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राज्यों के चुनाव का होगा राष्ट्रीय असर

तन्मय कुमार

दो राज्यों महाराष्ट्र और हरियाणा में सोमवार को वोट डाले गए। इन दोनों राज्यों के नतीजे कई तरह से राष्ट्रीय राजनीति की प्रभावित करेंगे। चुनाव में हिस्सा लेने वाली पार्टियों की अंदरूनी राजनीति प्रभावित होगी वो अलग है। लगातार दूसरी बार भाजपा के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव हो रहा है। लोकसभा के साथ जरूर तीन राज्यों- आंध्र प्रदेश, ओड़िशा और सिक्किम में चुनाव हुए थे। वहां के नतीजे भाजपा के लिए बिल्कुल वैसे ही रहे, जैसे 2014 के चुनाव के समय रहे थे। फर्क यह था कि उस समय आंध्र प्रदेश में टीडीपी भाजपा की सहयोगी थी और वह जीती थी। इस बार भाजपा से अलग रही टीडीपी बुरी तरह से हारी और नरेंद्र मोदी के प्रति सद्भाव दिखाने वाले जगन मोहन रेड्डी की पार्टी जीती।

पिछले यानी 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद जिस राज्य में विधानसभा का चुनाव हुआ उसमें से ज्यादातर में भाजपा जीती। दिल्ली और बिहार इसका अपवाद रहे। आमतौर पर लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद अगर किसी राज्य में चुनाव होता है तो वहां मतदाता उसी पार्टी को वोट करते हैं, जिसे उन्होंने लोकसभा चुनाव में किया होता है। 2014 के बाद भी यह ट्रेंड दिखा था और इस बार भी लग रहा है कि ऐसा ही होगा। सामान्य आकलन और राजनीतिक विश्लेषकों व सर्वेक्षण करने वालों की रिपोर्ट बता रही है कि दोनों राज्यों में भाजपा की जीत होगी और पार्टी की स्थिति पहले से मजबूत होगी।

ऐसा होता है तो इससे नरेंद्र मोदी का करिश्मा और बतौर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की स्थिति और मजबूत होगी। दोनों राज्यों में देवेंद्र फड़नवीस और मनोहर लाल खट्टर मजबूत क्षत्रप के रूप में स्थापित होंगे। दूसरी ओर कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों की स्थिति कमजोर होगी। खासतौर से महाराष्ट्र में शरद पवार की पार्टी एनसीपी और हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला की पार्टी इनेलो के लिए मुश्किलें ज्यादा बढ़ेंगी।

इन दोनों राज्यों का विधानसभा चुनाव जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के केंद्र सरकार के फैसले की पृष्ठभूमि में हुए हैं। चुनावों की घोषणा से सिर्फ डेढ़ महीने पहले सरकार ने अनुच्छेद 370 हटा कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटा था। इस तरह भाजपा ने अपना दशकों पुराना एजेंडा पूरा किया था। इसके थोड़े ही दिन बाद असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, एनआरसी की अंतिम सूची आई थी, जिसके बाद भाजपा के नेताओं ने पूरे देश में एनआरसी लागू करने की अपील की। ध्यान रहे हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी अपने यहां एनआरसी लागू करने का वादा किया है।

लोकसभा चुनाव के बाद हुए पहले संसद सत्र में केंद्र सरकार ने तीन तलाक को अपराध बनाने वाले बिल को पास कराया। ये तीनों भावनात्मक महत्व वाले मुद्दे हैं और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील हैं। भाजपा के नेता प्रचार में इन तीनों मुद्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। नतीजों से इस बात की भी परीक्षा होगी कि ये मुद्दे कितने कारगर रहे हैं। भाजपा के लिए इसका आकलन जरूरी है क्योंकि अगले कुछ दिन में दो और राज्यों झारखंड व दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। दिल्ली में भी एनआरसी का मुद्दा अहम होगा और कश्मीर का मसला भी बहुत महत्वपूर्ण होगा।

दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों- कांग्रेस, एनसीपी, इनेलो, जजपा आदि ने स्थानीय मुद्दे उठाए या देश की आर्थिक हालत को मुद्दा बनाया। विपक्षी पार्टियों का जोर इस बात पर रहा कि देश आर्थिक मंदी की ओर बढ़ रहा है, बेरोजगारी बढ़ रही है और कारोबार ठप्प पड़ा है। यह लोकसभा चुनाव में भी एक मुद्दा था पर उसके बाद आर्थिक सुस्ती बढ़ी है। उधर महाराष्ट्र में पीएमसी बैंक के खाताधारकों के पैसे रोके जाने का भी मुद्दा है। विपक्षी पार्टियां कहती रही हैं कि उनके राज्य में अनुच्छेद 370 के मुद्दा का कोई मतलब नहीं है।

नतीजों से पता चलेगा कि स्थानीय मुद्दे हावी रहे या लोगों ने राष्ट्रीय मुद्दों पर ही वोट डाला। ध्यान रहे लोकसभा चुनाव के बाद आर्थिक मंदी की खबरों के बीच भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता कम होने का कोई संकेत नहीं है। भाजपा को इसी पर सबसे ज्यादा भरोसा है। उनको लग रहा है कि दोनों राज्यों की सरकारों की पांच साल की एंटी इन्कंबैंसी मोदी के नाम से ढक जाएगी। ध्यान रहे अगर मोदी का जादू चला और लोकसभा की तरह वोट हुए तो विपक्ष पूरी तरह से उड़ जाएगा।

लोकसभा चुनाव की तरह ही अगर विधानसभा चुनाव में वोटिंग का ट्रेंड रहा तो भाजपा महाराष्ट्र में 225 और हरियाणा में कम से कम 75 सीटों पर जीतेगी। ध्यान रहे महाराष्ट्र में कुल 288 और हरियाणा में 90 सीटें हैं। पर पिछले चुनाव का एक अनुभव यह भी है कि लोकसभा के मुकाबले भाजपा के वोट में दस फीसदी तक की कमी आई। हालांकि दस फीसदी वोट कम हों तब भी नतीजों पर असर नहीं होगा। हां, सीटों की संख्या में फर्क होगा। विपक्षी पार्टियों को अपनी प्रतिष्ठा बचाने लायक सीटें मिल जाएंगी। परंतु उसके बाद की राजनीति कांग्रेस सहित सभी विपक्षी पार्टियों के लिए मुश्किल होगी। महाराष्ट्र की सबसे मजबूत क्षेत्रीय पार्टी एनसीपी के अंदर झगड़ा है तो हरियाणा में भी सबसे मजबूत क्षेत्रीय पार्टी इनेलो बंट गई है। इन दोनों पार्टियों का भविष्य अंधरकारमय हो जाएगा। कांग्रेस के अंदर नेतृत्व को लेकर नए सिरे से सोचा जाएगा। अगर इन दोनों राज्यों में भाजपा बड़े अंतर से जीती तो झारखंड और दिल्ली में भी भाजपा विरोधी पार्टियों के लिए लड़ाई मुश्किल होगी।

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