स्वामी विवेकानन्दः मूर्ति लगाना छोड़ उनकी सीख पर चलें!

 स्वामी विवेकानन्द की प्रतिमा तो अभी तक जेएनयू में स्थापित न हो पाई, पर ढँकी प्रतिमा के अपमान की खबर दुनिया भर में जरूर गई। इस का दोष क्या उन कम्युनिस्टों का ही है, जिनका आज भी जेएनयू में दबदबा है? कुछ पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में भी रातो-रात वीर सावरकर की प्रतिमा लगाकर उस का अपमान कराया जा चुका था। विवेकानन्द और सावरकर जैसे पुरुष-सिंहों की प्रतिमाएं इस तरह चुप-चाप लगाने की कोशिश भी दोषी है। जिन में इतनी बुद्धि औऱ साहस नहीं कि इन मनीषियों की शिक्षा पर चल सकें, वे दिखावे से काम चलाना चाहते हैं। इसलिए भी विवेकानन्द का जेएनयू में, और सावरकर का डीयू में अपमान हुआ।

जब तक पहले पार्टी-राजनीति चमकाने की चाह रहेगी, तब तक विवेकानन्द की प्रतिमा लगाना निरर्थक भी है।सोचें, जेएनयू में पचास साल से मार्क्स-लेनिन-माओ का दबदबा है। क्या वहाँ इन नेताओं की कोई मूर्ति लगी थी? मार्क्स-लेनिन के विचार, विश्वास, साहित्य, मानसिकता और तदाधारित गतिविधियाँ जेएनयू में चलायी गयी। पूरी निष्ठा, आत्मविश्वास, और ताल-मेल से। तभी वहाँ कम्युनिस्ट अड्डा ऐसा बना।  तुलना में हिन्दू राष्ट्रवादियों ने दशकों से राज्यों, व बरसों केंद्र की सत्ता पाकर क्या किया? वे विवेकानन्द की अनेक अनमोल सीखों में एक पर भी नहीं चले। अधिकांश तो उस से अनजान ही हैं! सो विवेकानन्द के विचार, विश्वास, साहित्य, और मानसिकता का प्रसार नहीं हुआ। तभी आज नागरिकता कानून के विरोध के बहाने देश भर में उत्पात हो रहा है। यदि विवेकानन्द की मूर्ति लगाने, फोटो पर माला चढ़ाने, आदि के बदले उन के विचारों को पढ़ा-पढ़ाया जाता, उन पर मनन किया जाता – तो भारत के अनेक मुसलमान भी स्वामी विवेकानन्द पर गौरवान्वित हो सकते!

चूँकि अभी स्वामी जी का जन्म-दिवस था– 12 जनवरी, और माघ कृष्ण सप्तमी – इसलिए केवल एक विषय पर उन की सीख को देखें, धर्म-रक्षा संबंधी। विवेकानन्द ने कहा था कि जब कोई हिन्दू धर्म छोड़ता है, तो न केवल एक हिन्दू घटता है, वरन हिन्दुओं का एक शत्रु भी बढ़ता है। यह उन्होंने सौ साल से भी पहले कहा था, जब देश-विभाजन नहीं हुआ था और करोड़ों हिन्दू-सिख तबाह नहीं हुए थे। न कश्मीरी हिन्दू अपने मूल स्थान से सामूहिक संहार व अपमान द्वारा मार भगाए गए थे। इस प्रकार, विवेकानन्द की सीख, तथा अनंतर अनुभवों से साफ नीति निकलती है कि हिन्दू-विरोधी मतवादियों को बढ़ने नहीं देना चाहिए। इसलिए भी यह नागरिकता कानून बिलकुल ठीक है। नैतिकता और लोकतंत्र, दोनों कसौटियों पर।

विवेकानन्द ने कहा था कि ‘जब तक मनुष्य कपटहीन रहे, उस के विश्वास के विरुद्ध एक शब्द भी न कहो।’ अर्थात् कपट करने वालों के विरुद्ध कहना उचित, आवश्यक है। क्या हिन्दू नेता कम्युनिस्टों, इस्लामियों, मिशनरियों की कपट भरी बातों, कदमों, गतिवधियों पर कोई व्यवस्थित बयान भी देते हैं? उलटे, वेटिकन से लेकर सुन्नी मजलिसों में जाकर चढ़ावा चढ़ाते रहते हैं।

विवेकानन्द ने 1900 ई. में एक सार्वजनिक व्याख्यान में ‘इस्लामवाद’ की व्याख्या की। उसमे इस्लाम की संकीर्णता, साम्राज्यवादी मानसिकता और मनमानी हिंसा की आलोचना थी। क्या हिन्दुओं को यह पढ़ाया भी गया? क्या हिन्दूवादी नेताओं ने भी वह पढ़ा-गुना? विवेकानन्द ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘राजयोग’ (1896) में प्रोफेट मुहम्मद के इलहामों पर भी विचार करके बताया कि मुहम्मद की ‘‘कुछ  शिक्षाओं पर गलत बल देने के कारण लाखों की हत्याएं हुईं, लाखों माताओं ने अपनी संतानें खोईं, लाखों मातृ-पितृविहीन बने और कितने ही देशों का सर्वनाश हो गया।’’ यह तब लिखा गया था जब पंजाब, और बंगाल का अर्द्धनाश नहीं हुआ था।

हम निश्चय-पूर्वक कह सकते हैं कि यदि इस्लामी मतवाद और व्यवहार का वास्तविक लेखा-जोखा भारत के हिन्दुओं मुसलमानों को बिना भेद-भाव पढ़ाया जाता तो सांप्रदायिकता का स्थाई हल मिल गया होता। सामान्य जनता ने यह कर लिया होता। जो वह वस्तुतः एक बार कर चुकी है! औरंगजेब के खात्मे के बाद और अंग्रेजी राज जमने से पहले – डेढ़ सौ साल में – हिन्दू-मुस्लिम संबंध वह रूप ले चुके थे, जो समस्या का एक मात्र हल है। कि मुसलमान यहाँ बराबरी से रहेंगे, पर इस्लामवादी राजनीति नहीं रहेगी।

