तालिबान का यह कौन सा इस्लाम? - Naya India islam of taliban
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तालिबान का यह कौन सा इस्लाम?

Taliban

islam of taliban : इस्लाम में न मर्दों के लिए दाढ़ी रखना ज़रूरी है और न हीं महिलाओं पर किसी तरह की पाबंदी है। न बाहर आने जाने पर और न ही पढ़ाई करने पर। फिर सवाल पैदा होता है कि ऐसी पबंदिया लगा कर तालिबान अफ़गानिस्तान में इस्लाम के नाम पर कैसी हुकुमत क़ायम करना चाहता है? सच तो यह है कि उसकी पिछली हुकुमत और नए मंसूबों का इस्लामे के बुनियादी उसूलों से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं दिखता।

लेखक: यूसुफ़ अंसारी

अफ़ग़ानिस्तान में अभी भी चुनी हुई सरकार है। सत्ता तालिबान के हाथों नहीं आई है, पर तालिबान ने यह साफ कर दिया है कि वह इस देश को एक बार फिर अपने शासन वाले अतीत की ओर ले जाना चाहता है। अफ़गानिस्तान से अमेरिकी सौनिकों की वापसी के बाद तालिबान ने लगभग 85 फ़ीसदी देश पर क़ब्ज़ा कर लिया है। पूरे अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़े की तरफ़ बढ़ रहे तालिबान ने अब अपने इरादे भी पूरी तरह साफ़ कर दिए हैं। वो फिर से पहले की ही तरह अपनी दमनकारी हुकूमत क़ायम करना चाहता है।

तालिबान ने पुरुषों और महिलाओं के लिए कई सख़्त क़ानूनों का ऐलान किया है। पुरुषों के दाढ़ी कटवाने और धूम्र पान करने पर भी पबंदी लगाई गई है। यानि सबके लिए दाढ़ी रखना अनिवार्य कर दिया गया है। महलाओं के लिए आदेश है कि वो अपने पिता, भाई य़ा पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के साथ बाज़ार या सार्वजनिक स्थानों पर नहीं सकतीं। लड़कियों पर छठी कक्षा के बाद स्कूल जाने पर पाबंदी लगई गई है। ग़ौरतलब है कि अफ़ग़ानिस्तान में 1996 से 2001 तक तालिबानी हुकूमत थी। उस दौरान ये तमाम क़ानून लागू किए गए थे। लड़कियों के स्कूल बंद कर दिए गए थे। उन्हें कामकाज छोड़ना पड़ा था। वे घर के किसी पुरुष सदस्य के बग़ैर बाहर नहीं निकल सकती थीं।

अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी एएफपी के हवाले से ख़बर आई है कि तालिबान ने सोशल मीडिया पर एक संदेश जारी करके गाँव वालों से अपनी बेटियों और घर की विधवाओं की शादी तालिबान लड़ाकों से करने को कहा है। एजेंसी ने ख़बर दी है, ‘क़ब्ज़ा किए गए इलाक़ों के सभी इमामों और मुल्लाओं से कहा जा रहा है कि वे 15 से ज़्यादा उम्र की लड़कियों और 45 साल से कम की विधवाओं की सूची बना कर तालिबान को सौंप दें ताकि उनकी शादी तालिबान लड़ाकों ले कराई जा सके।’ हालाकि तालिबान के एक प्रवक्ता ज़बीहुल्ला मुजाहिद ने इससे इनकार करते हुए इसे अफ़वाह बताया है। उन्होंने एएफ़पी से कहा, ‘ये बेबुनियाद दावे हॉं। ये फ़र्जी काग़ज़ात के ज़रिए फैलाई जा रही अफ़वाहें हैं।’

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स्थानीय लोगों का कहना है कि तालिबान ने स्थानीय इमामों को ये सभी शर्तें ( islam of taliban ) एक चिट्ठी में लिखकर दी हैं। तालिबान ने कहा है कि आदेश नहीं मानने वालों से सख़्ती से निपटा जायेगा। पिछले महीने, शेर ख़ाँ बांदेर इलाक़े पर क़ब्ज़े के बाद तालिबान ने महिलाएँ को घर से बाहर नहीं निकलने का आदेश दिया था।  इस वजह से कशीदाकारी, सिलाई-बुनाई और जूते बनाने के काम में शामिल महिलाओं के काम बंद करना पड़ा। स्थानीय निवासी नाज़िर मुहम्मद ने एएफ़पी को बताया, ‘हमसे कहा गया कि सारे पुरुष सिर पर पगड़ी बाँधें, कोई लड़की कक्षा छह के ऊपर स्कूल नहीं जा सकती। कोई भी व्यक्ति, ख़ास कर युवा लाल व हरे रंग के कपड़े न पहने।’ ग़ौरतलब है कि अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रीय झंडे में ये दोनों रंग हैं।

कितने इस्लामी हैं तालीबानी फ़रमान?

