लोकतंत्र के आंदोलनजीवी और भाषणजीवी

संदीप जोशी : लोकतंत्र को शक्ति उसकी जागरूक जनता से मिलती है। लोकतंत्र की मर्यादाएं सरकार से लेकर हर नागरिक का उत्‍तरदायित्‍व हैं। जो लोकतंत्र सत्‍ता की आजादी सरकारों को देता है, विरोध की वही आजादी नागरिक को भी देता है। जनता द्वारा चुनी गयी सरकार का विरोध भी वही जनता अहिंसक तौर पर कर सकती है। विरोध आंदोलनजीवी करें या भाषणजीवी, वे अहिंसक ही रहने चाहिए। सरकार चाहे या न चाहे, आंदोलनजीवी ही लोकतंत्र की दशा और दिशा तय करते हैं। इसीलिए भाषणजीवी सरकारें लोकतंत्रजीवी समाज को बांट नहीं सकती हैं। आंदोलनजीवी से ही लोकतंत्र जीवंत है। लोकतंत्र से ही भाषणजीवी भी जिंदा हैं।

व्‍यवस्‍थाएं तो व्‍यवहार से ही चलती हैं। कानून बेशक राज से चलाया जाता हो। फिर सवाल उठता है लोकतंत्र क्‍या राज से चलता है या लोक व्‍यवहार से? मान लिया कि भारत एक विशाल लोकतंत्र है जिसमें लोकसम्‍मति बनाने में समय लगता है। लेकिन फिर सरकारों को लोकसम्‍मति बनाने में जुटना चाहिए या लोकमत मिलने पर लोकतंत्र पर लांछन लगने देना चाहिए? लोकतंत्र में लोकमत कैसे लोकसम्‍मति से ज्‍यादा महत्‍व का हो सकता है? अमेरिका में साफ देखा गया कि लोकमत मिलने के बावजूद लोकव्‍यवहार खोने पर कैसे लोकतंत्र ही खतरे में आ सकता है। कुछ वैसी ही नौबत दिल्‍ली में गणतंत्र दिवस पर देखने को मिली।

अपन खेती-किसानी के जानकार नहीं हैं। लेकिन एक बार के लिए मान लेते हैं कि सरकार का खेती कानून किसानों के लिए सुधार लाने वाला है। किसान और किसानी का सुधार इससे ही हो सकता है। यह भी कि किसानी की भलाई के लिए ही सरकार प्रतिबद्ध है। इसलिए सरकार की नैतिकता और निष्‍ठा पर संदेह करना गलत है। फिर पंजाब और हरियाण के ही किसान क्‍यों आंदोलन पर अड़े हैं? मान लेते हैं कि पंजाब हरियाणा को छोड़ कर देश भर के किसान सरकार के खेती कानून का स्‍वागत कर रहे हैं। किसानों को भरमाए जाने की बातें भी की जा रही है। यह जताने की कोशिश हो रही है कि भ्रम तो नदारद, नाकाम विपक्ष फैला रहा है। सत्‍ता में जम कर आने, और पांचों उंगलिया घी में रमने पर भी सरकार के लिए सत्‍ता का ही खतरा क्यों मंडराता दिखाई देता है?

सरकार को यह अधिकार लोकमत ही देता है कि वो लोकसम्‍मति बनाने के लिए समय ले या न ले। ठीक वैसे ही पंजाब और हरियाणा के किसानों को भी अपने लिए लोकसम्‍मति बनाने के लिए समय चाहिए। भारत की जनता को भी समय चाहिए ताकी किसान कानून की नैतिकता और निष्‍ठा समझ सके। लेकिन जब किसी कानून का विरोध हो तो लोकसम्‍मति भी जरूरी हो जानी चाहिए। क्‍योंकि कानून बनाना एक बात है और उन्हें लागू करना बिलकुल दूसरी।

