खुदकुशी का ऐसा तमाशा कभी नहीं बना

भारत ऐसा देश है, जहां किसी भी विपत्ति का, किसी भी आपदा का और किसी भी व्यक्ति के निजी दुख का तमाशा बनाया जा सकता है। यहां तक कि किसी की जवान मौत का भी तमाशा बनाया जा सकता है। उसे एक राजनीतिक इवेंट में तब्दील किया जा सकता है। जैसे पांच-छह साल पहले रोहित वेमुला की खुदकुशी को देश भर में राजनीतिक तमाशा बनाया गया था। हैदराबाद यूनिवर्सिटी के एक नौजवान छात्र ने व्यवस्था से परेशान होकर खुदकुशी कर ली थी। उस पर जितनी राजनीति हुई उसकी मिसाल खोजनी मुश्किल है। इसी तरह कांग्रेस नेता शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर ने कथित तौर पर खुदकुशी की तो वह एक ग्रैंड पोलिटिकल इवेंट में कन्वर्ट हो गया। अभी तक उसकी जांच और सुनवाई चल रही है। अब ताजा मिसाल फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी का है, जिसे देश भर में तमाशा बनाया जा रहा है।

सुशांत सिंह राजपूत ने जून के मध्य में खुदकुशी की थी और उस घटना के 50 दिन बाद बिहार से लेकर महाराष्ट्र तक सिर्फ इसी बात की चर्चा है। महाराष्ट्र कोरोना वायरस से सर्वाधिक संक्रमित राज्य है और बिहार भविष्य में सर्वाधिक संक्रमित राज्य हो सकता है। इसके अलावा दोनों राज्य लगातार बारिश और बाढ़ से परेशान हैं। पर दोनों राज्यों के बीच सुशांत सिंह राजपूत के मामले में जंग छिड़ी है। बिहार के लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि चुनाव खत्म होते ही यह मुद्दा भी खत्म हो जाएगा पर बीमारियां तो हर साल आएंगी और बाढ़ भी हर साल आएगी! क्यों नहीं लोग अपनी चुनी हुई सरकार को बीमारियों और बाढ़ के बेहद खराब प्रबंधन के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं?

आखिर इस मामले मे ऐसा क्या है, जिसे लेकर लोग इतने आंदोलित हो रहे हैं? क्या सचमुच बिहार के लोग इस बात की चिंता कर रहे हैं कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत का सच सामने आए या उन्हें एक सोची समझी योजना के तहत इस भावनात्मक मुद्दे के साथ जोड़ दिया गया है? असल में आम लोगों को इससे कोई मतलब नहीं है। आम लोगों को अगर इससे कोई मतलब होता तो उनकी प्रतिक्रिया पहले दिन देखने को मिलती। पर पहले दिन लोगों ने इसे सहज रूप से लिया और मान लिया कि किसी न किसी मुश्किल की वजह से सुशांत ने खुदकुशी की है। पर डेढ़ महीने के बाद अचानक यह मुद्दा बिहार की उप राष्ट्रीयता से जुड़ गया है। यह बिहार बनाम महाराष्ट्र का मामला बन गया है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि राज्य की सरकार को यह सूट करता है। दो कारणों से यह मुद्दा बिहार की नीतीश कुमार सरकार को सूट करता है। पहला मुद्दा तो यह है कि इस बहाने सरकार कोरोना वायरस से निपटने में अपनी अक्षमता और हर साल आने वाली बाढ़ को संभालने के कुप्रबंधन से लोगों का ध्यान हटा देगी। लोग इस समय बुरी तरह से परेशान हैं। कोरोना की वजह से जीवन-मरण की चिंता है तो उसी के कारण चौपट हुई आर्थिकी की मार अलग है। ऊपर से बाढ़ ने लोगों का जीना दूभर किया हुआ है। सुशांत सिंह राजपूत के बहाने सरकार ने इन दोनों मुश्किलों पर से ध्यान हटाया है। अगर 15-20 दिन और यह विवाद चल जाए तो सरकार को बड़ी राहत मिल जाएगी। क्योंकि दो-तीन हफ्ते में बाढ़ कम होने लगेगी और सरकार को कोरोना की संख्या को काबू करने का भी समय मिल जाएगा। दूसरा कारण यह है कि इससे नीतीश कुमार को बिहारी उप राष्ट्रीयता के अपने पुराने दांव को चमकाने का मौका मिला है। वे पहले इस दांव को आजमाने का प्रयास कर चुके हैं पर उन्हें कामयाबी नहीं मिली थी।