तालिबान ये सारे आदेश इस्लाम के नाम पर जारी कर रहा है। लेकिन इस्लाम की बुनियादी उसूलों और शिक्षाओं से ऐसे दमनकारी फरमानों का दूर दूर तक कोई नाता नहीं है। तालिबान अपनी हुकूमत को इस्लामी हुकूमत बताता है। लेकिन सच तो यह है कि उसकी हुकूमत के मर्दो, औरतों, बच्चों पर तरह-तरह की बंदियां लगाने वाले तमाम फरमान इस्लाम की बुनियाद के ही ख़िलाफ़ हैं। ये फरमान न तो क़ुरआन की किसी आयत से मेल खाते हैं और न ही किसी हदीस से मुताबिक़ हैं। ऐसे बेतुके फरमानों का इस्लामी शिक्षा की किसी अन्य किताब में भी कोई ज़िक्र नहीं मिलता। ऐसा लगता है तालिबान ने अनपना कोई अलग इस्लाम गढ़ लिया है। अपने बेतुके फरमानों को वो अपने लड़ाकों की बंदूक़ों की नोक पर लागू कराना चाहता है।

‘इस्लाम’ अरबी भाषा के ‘सलाम’ शब्द से बना है। ‘सलाम’ का अर्थ होता है सुरक्षा की गारंटी देना। जब मुसलमान एक दूसरे को सलाम करते हैं तो वो एक दूसरे की सलामती (सुरक्षा) ती दुआ ही मांगते है। ‘इस्लामी हुकूमत’ अपने दायरे में रहने वाले तमामे नागरिकों को बग़ैर किसी भेदभाव के पूरी आज़ादी से रहने की छूट देती है। उसके दायरे में रहने वाले तमाम नागरिकों की जान-माल माल की सुरक्षा की गारंटी हुकूमत की ज़िम्मेदारी होती। ऐसे में सवाल उठता है कि तालिबान कैसी इस्लामी हुकूमत क़ायम कर रहा है जहां मुसलमानों पर ही

तमाम तरह की पबंदियां थोंपी जा रहीं हैं। तालिबान की न तो पहली हुकूमत इस्लामी उसूलों पर थी और न ही उसके नए बनने वाले निज़ाम का इस्लाम से कोई नाता नज़र आता है।

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इस्लाम में ज़रूरी नहीं दाढ़ी रखना

तालिबान ने सभी अफगानियों को दाढ़ी बढ़ाने का हुक्म दिया है। लेकिन इस्लाम में पुरुषों के लिए दाढ़ी रखना कोई ज़रूरी नहीं है। न लंबी दाढ़ी न छोटी दाढ़ी। दाढ़ी रखने को लेकर कुरआन का किसी आयत में कोई आदेश नहीं है। दाढ़ी को पैग़बंर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद (सअव) की सुन्नत बताया जाता है। लेकिन उस ज़माने में ज़्यातादर लोग दाढ़ी रखते थे। मुसलमान भी और ग़ैर-मुसलमान भी। कुछ हदीसों में यह दावा ज़रूर किया गया है कि मुहम्मद (सअव) साहब ने लोगों के दाढ़ी रखने हुक्म दिया था। लेकिन ये दावा क़ुरआन की किसी आयत से साबित नहीं होता। अगर ऐसा होता तो सऊदी अरब के बादशाह और शहज़ादे भी लंबी-लंबी दाढ़ी रखते। क्योंकि वहां का संविधान ही क़ुरआन है। लिहाज़ लोगों के जबरन दाढ़ी रखने को मजबूर करना इस्लाम के ख़िलाफ़ है।

महिलाओं पर पाबंदियों का कोई इस्लामी आधार नहीं

इस्लाम में औरतों के अधिकार मर्दों के बराबर हैं। इस्लाम औरतों पर किसी भी तरह की कोई पाबंदी नहीं लगाता। क़ुरआन में साफ़ कहा गया है कि मर्दों और औरतों के एक दूसरे पर बराबर अधिकार हैं। अगर पुरुष अकेले कहीं भी जा सकते हैं तो महिलाओं को भी कहीं भी जाने का पूरा अधिकार है। जहां तक सुरक्षा का सवाल है तो ये बात दोनों पर लागू होती है। क़ुरआन में जहां महिलाओं को पर्दे में रहने का हुक्म दिया गया है तो उससे पहले पुरुषों को निगाहें नीची रखने का हुक्म दिया गया है। अपने आख़िरी ख़ुत्बें (भाषण) में मुहम्मद (सअव) साहब ने महिलाओं को उनका हक़ देने और उनके साथ नरमी भरा बर्ताव करने की ख़ास हिदायत दी थी। महिलाएं पर की जाने वाली तालिबान की ज़्यादतियां मुहम्मद (सअव) साहब के हुक्म के ख़िलाफ़ हैं।