जब जब गांधीजी के सामने विचारों की या उदेश्‍यों की असमंजसता रहती था तो उनका प्रयास होता था ‘’कर के देखने’’ का। यानी किसी भी विचार या भाव को जमीन पर उतार कर ही उसके अच्‍छे-बुरे का निर्णय करना सही रहता है। जिस कानून को सरकार किसान सुधार कानून मान रही है उसे किसान काले कानून कह रहे हैं। ऐसे में जरूरत दोनों को सहनशीलता दिखाते हुए इसके परिणामों का इंतजार करना ही सही हो सकता है। आंदोलन अनंत तक तो नहीं चलाए जा सकते। सरकार ने अनुरोध रखा भी है कि कुछ समय के लिए कानून को टाल सकती है। फिर क्‍यों किसान कानून मान कर उसके परिणामों का इंतजार नहीं कर सकते हैं? दुग्‍ध का दुग्‍ध और पानी का पानी करने के लिए दोनों को एक दूसरे पर विश्‍वास और आशा बनाए रखनी होगी।

लेकिन यह हो पाना मुश्किल लग रहा है। विरोध पर जब राजनीति हावी होती है तो सत्‍ता का अहंकार उभर आता है। यह शुगर के मरीज़ को करेले की सब्‍जी परोसने जैसा है। यह कदम मरीज़ का ध्यान रखने वाला ही माना जाएगा। सरकार खेती कानून को शुगर के मरीज़ वाले किसानों के लिए करेले की सब्जी कह रही है। शरीर को बेशक अच्‍छा करे, मगर मन कड़वा ही रहने वाला है। शुगर की बीमारी का असर तो लंबे समय में देखने में आएगा लेकिन कड़वे मन से तो अभी ही निपटना होगा। शरीर नाम का यंत्र लंबे समय में जर्जर होगा मगर मन कड़वा हुआ तो शरीर को टिकाए रखना कठिन होता जाएगा। फिर क्‍यों सरकार मन के सौहाद्र को आहत कर शरीर का सुधार करने पर आमादा है? और क्‍या जर्जर व्‍यवस्‍था को बिना उसके सौहाद्र की आत्‍मा के चलाया जा सकता है? क्‍यों खेती सुधार कानून को ले कर सरकार इतनी जल्‍दी में दिख रही है?

एक तरफ सरकार मानती है कि चली आ रही संस्‍थाओं को चलाना सरकारी काम नहीं है। इसलिए रेल, एयर इंडिया, एलाआईसी, बीएसएनएल या बीपीसीएल जैसी संस्‍थाएं, जो बरसों से मध्‍यवर्ग का जीवन चलाती आयी हैं उनको बेचने में लगी है। फिर यही सरकार किसानी चलाने पर क्‍यों आमादा है? सेना उपकरणों और लड़ाई के साज़ो-जहाज खरीदने में तो सभी सरकारें लगी रही है। पिछली सरकार धंधेबाजी को ही सरकार चलाना मानती थी, मगर यह सरकार क्‍यों दलाली करने को सरकार चलाना मान रही है? सामाजिक संस्‍थाओं को बेच कर सरकार कैसी सरकार चलाने का उदहारण रख रही है? बेशक संस्‍थाओं का गठन कठिन होता है मगर उनको चलाना क्या उससे भी ज्यादा कठिन होता है? फिर क्‍यों भारत देश राष्ट्र-राज्य और उसके प्रतिष्ठानों को चलाने में सरकार हाथ साफ रखना चाहती है? आखिर सरकार फिर चलाना क्‍या चाहती है?

इसलिए सवाल फिर नैतिकता और निष्‍ठा का उठता है। सवाल आज की राजनीति के निकम्मेपन का भी उठता है। क्यों सैनिकों के प्रति भावनाएं उकसाने वाले किसानों की भावना नहीं समझ पा रहे हैं? और क्यों गणतंत्र दिवस की घटना के बाद किसान अपना आंदोलन वापस नहीं ले सकते? देश की लोकतंत्रजीवी जनता को आंदोलनजीवी और भाषणजीवी दोनों से छुटकारा चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares