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Saturday, April 17, 2021
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आंतरिक लोकतंत्र जैसी कोई चीज नहीं होती

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आंतरिक लोकतंत्र किस चिड़िया का नाम है? भारत की राजनीति में ऐसी कोई चीज नहीं होती है! भारत में लोकतंत्र है, जो राजनीति से संचालित होती है पर राजनीति में या राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र जैसी कोई चीज नहीं होती है। अब तो खैर लोकतंत्र पर ही खतरा है और जिस तरह से लोकतांत्रिक संस्थाएं एक एक करके खत्म या कमजोर हो रही हैं उसमें लोकतंत्र अपने मौजूदा जीवंत स्वरूप में कब तक बचा रहेगा यहीं कहना मुश्किल है। ऐसे में पार्टियों के आंतरिक लोकतंत्र की चर्चा बेमानी है। पर उम्मीद भी वहीं से है। अगर पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र बहाल होगा तभी देश का लोकतंत्र भी बचेगा, लोकतांत्रिक संस्थाएं बचेंगी और संस्थाओं के अंदर भी लोकतंत्र बचा रहेगा।

बहस की शुरुआत कांग्रेस पार्टी के अंदर नेतृत्व को लेकर शुरू हुए विवाद से हुई है। कांग्रेस पार्टी के 23 नेताओं ने अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें उन्होंने कहा कि बिल्कुल नीचे से ऊपर तक पार्टी संगठन में चुनाव होना चाहिए। जिला और प्रखंड स्तर के पदाधिकारियों से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष और कार्य समिति का चुनाव होना चाहिए। इसके अलावा नेतृत्व को लेकर और भी कई सुझाव इसमें दिए गए। जैसा कि अक्सर होता है कि पार्टी नेताओं की इस चिट्ठी को नेतृत्व के खिलाफ बगावत माना गया। कार्य समिति की बैठक में इस लेकर बहस हुई और खुद राहुल गांधी ने इस पर सवाल उठाए। उसके बाद से ही चिट्ठी लिखने वाले नेता या तो सफाई दे रहे हैं या पार्टी के अंदर किनारे किए जा रहे हैं।

कई राज्यों में चिट्ठी लिखने वाले नेताओं के खिलाफ मुहिम छिड़ी है। भारत में इस बहाने शुरू हुई आंतरिक लोकतंत्र की बहस का एक पहलू यह है कि जब भी राहुल गांधी केंद्र सरकार से कोई सवाल पूछ रहे हैं तो भाजपा के नेता उनसे कहने लग रहे हैं कि वे अपनी पार्टी के 23 नेताओं का जवाब दें। यानी एक पार्टी का अंदरूनी मामला, देश के जुड़े मुद्दे पर दो पार्टियों के बीच विवाद का मुद्दा बन जाता है, ऐसा सिर्फ भारत में ही हो सकता है। और ऐसा इसलिए है क्योंकि जो भी सत्ता में रहता है उसे जरूरी सवालों का जवाब नहीं देना होता है, सिर्फ बहस को भटकाना होता है।

बहरहाल, इस पूरी बहस में और इससे पहले भी पार्टियों के आंतरिक लोकतंत्र को लेकर जितनी बार बहस हुई है वह कुल मिला कर नेतृत्व से जुड़ी होती है। वह नेता के समर्थन या विरोध का मामला होता है। शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि किसी नीति को लेकर पार्टी के अंदर बहस हुई हो और आंतरिक लोकतंत्र का मुद्दा उठा हो। ऐसा आजतक नहीं हुआ। सारे नेता नीति पर सहमत होते हैं, असहमति नेतृत्व को लेकर होती है और विवाद भी उसी पर होता है। सोनिया गांधी या राहुल गांधी की जगह कोई नया अध्यक्ष बने, कोई गैर गांधी अध्यक्ष बने, यह बहस का मुद्दा है और इसी मुद्दे पर आंतरिक लोकतंत्र की बात हो रही है। बहस इस बात को लेकर नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार सार्वजनिक उपक्रमों को बेच रही है तो उस पर पार्टी की क्या राय होनी चाहिए। आखिर कांग्रेस ने भी अपने राज में सार्वजनिक उपक्रम बेचे थे। सो, अगर आज कांग्रेस के नेता इसके लिए केंद्र की सरकार का विरोध कर रहे हैं तो क्या पार्टी का कोई नेता इस हिप्पोक्रेसी को लेकर पार्टी फोरम में सवाल उठा सकता है?

