कश्मीर में सरकार आखिर चाहती क्या है?

जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार आखिर क्या करना चाहती है? वहां राष्ट्रपति शासन लगे हुए डेढ़ साल हो गए है और राज्य का विशेष दर्जा खत्म हुए भी एक साल से ज्यादा हो गया है। पिछले साल अगस्त में जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करके उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटा गया था। अनुच्छेद 370 और 35 को खत्म किया गया था। उसके बाद से राज्य के ज्यादातर बड़े नेता जेल में रहे या नजरबंद रहे। अब सारे नेताओं की रिहाई हो गई है और प्रदेश के नेता अपना नया एलायंस बना कर राजनीतिक अभियान की तैयारी कर रहे हैं। दूसरी ओर परिसीमन का काम भी चल रहा है, जिसके तहत कुछ सीटें भी बढ़नी हैं और कुछ सीटों की जनसंख्या संरचना में बदलाव होना है।

परिसीमन होकर चुनाव की घोषणा हो उससे पहले एक नया दांव देखने को मिल रहा है। जम्मू कश्मीर में काम करने वाले डिस्ट्रिक्ट प्लानिंग एंड डेवलपमेंट बोर्ड्स को खत्म करके उसकी जगह डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट कौंसिल यानी डीडीसी बनाई जा रही है। इसके लिए सीधा चुनाव होगा। जैसा कि इसके नाम से जाहिर है, जिले के विकास से जुड़े हर काम की जिम्मेदारी इस कौंसिल की होगी। इसमें चुने हुए प्रतिनिधि होंगे लेकिन ऐसा लग रहा है कि  असली ताकत जिले के उपायुक्त यानी कलेक्टर के हाथ में होगी। यह एक किस्म से मौजूदा पंचायती राज का ही विस्तार है। जिस तरह अभी पंचायतों को जाने वाले सारे फंड और उसके कामकाज का हिसाब बीडीओ के जरिए कलेक्टर रखता है वैसा ही इसके तहत भी होगा।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने डीडीसी की व्यवस्था को लागू करने के लिए जम्मू कश्मीर पंचायती राज कानून 1989 में बदलाव कर दिया है। नए बदलाव के मुताबिक नगरपालिका के इलाकों को छोड़ कर बाकी सारे क्षेत्रों में डीडीसी की व्यवस्था लागू हो जाएगी। इस लिहाज से राज्य का 70 फीसदी हिस्सा इसके तहत आ जाएगा। नई व्यवस्था के तहत सड़क निर्माण से लेकर पानी और बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करने तक का सारा काम इस कौंसिल के जरिए होगा, जो जाहिर है कलेक्टर की देखरेख में होगा। हर जिले में चुने हुए 14 प्रतिनिधि होंगे पर इनके कौंसिल में होने के बावजूद सारा कामकाज अधिकारियों के हाथ में चला जाएगा।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसकी जो रूप-रेखा बनाई है उसके मुताबिक यह एक मिनी विधानसभा या लोकल विधानसभा की तरह है। इसके सदस्यों का कार्यकाल पांच साल का होगा और इसमें अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान होगा। जिले का जो अतिरिक्त उपायुक्त होगा वह कौंसिल का मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ होगा। इससे भी जाहिर होता है कि असली कामकाजी अधिकारी सीईओ के हाथ में रहने वाला है। हर जिले की एक प्लानिंग कमेटी भी होगी, जो सारी योजनाएं बनाएंगी। अगले एक हफ्ते में इसके चुनाव की अधिसूचना जारी हो सकती है। राज्य प्रशासन का कहना है कि इसके जरिए राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था पूरी तरह से लागू हो जाएगी।

यहीं से राज्य की मुख्यधार की राजनीतिक पार्टियों और नेताओं की समस्या शुरू होती है। वे इसे लेकर परेशान हैं। उनको लग रह है कि केंद्र सरकार राज्य के नेताओं और पिछले 70 साल से राजनीति पर हावी रही पार्टियों को खत्म करना चाहती है। उनकी भूमिका सीमित की जा रही है और राज्य में कोई केंद्रीय ताकत नहीं बनने देने की सोच के साथ केंद्र सरकार काम कर रही है। राज्य की दो सबसे बड़ी प्रांतीय पार्टियों पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस ने साथ मिल कर विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया है पर उनको समझ में नहीं आ रहा है कि विधानसभा और मुख्यमंत्री की उसके बाद क्या स्थिति रह जाएगी। जब प्लानिंग से लेकर विकास तक के सारे काम बिल्कुल स्थानीय स्तर पर होने हैं तो विधानसभा की भूमिका अपने आप सीमित हो जाएगी।

एक सवाल यह भी उठ रहा है कि इस समय जबकि राज्य में विधानसभा नहीं है, तब इस तरह के बदलाव क्यों किए जा रहे हैं? जो लोग केंद्र सरकार के इस प्रस्ताव का विरोध नहीं कर रहे हैं और मान रहे हैं कि स्थानीय प्रतिनिधियों को शामिल करके लोकल लेवल पर विकास की योजनाएं बनाने से स्थानीय स्तर पर बेहतर विकास की संभावना है, उनको भी लग रहा है कि सरकार को इसके लिए विधानसभा चुनाव तक इंतजार करना चाहिए था। ज्यादातर पार्टियों की पहली मांग यह है कि जम्मू कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाए। पहला काम यह होना चाहिए कि इसका पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाए, विधानसभा बहाल की जाए, विधानसभा के चुनाव हों और चुनी हुई सरकार की सहमति से स्थानीय प्रशासन में जो भी मॉडल बदलना है वह बदलाव हो। परंतु दूसरी ओर ऐसा लग रहा है कि केंद्र सरकार पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने और चुनाव कराने से पहले प्रशासन के मॉडल को बदल देना चाहती है।

इसके बाद चुनाव होता भी है तो जमीनी स्तर पर कोई खास बदलाव नहीं होगा। पंचायतों की व्यवस्था अपनी जगह काम करती रहेगी और जिला स्तर पर डीडीसी के जरिए अधिकारी कामकाज करेंगे। इस तरह से प्रशासन के कई स्तर पर बन जाएंगे, कई लोगों की भूमिका और जिम्मेदारी बन जाएगा, प्लानिंग के भी कई स्तर हो जाएंगे। इससे हो सकता है कि कुछ कंफ्यूजन भी हो। तभी मुख्य धारा की पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं। उनको इस बात का भी अंदेशा है कि कहीं केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर का दर्जा स्थायी रूप से न बदल दे। यानी विधानसभा बहाल कर दे पर राज्य को केंद्र शासित प्रदेश ही रखे, जैसे दिल्ली में है। ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री की बजाय उप राज्यपाल ही सब कुछ संभाले रहेगा।

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