कृषि कानून इतने जरूरी क्यों हैं?

केंद्र सरकार अपने बनाए तीन कृषि कानूनों को इतना जरूरी क्यों मान रही है कि उस पर समझौता करने को तैयार नहीं हो रही है? आखिर इन कानूनों में ऐसा क्या है और क्यों इनकी इतनी जरूरत है, जो सरकार किसी की बात नहीं सुन रही है और किसी हाल में इन पर अमल करने पर अड़ी है? आखिर इतने बरसों से ये कानून नहीं बने थे तब भी भारत में खेती-किसानी का काम चल रहा था और किसी किसान संगठन ने सरकार से नहीं कहा था कि उनको सुधारों की जरूरत है, फिर क्यों इतने सारे विरोध के बावजूद और सारे नियम-कानूनों को ताक पर रख कर सुधार किए गए?

सोचें, सरकार की ओर से क्या क्या दलीलें दी जा रही हैं। सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि अगर इन कानूनों पर सरकार पीछे हटती है और कानून वापस लेती है तो एक गलत नजीर बनेगी। फिर कोई भी सड़क पर धरना देकर सरकार को कानून बदलने के लिए बाध्य कर सकता है। हकीकत यह है कि सरकार अपने नागरिकों की बात सुन कर फैसला करती है तो उससे अलग नजीर बनती है, उससे लोकतंत्र मजबूत होता है। सरकार और उसके समर्थकों की ओर से कहा जा रहा है कि अगर कानून वापस हुआ तो अगले एक सौ साल में कोई भी कृषि सुधार करने के बारे में नहीं सोचेगा। सवाल है कि ऐसे सुधारों की जरूरत क्या है? जब दुनिया भर में कृषि कार्य घाटे का काम बनता जा रहा है और सरकारें सब्सिडी देकर किसानों को बचा रही है तो भारत सरकार क्यों सुधारों पर अड़ी है?

कानून बना कर लागू करने, संसद से पास कराने और अब उस पर अड़े रहने की घटनाओं से साफ पता चल रहा है कि सरकार ने इसे बहुत जरूरी माना है। तभी कोरोना वायरस की महामारी के बीच अध्यादेश के जरिए इन कानूनों को लागू किया गया। सोचें, देश में इतना बड़ा कृषि सुधार हो रहा है, जो भूतो न भविष्यति है और वह पिछले दरवाजे से हो रहा है! अगर यह देश के किसानों की किस्मत बदलने वाला कानून है तो इसे किसी हाल में महामारी के समय और अध्यादेश के जरिए नहीं लागू होना चाहिए था। सरकार ने किसी से सलाह-मशविरा नहीं किया, किसी किसान संगठन से बात नहीं की, कृषि अर्थशास्त्रियों की राय नहीं ली और चार जून को अध्यादेश के जरिए इन कानूनों को लागू कर दिया।

उसके बाद सरकार ने देरी से शुरू हुए छोटे से मॉनसून सत्र में इन्हें विधेयक के तौर पर पेश किया। लोकसभा में सरकार ने अपने प्रचंड बहुमत के दम पर पास कराया और राज्यसभा में जहां उसे बहुमत नहीं था वहां विपक्ष की वोटिंग की मांग को दरकिनार कर जोर जबरदस्ती के जरिए ध्वनि मत से बिल पास करा लिया। सोचें, जिस बिल का इतना विरोध हो रहा था उसे न तो संसदीय समिति को भेजा गया, न प्रवर समिति में भेजा गया और न विस्तार से चर्चा करा कर उस पर वोटिंग की जरूरत समझी गई। अब जबकि इसका तीव्र विरोध होने लगा है तो पहले पुलिस के जरिए आंदोलन रोकने का प्रयास हुआ और अब केंद्रीय एजेंसियों के जरिए आंदोलनकारी किसानों को डराने का काम हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट के जरिए भी आंदोलन खत्म कराने का प्रयास हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने कानून समर्थकों की एक कमेटी बना दी है। सरकार नौ बार किसानों से बात कर चुकी है और वार्ता एक इंच आगे नहीं बढ़ रही है। सरकार अड़ गई है कि कानून वापस नहीं होगा, चाहे जो हो जाए।

तभी यह सवाल बहुत अहम है कि आखिर ये कानून इतने जरूरी क्यों हैं? ऐसा इस कानून में क्या है, सिवाए सरकार के ईगो के, जिसकी वजह से वह इतनी अड़ी हुई है? यह भी सवाल है कि इस कानून से किसानों का भला होने का जो दावा केंद्र सरकार कर रही है उसे किसान क्यों नहीं समझ रहे हैं? असल में यह कानून किसानों से ज्यादा गिने-चुने कारपोरेट घरानों के हितों को पूरा करने वाला है और एक बड़ी आर्थिक योजना का हिस्सा है। यह कितनी तरह से साबित हो गया है कि कुछ कारपोरेट घरानों ने कुछ समय पहले से कृषि और कृषि उत्पादों से जुड़े कारोबार में घुसना शुरू किया था। धीरे धीरे उन घरानों ने अपना बड़ा बुनियादी ढांचा खड़ा किया और इस दौरान विलय व अधिग्रहण के जरिए कृषि उत्पादों के कारोबार या रिटेल कारोबार में अपने को स्थापित किया। उसके तुरंत बाद ये कथित सुधार कानून आ गए, जिनकी उनको सख्त जरूरत थी।

यह प्रक्रिया यहीं पर रूकने वाली नहीं है। इसके आगे कई ऐसे काम होने वाले हैं, जिनसे उनके कारोबार को फायदा होगा। किसानों और सरकारी कंपनियों की कीमत पर ऐसा होगा। इसे सिर्फ एक मिसाल से समझा जा सकता है। देश के एक कारपोरेट घराने अडाणी समूह ने कई राज्यों में अनाज भंडारण के लिए बड़े साइलोज बनाए हैं। उसने खाने-पीने की चीजों का बड़े पैमाने पर उत्पादन और मार्केटिंग शुरू किया है। देश के लगभग सभी बंदरगाहों पर उस कंपनी का नियंत्रण हो गया है। एक साथ छह हवाईअड्डे उसे मिल गए हैं और उसने मुंबई का मौजूदा और नया बन रहा एयरपोर्ट भी हासिल कर लिया है। यानी ट्रांसपोर्टेशन के बड़े साधनों पर उसका नियंत्रण हो रहा है। इस बीच सरकार ने मुनाफा कमाने वाली सरकारी कंपनी कंटेनर कारपोरेशन ऑफ इंडिया को बेचने का फैसला कर लिया। ध्यान रहे कंटेनर कारपोरेशन देश की सबसे बड़ी लॉजिस्टिक कंपनी है। इसके डिपो हर जगह हैं, खास कर रेल, बंदरगाह और हवाईअड्डों के आसपास। भारत सरकार एक और मुनाफा कमाने वाली कंपनी शिपिंग कारपोरेशन ऑफ इंडिया को बेच रही है। सोचें, अगर ये दोनों कंपनियां किसी तरीके से अडाणी समूह के पास चली जाती हैं तो कई चीजों पर उसका कैसा एकाधिकार बनेगा!

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