मंदिर पर जरूरी साझा समझदारी

अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद भूमि विवाद की सर्वोच्च अदालत में सुनवाई पूरी हो गई है और एक महीने के अंदर उसका फैसला आना है। इस तरह मंदिर-मस्जिद का विवाद और इसे लेकर दशकों तक चला आंदोलन अपने अंतिम व निर्णायक मुकाम पर पहुंच गया है। पर सवाल है कि क्या इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह विवाद खत्म हो जाएगा? क्या यह इस किस्म का आखिरी विवाद होगा या सुप्रीम कोर्ट के फैसले से विवादों का पिटारा खुल जाएगा? यह भी सवाल है कि अदालत के फैसले के बाद राजनीति शुरू हुई तो उसे संभालने का क्या उपाय होगा?

इन सवालों का जवाब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निकलेगा और साथ ही इस बात से भी निकलेगा कि इस विवाद से जुड़े पक्ष इस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। ध्यान रहे सुनवाई के आखिरी दिन सुप्रीम कोर्ट की बनाई मध्यस्थता समिति की ओर से सीलबंद लिफाफे में कुछ सुझाव अदालत को दिए गए। बताया जा रहा है कि इसमें लिखा है कि मस्जिद पक्ष की ओर से विवादित जमीन पर अपना दावा छोड़ने का प्रस्ताव दिया गया है। इसके लिए उन्होंने कुछ शर्तें भी बताई हैं, जिनमें एक शर्त यह है कि मस्जिद के लिए अलग जमीन दी जाए। यह भी शर्त है कि भारतीय पुरातत्व संरक्षण, एएसआई की ओर से सरंक्षित कुछ इमारकों में इबादत की इजाजत दी जाए।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि मंदिर और मस्जिद दोनों पक्षों से जुडे पक्षकारों की साझा सहमति से अगर इस समस्या का समाधान होता है तो वह ज्यादा बेहतर होगा। वह सभी समाजों को ज्यादा स्वीकृत होगा और टिकाऊ होगा। दूसरे, इससे नए विवाद के शुरू होने की गुंजाइश कम होगी। पर साथ ही यह भी समझना होगा कि अगर शर्तों के साथ समझौता होता है तो कई शर्तें ऐसी हैं, जिनसे नई बहस छिड़ेगी। जैसे संरक्षित इमारतों में इबादत की इजाजत देने का मामला है। ध्यान रहे अभी ताजमहल में नमाज पढ़ी जाती है। यह शर्त मानी गई तो कई ऐतिहासिक इमारतों और मुस्लिम महापुरुषों के स्मारक में नमाज की इजाजत देनी पड़ेगी। इससे एएसआई का काम प्रभावित होगा।

समझौते के कथित प्रस्ताव के बाद यह भी खबर आई कि मस्जिद पक्ष से जुड़े सात में से छह पक्षकार किसी समझौते के लिए तैयार नहीं हैं। यानी वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करेंगे। अगर दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानने का वादा करते हुए फैसले का इंतजार करते हैं तो इस मसले को सुलझने में कुछ समय और लग सकता है। क्योंकि फैसले के एक या कई पक्ष पुनर्विचार की याचिका निश्चित रूप से दायर करेंगे। फैसला सुनाने के बाद चीफ जस्टिस रंजन गोगोई रिटायर हो जाएंगे। तो जाहिर है कि नई पीठ इस मामले पर दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। उसमें अंतिम फैसला आने में कुछ समय और लग जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट में 40 दिन तक हुई सुनवाई में दोनों पक्षों की ओर से जो दस्तावेज रखे गए हैं या जो दलीलें दी गई हैं उन्हें देख-सुन कर नहीं लगता है कि किसी के पास अपनी बात साबित करने का ठोस आधार है। किसी के दस्तावेज डाकू ले गए हैं तो किसी के पास है हीं नहीं। किसी को धार्मिक आख्यानों के सहारे अपनी बात साबित करनी है तो किसी को इस आधार पर कि वह इतने वर्षों से वहां इबादत कर रहा है। ऐसे में अदालत के पांच जजों के लिए फैसला लिखना बहुत आसान काम नहीं होगा।

यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि अदालत का फैसला सिर्फ इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि धार्मिक आख्यानों में, लोक मान्यताओं में, मिथकों में या इबादत के समय के दावे में क्या कहा गया है। फैसला मुकदमे के गुणदोष के आधार पर होना चाहिए। अन्यथा मिथकों, किवंदतियों आदि को अदालती सबूत मानने का नया युग शुरू हो जाएगा। यह भी ध्यान रखना होगा कि इस फैसले के बाद विवादों का पंडोरा बॉक्स न खुले। ध्यान रहे देश में अनेक मस्जिदों और ऐतिहासिक इमारतों के बारे में दावा किया जाता है कि वे मंदिरों को तोड़ कर बनाए गए हैं। सभी पक्षों का प्रयास यह होना चाहिए कि अयोध्या के मामले को आखिरी मान कर इस तरह की बातों पर पूर्णविराम लगाएं। ध्यान रहे भारतीय संसद ने 1951 में कानून बना कर यह सुनिश्चित किया था कि सभी धर्मस्थलों की 1947 से पहले की स्थिति बहाल रखी जाएगी। इस संवैधानिक प्रावधान की रक्षा देश, समाज और कानून सबके लिए  बेहतर होगा।

ध्यान रहे मंदिर आंदोलन को गति देने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और दूसरे भाजपा नेता पहले हमेशा कहते रहे थे कि अयोध्या का मामला आस्था का प्रश्न है, जिसे कोई अदालत नहीं सुलझा सकती है। पर अब भाजपा और आंदोलन से जुड़े सभी पक्ष कहने लगे हैं कि उनको अदालत का फैसला मंजूर होगा। आस्था के प्रश्न से अदालत के फैसले तक के बदलाव में देखने वाली बात यह है कि राजनीति और मंदिर पक्ष की सोच बदली है या अदालतों के प्रति उनका सम्मान बढ़ गया है? बहरहाल, इस निर्णायक मोड़ पर सबसे जरूरी बात यह है कि सभी पक्ष समझदारी दिखाएं और फैसले को शांति से लागू करने का प्रयास करें। अगर इसमें कुछ और समय लगता है तो वह समय भी दिया जाना चाहिए और अगर ऐसा लगता है कि मध्यस्थता हो सकती है तो उसे भी एक मौका मिलना चाहिए।

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