकाएक नहीं हुआ। भारतीय लोकतंत्र के आधुनिक इतिहास में यह उस संवेदनशील दौर का परिणाम था, जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व में गांधीजी के सनातन और राष्ट्रवादी चिंतन को अंतिम तिलांजलि देकर वामपंथी बौद्धिकता को आउटसोर्स कर लिया था। यह सब आसान भी था, क्योंकि इंदिरा गांधी भी अपने पिता पं.नेहरू की भांति सोवियत संघ और वाम-समाजवाद से प्रभावित थी।

इंदिरा गांधी की अधिनायकवादी मानसिकता ने जब 1969 में कांग्रेस का विभाजन किया, तब उन्हे अपनी राजनीति और अल्पमत सरकार को जीवित रखने के लिए संसद के भीतर और बाहर कम्युनिस्टों का समर्थन लेना पड़ा। इसका परिणाम यह हुआ कि बड़ी संख्या में सक्रिय कम्युनिस्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इंदिरा गुट वाले कांग्रेस में व्यवस्थित रूप से घुसपैठ कर पार्टी को उसकी मूल गांधीवादी विचारधारा से पूरी तरह अलग कर दिया। बतौर शिक्षा मंत्री, नुरुल हसन ने अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि के अनुरूप अन्य महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थानों के साथ “नवजात” जेएनयू के लगभग सभी विभागों में उन वामपंथी विचारकों, प्राध्यापकों और शिक्षाविदों की नियुक्तियां कर दी, जिनके वरिष्ठ वैचारिकों ने पाकिस्तान के जन्म में मुस्लिम लीग और अंग्रेजों की सहायता की थी।

अब नुरुल हसन के कार्यकाल में चूंकि विश्वविद्यालय में छात्रों के प्रवेश और कालांतर में सभी संस्थागत नियुक्तियों पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार वामपंथी कुनबे के हाथों में था, तब यहां छात्रों सहित उन लोगों की संख्या लगातार बढ़ती गई, जो विशुद्ध वामपंथी थे या फिर जिनसे वैचारिक समायोजन करना स्वाभाविक था। इसी कारण यह विश्वविद्यालय कालांतर में न केवल राष्ट्र-हिंदू विरोधी का गढ़ बना गया, साथ ही पाश्चात्य संस्कृति से ग्रस्त होकर और विदेशी शक्तियों के बल पर सत्ता विरोधी गतिविधियों का मुख्य केंद्र भी बन गया।

वामपंथ का चरित्र कैसा है? यदि इसे सरल भाषा में समझा जाए, तो वह भारतीय वांग्मय में उस साधु (छद्म-सेकुलरवाद) के भेष आए रावण की तरह है, जो बहलाने-फुसलाने के बाद सीता (जनता) का अपहरण कर लेता है और बाद में जनता, सीता की भांति उसकी कैद में असहाय हो जाती है। इसी तरह पश्चिमी काल्पनिक साहित्य “सिंदबाद जहाजी” की कहानी में वामपंथी उस दुष्ट व्यक्ति की भांति है, जो शारीरिक रूप से अक्षम होने का स्वांग रचता है और समुद्र में तहस-नहस हुई अपनी नाव से जान बचाकर एक टापू पर पहुंचे नाविक सिंदबाद से नदी पार करवाने हेतु मदद मांगता है। उसके जाल में फंसने के बाद सिंदबाद उसकी सहायता तो करता है, किंतु वह दुष्ट व्यक्ति बाद में उसका शोषण करते हुए न केवल नीचे उतरने से मना कर देता है, साथ ही उसका निर्देश नहीं मानने पर सिंदबाद का गला भी दबाने लगता है। यही वामपंथ का वास्तविक चेहरा है।

इस पृष्ठभूमि में जेएनयू में भारत की सनातन संस्कृति से घृणा करने वालों, भारत को कई राष्ट्रों का समूह मानने वालों, नक्सलवाद समर्थक और अलगाववादी व जिहादी मानसिकता के प्रभावशाली पैरोकारों का जमावड़ा- भारत की संप्रभुता, एकता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है।

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