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कांग्रेस नेतृत्व बदलें या खुद बदले

बलबीर पुंज

हाल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने वक्तव्य दिया। वह कहते हैं, “कांग्रेस को आत्म-अवलोकन की आवश्यकता है।” सिंधिया से पहले सलमान खुर्शीद, संजय निरुपम, अशोक तंवर भी लगभग इसी प्रकार के विचार रख चुके है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि कांग्रेस निर्विवाद रूप से भारी अंतर्विरोध और एक संवेदनहीन व लचर नेतृत्व के कारण अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। आखिर 134 वर्ष पुरानी राजनीतिक पार्टी, जिसने स्वतंत्र भारत के 72 वर्षों में 50 साल देश पर प्रत्यक्ष शासन किया- वह आज आई.सी.यू. में कैसे पहुंच गई?

उपरोक्त पृष्ठभूमि में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के हवाले से आई एक खबर महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसके अनुसार पार्टी निकट भविष्य में अपने कार्यकर्ताओं के लिए शिविर लगाएगी, जिसमें उन्हे राष्ट्रवाद का प्रशिक्षण दिया जाएगा। सही है कि कांग्रेस को राष्ट्रवाद का पाठ पुन: पढ़ने की आवश्यकता है। दशकों से पार्टी पर एक वंश का वर्चस्व है, जो “गांधीवाद” (महात्मा गांधी) ब्रैंड का एकलौता वारिस होने का दावा भी करता है। किंतु पिछले कुछ दशकों में कांग्रेस के “गांधीवाद” में भयंकर मिलावट हुई है। अर्थात्- बाहरी मुखौटा गांधी जी के दर्शन का, तो आंतरिक चरित्र वंशवाद से जनित विशुद्ध अवसरवादी, राष्ट्रविरोधी और वामपंथी। अर्थात- खाने के दांत और दिखाने के और।

गांधीजी जीवनपर्यंत लालच और भय से जनित मजहबी मतांतरण के खिलाफ लड़ते रहे। इस पृष्ठभूमि में कांग्रेसी नेताओं को अपने दिल पर हाथ रखकर पूछने की आवश्यकता है कि क्या श्रीमती सोनिया गांधी के कांग्रेस में उदय होने और उनके नेतृत्व में पार्टी द्वारा संचालित राज्यों में प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से मजहबी मतांतरण को प्रोत्साहन नहीं मिला है?

बापू आस्थावान हिंदू थे, जिनका मानस विशुद्ध रूप से सनातन संस्कृति और बहुलतावादी परंपराओं से प्रेरित था। उनके जीवन का आधार प्रभु श्रीराम रहे। इसी कारण वह एक आदर्श, न्यायप्रिय और सुशासन व्यवस्था की कल्पना में रामराज्य के रूप में देखते थे। कहा जाता है कि अंतिम समय में उनके मुख से “हे!राम” निकला था। इस पृष्ठभूमि में क्या यह सत्य नहीं कि संप्रगकाल (2004-14) में श्रीमती सोनिया गांधी के परोक्ष नेतृत्व में सर्वोच्च न्यायालय में हलफमाना देते हुए प्रभु श्रीराम को काल्पनिक बताकर उनके जीवनकाल में निर्मित रामसेतु को तोड़ने प्रयास किया था?

यह भी सच है कि असंवैधानिक रूप से गठित “राष्ट्रीय परामर्श समिति” (एन.ए.सी.), जिसकी अध्यक्षता स्वयं सोनियाजी कर रही थीं- की संस्तुति पर तत्कालीन मनमोहन सरकार बहुसंख्यक विरोधी सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम (न्याय और क्षतिपूर्ति) विधेयक लेकर आई थी, जिसके माध्यम से हिंदुओं को अपने देश में दोयम दर्जे का नागरिक बनाने का षड़यंत्र रचा गया।