लेकिन मृतप्राय इस्लामवाद का अंग्रेजों द्वारा उपयोग, फिर इस्लामवाद (खलीफत) को गाँधीजी का घातक समर्थन, और आगे नेहरू-वामपंथियों की इस्लाम-परस्ती ने उस इस्लामी आक्रामकता को फिर हवा दे दी, जिसे हिन्दुओं ने ठंढा कर हानिरहित बना दिया था। रही-सही कसर अनाड़ी राष्ट्रवादियों ने पूरी कर दी, जिन्हें देश बँटने के बाद भी खुल कर अपने को ‘हिन्दू’ कहने तक का साहस न था! उन्होंने चोरी-छिपे, मुँह बचाते, बचकाने कामों से ‘हिन्दू-राष्ट्र’ बनाने के मंसूबे पाले। दयानन्द, विवेकानन्द, श्रीअरविन्द, जैसे महान मनीषियों की बजाए अपने चुनावी नेताओं को ‘मार्ग-दर्शक’, ‘विचारक’, आदि मान लिया!

विवेकानन्द की शिक्षाओं में नागरिकता कानून के विरोध से निपटने और मुसलमानों को सन्मार्ग पर लाने के विविध उपाय मिलते हैं। लेकिन जिन पार्टी-नेताओं को हिन्दू समाज के सिर पर थोपने के लिए अब तक असंख्य भवनों, मार्गों, अस्पतालों, योजनाओं, विश्वविद्यालयों, स्टेशन, आदि के नामकरण हुए – क्या उन के लेखन, वचन, या कर्म में कुछ भी ऐसा है, जिस से किसी समस्या के निदान की राह दिखे? वैसे भी, उस तरह के अंतहीन नामकरण कर पार्टी-नेता का प्रचार कम्युनिस्टों की नकल है। वह हिन्दू-शिक्षा के विरुद्ध है! जो इतना भी नहीं समझते, वे विवेकानन्द का सम्मान कैसे कर सकेंगे?

सारी गलती शैक्षिक है। अज्ञान, भीरुता और पार्टी-बंदी से हिन्दू धर्म-समाज की रक्षा नहीं हो सकेगी। चाहे आप का संगठन, समर्थन, सदभावना कितनी भी बड़ी हो। गाँधी-नेहरू की अपार लोकप्रियता, सदभावना और उदारता के बावजूद हिन्दुओं की दुर्गति हुई। इस हालिया, भयावह अनुभव के बावजूद यदि विवेकानन्द की सीख उपेक्षित कर गाँधी की ही अंधाधुंध प्रचाराब्दी मनाने को कोई क्या कहे।

सर्वविदित है कि इस्लाम केवल ताकत की भाषा समझता है। इस में तलवार-शक्ति से पहले आत्म-विश्वास, और आत्म-बलिदान की ताकत भी है। इसीलिए, मुसलमान नेता निर्भीक होकर अनुचित, असंवैधानिक माँग भी धड़ल्ले से रखते हें। लड़ने-मरने को तैयार रहते हैं। जब-तब इस का ‘गला काट दो’, उसे ‘रहने नहीं देंगे’, फलाँ को ‘बोलने नहीं देंगे’, ‘हमें गजनवी का इंतजार है’, ‘जिन्ना का अधूरा काम पूरा करना है’, आदि खुल कर कहते हैं। लेकिन हिन्दू नेताओं को संवैधानिक बराबरी; या काशी, मथुरा, जैसे महान तीर्थों पर मध्ययुगीन इस्लामी कब्जे को खत्म करने की माँग रखने का भी साहस नहीं होता। जिहाद, इस्लामी आतकंवाद, शरियत, विशेषाधिकार, अलगाववाद, आदि की खुली समीक्षा कर मुसलमानों को सामान्य मानवीय धारा में लाने का प्रयत्न तो दूर रहा।  जबकि स्वामी विवेकानन्द ने ठीक शक्तिमत्ता की सीख दी थी। धर्म, शिक्षा और नीति में भी उन्होंने शक्ति एवं सत्य पर खड़े होने को कहा था।

वेदान्त और संस्कृत को शक्ति का स्त्रोत बताया था। उस सीख पर चलते हुए हिन्दूवादी कह सकते थे कि, ‘कम्युनिस्टों और मुसलमानों! जैसे तुम कॉमरेड माओ या प्रोफेट मुहम्मद की सीख पर चलना अपना अधिकार समझते हो, वैसे ही हमें स्वामी विवेकानन्द की सीख पर चलने का अधिकार है।’ आँखों में आँखें डाल कर न्याय की बात दो-टूक कहना, और चुनौती मिलने पर बराबरी से लड़ने के लिए तैयार रहना। यह नीति अपनाते ही समाधान स्वतः और प्रायः निःशब्द हो जाएगा। यह विवेकानन्द ही नहीं, स्वामी रामतीर्थ, श्रीअरविन्द, श्रद्धानन्द, टैगोर, निराला, अज्ञेय, जैसे अनेक मनीषियों की भी सीख है।

 

3 thoughts on “स्वामी विवेकानन्दः मूर्ति लगाना छोड़ उनकी सीख पर चलें!

  1. हमेशा की तरह आप वर्तमान चिंतन को नया मोड़ दे वर्तमान समस्या के समाधान का रास्ता भी बताते हैं। आपको पढ़ना मेरा शौभाग्य है।

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