तालिबान ने लड़कियों के छठी के बाद पढ़ाई करने पर रोक लगाई है। ये क़दम इस्लाम रके पूरी तरह ख़िलाफ़ है। शिक्षा हासिल करने के मामले में भी इस्लाम में पुरुषों और महिलीओं के बराबर अधिकार हैं। एक हदीस के मुताबिक़ मुहम्मद (सअव) साहब ने कहा था, ‘इल्म हासिल करना हर मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है।’ क़ुरआन नें 756 आयतो में अक़्ल का इस्तेमाल की नसीदत दी गई है। कई आयतों में इल्म वालों के लिए निशानियों की बात कही गई हैं। इससे इस्लाम में इल्म यानि शिक्षा की अहमियत का पता चलता है। लड़कियों को पढ़ने से रोकना अल्लाह और उसके रसूल की नाफरमानी है। ये दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि ये क़दम इस्लाम के नाम पर उठाया जा रहा है। तालिबान को डर है कि पढ़लिख कर हर लड़की मलाला बन जाएगी तो उसकी हुकूमत की बुनियाद हिल जाएगी।

हैरानी और इससे भी ज़्यादा दुर्भाग्य की बात है कि तालिबान लोगों को अपनी मासूम लडकिय़ों और विधवाओं की शादी अपने लड़ाकों से करने का दबाव बना रहा है। इस्लाम में जबरन शादी की कोई जगह नहीं हैं। शादी मुहम्मद (सअव) साहब की सबसे सुन्नतों में एक है। इस्लाम में शादी के लिए लड़का-लड़की दोनों की सहमति ज़रूरी है। इस्लामी उसूलों के मुताबिक़ किसी भी लड़की की शादी उसकी मर्ज़ी के बग़ैर नहीं हो सकती। हदीसों में ऐसे कई उदाहरण हैं कि मुहम्मद (सअव) साहब से किसी महिला ने आकर बताया कि उसका निकाह उसकी मर्ज़ी से नहीं हुआ या फिर उसे उसका शौहर पसंद नहीं। मुहम्मद (सअव) साहब ने फ़ौरन उसका निकाह तुड़वा दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि तालिबान किस आधार पर लोगों पर उनकी लड़कियों के निकाह अपने लड़ाकों से करने का दबाव डाल रहा है? उसका यह क़दम भी इस्लाम के ख़िलाफ है।

इस्लामी उसूलों पर नहीं तालिबान की बुनियाद

क़ुरआन और हदीसों में बताए गए इस्लामी हुकूमत केम बुनियादी उसूलों की कसौटी पर परखने पर तालिबान का तथाकथित इस्लामी निज़ाम रेत की तरह बिखरता नज़र आता है। इस्लाम लोगों को बेख़ौफ़ होकर अमन सुकून के साथ जियो और जीने दो की नीति पर चलते हुए ज़िंदगी गुज़ारने का हुक्म देता है। इसके उलट तालिबान आधुनिक हथियारों से लेस अपने लड़ाकों के ज़रिए उन लोगों में ख़ौफ पैदा करके उनका चैन सुकून उजाड़ रहा है जिन पर वो अपनी हुकूमत करना चाहता है। 1996 से 2001 तक तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में इस्लाम के नाम पर जो कुछ किया वो किसी से छिपा नहीं है। उसकी ताक़त उसके ब्रेनवाश किए हुए लड़ाके हैं। तालिबान का इस्लाम और इस्लामी उसूलों से कोई वास्ता नहीं है। वो अपनी हरकतों से इस्लाम को बदनाम कर रहा है।

islam of taliban के नाम पर औरतों पर तमाम तरह का पाबंदियों लगाने वाला और ज़ुल्मों सितम का हदे पार करने वाल तालिबान न तो इस्लाम की रहनुमाई करता है। और न ही इस्लाम का पैरोकार है। अगर वो अपनी हुकूमत को इस्लामी हुकूमत कहता है तो फिर मे ये बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उसका इस्लाम वो इस्लाम नहीं हैं जिसकी बुनियाद क़ुरआन हैं। तालिबान का इस्लाम कोई दूसरा है जिसे उसने ख़ुद गढ़ा है। अपने गढ़े हुए इस्लाम का जड़े पहले भी वो अपनी हुकूमत के बूते अफ़ग़ानिस्तान में जमा चुका है। एक बारप फिर वो इसी कोशिश में है। ( islam of taliban ) ( islam of taliban ) ( islam of taliban ) ( islam of taliban )

 

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