उसी दौर में इस्लामी आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति रखते हुए और आंसू बहाते हुए मिथक “हिंदू आतंकवाद” का हौव्वा खड़ा किया गया। जब वर्ष 2008 में दिल्ली स्थित जामिया नगर के बाटला हाउस में आतंकियों से पुलिस की मुठभेड़ हुई, जिसमें दो आतंकी मार गिराए गए थे और एक पुलिस अधिकारी शहीद हुआ था- तब पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने जहां इस मुठभेड़ को फर्जी बता दिया, तो सलमान खुर्शीद ने दावा किया कि मुठभेड़ की तस्वीरें देखकर सोनिया गांधी रो रही थी। यही नहीं, जब उसी वर्ष मुंबई (26/11) में पाकिस्तान से आए आतंकियों ने हमला किया, तब दिग्विजय सिंह ने इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम जोड़कर पाकिस्तान को क्लीन-चिट देने और इस्लामी आतंकवाद के भ्रम घोषित करने का प्रयास किया था। क्या बापू से प्रेरणा प्राप्त करने वाले दल से ऐसे देशविरोधी रवैये की अपेक्षा की जा सकती है?

गांधीजी गौरक्षा सहित अन्य सांस्कृतिक और पारंपरिक विषयों पर किसी भी त्याग के लिए सदैव तत्पर रहते थे और स्वदेशी उनके लिए भारत के विकास का मंत्र था। आज इन सभी विषयों पर आर.एस.एस. और उसके अनुवांशिक संगठनों के अतिरिक्त कोई चर्चा नहीं करता है। प्रतिकूल इसके, वर्तमान कांग्रेस के शीर्ष नेता देश की सनातन परंपराओं का उपहास करते है। इसका उदाहरण- फ्रांस की एक घटना में मिलता है, जिसमें विजयदशमी के दिन भारतीय वायुसेना के पहले राफेल लड़ाकू विमान का रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा किए शस्त्र-पूजन को कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने तमाशा बताया है। यही नहीं, जब वर्ष 2017 में गौरक्षा संबंधित सार्वजनिक विमर्श चरम पर था, तब भी राजनीतिक विरोध के नाम पर केरल स्थित कन्नूर में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के वफादार नेताओं ने न केवल सार्वजनिक रूप से गाय के बछड़े की हत्या की, साथ ही उसके मांस का सेवन भी किया।

राष्ट्रवादी गांधीजी के लिए देशहित, संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि था। किंतु वर्तमान समय में कांग्रेस द्वारा “अस्थायी” अनुच्छेद 370-35ए के संवैधानिक क्षरण का विरोध, “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा..अल्लाह… इंशा..अल्लाह” जैसे नारें लगाने वाले देशविरोधी “टुकड़े-टुकड़े गैंग” का समर्थन, भारतीय सेना के पराक्रम पर सवाल खड़े करना, अलगगाववादी और विभाजनकारी शक्तियों के लिए दिल धड़कना- वर्तमान कांग्रेस की कार्यशैली बन गई है।

आखिर कांग्रेस का मूल गांधीवादी चरित्र कब और क्यों बदला? वर्ष 1948 में गांधीजी की निर्मम हत्या के पश्चात जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरु की छत्रछाया में कांग्रेस आई, तब पार्टी में राष्ट्रवादी और सनातन विचारों का परित्याग औपचारिक रूप से प्रारंभ हो गया। इसका प्रमुख कारण पं.नेहरु का वामपंथी समाजवाद की ओर झुकाव था, जिसका प्रभाव उनकी कश्मीर, पाकिस्तान, चीन, तिब्बत इत्यादि नीतियों में भी दिखा और अब इन सभी का दंश देश दशकों से झेल रहा है।

पं.नेहरु का भ्रम 1962 के युद्ध में चीन के हाथों मिली करारी हार के बाद टूटा, जिसमें वामपंथी शुत्र राष्ट्र के पक्ष में खड़े हो गए थे। परिणामस्वरूप, उन्हे अपनी गलती का बोध हुआ और वर्ष 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में उन्होंने आर.एस.एस. को आमंत्रित किया और संसद में अस्थायी अनुच्छेद 370 को हटाने का वादा कर दिया। किंतु अस्वस्थ होने के कारण उनका मई 1964 में निधन हो गया।