नेता इस तरह के काम करते रहते हैं क्योंकि उनमें गिद्ध वाली प्रवृत्ति किसी न किसी हद तक होती है। पर हैरानी की बात यह है कि बिहार जैसे राजनीतिक, सामाजिक रूप से जागरूक प्रदेश के लोग कैसे इस जाल में उलझे हैं? क्या उन्हें सचमुच इस बात का यकीन है कि सुशांत सिंह राजपूत के साथ ज्यादती हुई या उनकी खुदकुशी के पीछे कोई साजिश है या उनकी हत्या की गई है? क्या वे इस घटना की सचाई सचमुच नहीं देख पा रहे हैं? क्या उन्हें एक-दो न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया में प्रचारित साजिश थ्योरी पर सचमुच यकीन है? ऐसा लग रहा है कि सब कुछ एक खास तरह की धारणा से संचालित हो रहा है। यह झूठी धारणा बनाई जा रही है कि सुशांत सिंह राजपूत को बड़े निर्माता-निर्देशकों ने परेशान किया या बड़े अभिनेताओं ने उनको फिल्मों से हटवा दिया, उनकी गर्लफ्रेंड ने उनके करोडों रुपए खर्च करा दिए आदि आदि।

सवाल कि अगर किसी निर्माता-निर्देशक ने उनको अपनी फिल्म से हटा दिया तो यह कौन सी बड़ी बात हो गई। बड़े बड़े अभिनेता-अभिनेत्री फिल्मों से हटाए जाते हैं और यह जब से फिल्म इंडस्ट्री है तभी से होता है। अभी हाल में धर्मेंद्र ने राष्ट्रीय चैनल पर किस्सा सुनाया कि कैसे हृषिकेश मुखर्जी ने उनको आनंद फिल्म के लिए चुन लिया और बाद में फिल्म राजेश खन्ना के साथ बनाई। इस तरह के हजारों किस्से फिल्म उद्योग के बारे में सबको पता है। चाहे फिल्म हो, राजनीति हो, खेल हो या उद्योग सब जगह इस तरह की गलाकाट प्रतिस्पर्धा है और उसमें कोई किसी के प्रति दयालुता का भाव नहीं रखता है। बिहार के लोगों को समझना चाहिए कि पुराने जमाने में चित्रगुप्त से लेकर शत्रुघ्न सिन्हा और प्रकाश झा से लेकर मनोज वाजपेयी, विनय पाठक, पंकज त्रिपाठी जैसे जितने लोग मुंबई फिल्म जगत में जमे हैं वे सब बाहरी लोग ही थे और उनके साथ भी इंडस्ट्री का ब्यवहार वैसा ही रहा होगा, जैसा सुशांत के साथ था।

ग्लैमर की चकाचौंध में भटकना भी फिल्म जगत के लोगों की नियति है। सुशांत इसमें भी अपवाद नहीं थे। उन्होंने भी बरसों तक एक अभिनेत्री के साथ मोहब्बत करने के बाद दूसरी लड़की के साथ लिव इन रिलेशन में रहना शुरू कर दिया था। चार लाख रुपए महीना किराए का घर और तीन लाख रुपए महीना किराए का फार्म हाउस रखने की खबर मीडिया में आई है। चांद पर जमीन खरीदने से लेकर नासा की यात्रा और आकाश में तारे देखने वाला टेलीस्कोप घर में लगवाने की खबरें भी आई हैं। यह समझना चाहिए कि सुशांत का करियर बहुत छोटा था, उन्होंने बहुत छोटे-छोटे बजट की बहुत कम फिल्मों में काम किया था और उनकी कमाई भी सीमित थी। परंतु समझदार लोग भी कह रहे हैं कि उनके खाते से 15 करोड़ की हेराफेरी हो गई तो किसी ने कहा कि 50 करोड़ की हेराफेरी हो गई। अगर उनके टेलीविजन और फिल्म यात्रा को देखें तो उनकी कुल कमाई भी 15-20 करोड़ हुई हो तो बहुत बड़ी बात होगी।

इस पूरे मामले में फिल्म जगत या महाराष्ट्र के राजनेताओं पर आरोप लगाने से ज्यादा जरूरी है कि सुशांत के परिवार के लोग हालात का आकलन करें और अपनी भूमिका के बारे में गंभीरता से सोचें। उनके पिता ने कहा है कि उन्होंने 25 फरवरी को मुंबई पुलिस को एलर्ट किया था कि सुशांत की जान को खतरा है। सुशांत को किस चीज से खतरा था? अगर वे डिप्रेशन में थे या उन पर काला जादू हुआ था या उनकी गर्लफ्रेंड उनको परिवार के लोगों से बात नहीं करने दे रही थी, जो यह परिवार का मामला है। इसके लिए परिवार को आगे आना चाहिए था। उनके पिता मुंबई जाकर बेटे के साथ रह सकते थे। बेटे को अपने पास बुला सकते थे। उनकी बहनें उनके साथ रहने जा सकती थीं। पर परिवार खुद एलर्ट नहीं हुआ, बल्कि पुलिस को एलर्ट किया जा रहा था। उनके पिता ने खुद एफआईआर में लिखवाया है कि सुशांत की बहन मुंबई गई थी लेकिन तीन-चार दिन में ही लौट आई क्योंकि उनके अपने छोटे बच्चे हैं। सोचें, परिवार इस एटीच्यूड के साथ सुशांत की जान पर के कथित खतरे को हैंडल कर रहा था। ऐसा लग रहा है कि सुशांत अचानक मिली सफलता और ग्लैमर की चकाचौंध में खो गए थे और यहीं अंततः उनकी जान जाने का कारण बना।

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