असल में पार्टियों के ज्यादातर नेताओं के लिए नीतियों का कोई मतलब नहीं होता है। उनसे उनका कोई सरोकार नहीं होता है। उसमें तो वे आंख मूंद कर उसी नीति को फॉलो करते हैं, जो पार्टी का नेतृत्व तय करता है। दूसरी, बात यह है कि ज्यादातर मामलों में नीतियां पहले से तय हैं। आजादी के बाद जो नीतियां बनी थीं उन्हें ही थोड़े बहुत फेरबदल के साथ आज तक चलाया जाता है। बड़ा नीतिगत बदलाव पहली और आखिरी बार 1991 में हुआ था, जब नरसिंह राव ने आर्थिकी को खोलने का फैसला किया था। इसलिए सभी सरकारों को नीतियां लगभग एक जैसी हैं इसलिए पार्टी के नेता उन पर कोई लाइन तय करने से पहले आंतरिक चर्चा कराने को जरूरी नहीं समझते हैं।

सो, जैसे ही आंतरिक लोकतंत्र की बात सिर्फ नेतृत्व या एक-दो नेता पर सिमट जाती है वैसे ही इसकी बुनियाद कमजोर हो जाती है। दुनिया के ज्यादातर जाग्रत लोकतंत्र वाले देशों में पार्टियों के अंदर नीतियों को लेकर चर्चा होती है। नेतृत्व पर बहुत कम चर्चा होती है और चूंकि अमेरिका जैसे देश में नेता चुनने के लिए जनता की वोटिंग की जरुरत होती है इसलिए वहां ज्यादा विवाद नहीं होता है। भारत में नेतृत्व आमतौर पर आनुवांशिक होता है या चमत्कारिक होता है। इसलिए इनको चुनौती नहीं दी जा सकती है। जैसे इस समय देश की दो बड़ी पार्टियों को लें तो कांग्रेस का नेतृत्व आनुवांशिक है और भाजपा का चमत्कारिक है। तो इस नेतृत्व को कौन चुनौती दे सकता है?

वैसे भी जब तक नेतृत्व में सत्ता दिलाने की शक्ति होती है तब तक उसको चुनौती नहीं दी जाती है। लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व को भी तब चुनौती मिली, जब 2004 और 2009 के लगातार दो चुनावों में उनके कमान में रहते पार्टी हारी। वह चुनौती भी नहीं मिलती अगर पार्टी की हिंदुवादी नीतियों को ज्यादा मुखर तरीके से उठाने वाला दूसरा चमत्कारिक नेता नहीं आ जाता। नरेंद्र मोदी आ गए तो वे जब तक पार्टी को सत्ता दिलाते रहेंगे, तब तक वे पार्टी के एकछत्र नेता बने रहेंगे। जिस दिन करिश्मा कमजोर पड़ेगा उस दिन उनको भी चुनौती मिलने लगेगी। वंशवादी नेतृत्व वाली पार्टियों में यह सुविधा रहती है कि वहां सत्ता नहीं दिला पाने के बावजूद काफी समय तक नेतृत्व चल सकता है क्योंकि उसके नेताओं के पास दूसरा विकल्प नहीं होता है। सबको पता होता है कि उस पार्टी की कमान किन हाथों में रहनी है। अगर आपको लगता है कि उस नेता से आपके हित नहीं पूरे होंगे तो आप पार्टी छोड़ कर जा सकते हैं लेकिन नेतृत्व को लेकर पार्टी फोरम पर चर्चा नहीं कर सकते हैं। आनुवांशिक और चमत्कारिक दोनों किस्म के नेतृत्व के रहते आंतरिक लोकतंत्र की बात बेमानी है।

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