कांग्रेस के बौद्धिक पतन को वर्ष 1969 के बाद और गति मिली, जब आंतरिक कलह के कारण कांग्रेस दो गुटों में बंट गई और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संसद में अपनी अल्पमत सरकार को बचाने के लिए उन वामपंथियों का सहारा लिया- जिसने पाकिस्तान के जन्म में दाई की भूमिका निभाई, स्वतंत्र भारत को कई राष्ट्रों का समूह माना, 1948 में हैदराबाद में भारतीय सेना के खिलाफ जिहादी रजाकारों की मदद की और वर्ष 1967 में भस्मासुर नक्सलवाद को पैदा किया।

उसी दौर में तत्कालीन कांग्रेस और उसके शीर्ष नेतृत्व के वैचारिक-राजनीतिक दर्शन में वाम-चिंतन का कब्जा हो गया। यह आसान भी था, क्योंकि इंदिरा गांधी भी अपने पिता की भांति सोवियत संघ और समाजवाद से प्रभावित थी। वर्ष 1971 में उन्होंने वामपंथी मोहन कुमारमंगलम को मंत्री बनाया। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का देश पर “विशेषाधिकार” होने की विकृत मानसिकता को स्थापित करने में मोहन कुमारमंगलम की भूमिका महत्वपूर्ण थी। वर्ष 1975-77 का आपातकाल उसी मानसिकता के गर्भ से निकला दंश था। आज भी कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इसी मानसिकता से ग्रस्त है।

इसी तरह, 1971 में ही वामपंथी सैयद नुरूल हसन को देश के अति-महत्वपूर्ण शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंप दी। उनके कार्यकाल में शीर्ष शिक्षण नियामक संस्थानों में उन वामपंथियों की नियुक्ति हुई, जो वैचारिक कारणों से इस विशाल भूखंड की वैदिक संस्कृति और परंपराओं से आज भी घृणा करते है। हसन के दौर में ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (1875) की भांति जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (1969) को भी राष्ट्र को भीतर से तोड़ने वाले बौद्धिक हथियार के रूप में तैयार किया गया।

यही कारण है कि जिस इंदिरा गांधी ने राष्ट्रवाद का परिचय देते हुए 1971 में तत्कालीन पाकिस्तान को दो टुकड़ों को बांट दिया था, उन्होंने ही अगले वर्ष शिमला समझौता करके भारत के अभिन्न अंग कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा घोषित कर दिया। यही नहीं, इंदिरा ने 1974-75 में उसी घोर सांप्रदायिक शेख अब्दुल्ला को फिर से जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री बना दिया, जिनके जिहादी एजेंडे को जानकार पं.नेहरु ने वर्ष 1953 में प्रदेश की सत्ता से हटाकर गिरफ्तार करवा दिया था।

इसी दौर से कांग्रेस ने अनुच्छेद 370 पर पं.नेहरू के देश से किए वादे की अनदेखी करते हुए इसे कश्मीर और शेष भारत के बीच का एकमात्र संवैधानिक सेतु बताना शुरू कर दिया, जिसकी कीमत 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन करके चुकानी पड़ी। वाम-कांग्रेस के विभाजनकारी चिंतन ने ही 27 फरवरी 2002 में गुजरात स्थित गोधरा की उस बीभत्स घटना को भी बाबरी मस्जिद विध्वंस की प्रतिक्रिया बताकर सामान्य घटना बताने का प्रयास किया, जिसमें अयोध्या से लौट रही साबरमती ट्रेन की एस-6 बोगी में सवार 57 कारसेवकों को जीवित जला दिया गया था।

सच तो यह है कि कांग्रेस के पास वैचारिक दर्शन के नाम पर अवसरवादी और वामपंथी चिंतन की झूठन बची है। गांधीवाद पर आधारित चिंतन को कांग्रेस दशकों पहले तिलांजलि दे चुकी है और अब वह केवल नेहरू-गांधी परिवार की छायामात्र है। कांग्रेस या तो शीर्ष नेतृत्व को बदल दें, अर्थात्- नया नेतृत्व लेकर आए या फिर वर्तमान शीर्ष नेतृत्व स्वयं को बदल लें, अर्थात- कांग्रेस अपने मूल राष्ट्रवादी चरित्र की ओर लौट आए। क्या वर्तमान परिदृश्य में यह संभव है? मुझे पाठकों के उत्तरों की प्रतीक्षा रहेगी।

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