आर्थिकी, चीन, कोरोना क्यों नहीं हैं मुद्दा?

बिहार में विधानसभा का चुनाव प्रचार अब तेजी पकड़ने लगा है। आखिरी चरण के नामांकन का काम पूरा होना है लेकिन दो चरणों में डेढ़ सौ से ज्यादा सीटों के लिए प्रचार शुरू हो गया है। भाजपा के राष्ट्रीय नेता चुनाव प्रचार में उतर गए हैं और बिहार की क्षेत्रीय पार्टियों का प्रचार तो पहले से ही गरमाया हुआ है। पर हैरानी की बात है कि पूरे बिहार चुनाव में देश की अर्थव्यवस्था कोई मुद्दा नहीं है। चीन के भारतीय सीमा पर डटे होने और भारत की जमीन कब्जाने का मुद्दा भी बिहार के चुनाव में नहीं उठाया जा रहा है और कोरोना वायरस से मुकाबले में भारत किस तरह से पिटा है और आगे भारत की क्या दुर्दशा होने वाली है, इसे लेकर भी कोई चर्चा नहीं हो रही है।

यह हैरानी की बात है कि बिहार को राजनीतिक रूप से बेहद जागरूक माना जाता है इसके बावजूद कोई राष्ट्रीय मुद्दा बिहार के चुनाव में महत्व का बनता नहीं दिख रहा है। अगर कोरोना की बात करें तो बिहार में संक्रमितों की संख्या दो लाख पहुंच गई है। लेकिन बिहार के लोग इस बात से खुश हैं कि देश में सबसे बेहतरीन रिकवरी रेट यानी ठीक होने की दर बिहार की है। बिहार में कोरोना के 94 फीसदी से ज्यादा मरीज ठीक हो जा रहे हैं। इसलिए इस पर चर्चा करने की जरूरत नहीं है और इससे घबराने या चिंता करने की भी जरूरत नहीं है। भाजपा के साथ अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस पर बहुत जोर दिया। उन्होंने कहा कि बिहार में देश के दूसरे अनेक राज्यों के मुकाबले ज्यादा टेस्टिंग हो रही है और बिहार में ज्यादातर लोग इलाज से ठीक हो जा रहे हैं।

उन्होंने कह दिया और इसे मान लिया गया है! विपक्षी पार्टियों को भी यह समझ में नहीं आ रहा है कि वे पूछें कि बिहार में किस तरह की टेस्टिंग हो रही है? आरटी-पीसीआर टेस्ट कितने हो रहे हैं? रैपिड एंटीजन टेस्ट में जिनकी रिपोर्ट निगेटिव आ रही है उनमें से कितने प्रतिशत लोगों का आरटी-पीसीआर टेस्ट हो रहा है? देश का कोई वैज्ञानिक भी बिहार से यह सवाल नहीं पूछ रहा है कि किस तकनीक से बिहार में 94 फीसदी से ज्यादा लोग ठीक हो रहे हैं? अगर बिहार के पास कोई औषधि है या इलाज है तो वह देश भर को बताया जाना चाहिए ताकि दूसरी जगहों पर भी उसे रोका जाए। पर यह सवाल ही नहीं उठ रहा है। कोरोना वायरस का संक्रमण शुरू होने के बाद राज्य की नीतीश कुमार ने इससे निपटने की जो नीति बनाई थी उस बारे में भी सवाल नहीं पूछा जा रहा है। उस समय यानी अप्रैल-मई में यह बड़ा मुद्दा था। पर समय के साथ यह मुद्दा खत्म हो गया है। जिन लोगों को केंद्र सरकार की गलत नीतियों के कारण पलायन के लिए मजबूर होना था और नीतीश कुमार की वजह से जिनके लिए अपने राज्य में घुसना भी मुश्किल हो रहा था वे भी अब हिंदू-मुसलमान या अगड़ा-पिछड़ा-दलित की राजनीति में उलझे हैं।

देश की अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठा हुआ है और इसका सबसे ज्यादा असर बिहार जैसे गरीब राज्यों पर हुआ है। कोरोना वायरस का संक्रमण शुरू होने से पहले ही अर्थव्यवस्था की गाड़ी पटरी से उतर गई थी। लगातार सात तिमाही से विकास दर में कमी आ रही थी। कोरोना वायरस ने इस संकट को और बढ़ा दिया। अब इस पूरे साल देश की जीडीपी की विकास दर निगेटिव रहने वाली है। इसके बावजूद बिहार में अर्थव्यवस्था कोई मुद्दा नहीं है। छठ तक केंद्र सरकार ने पांच किलो अनाज और एक किलो दाल फ्री कर दिया है तो लोग उसी में खुश हैं। उनको लग रहा है कि सरकार इससे ज्यादा क्या कर सकती है। बाकी तो सबकी अपनी अपनी किस्मत है।

चीन का मसला हो या दुनिया के हालात की बात हो, बिहार के चुनाव में इसकी भी कोई चर्चा नहीं है। यह एक बड़ा मसला है, जिस पर अलग से चर्चा की जा सकती है कि आखिर देश की क्षेत्रीय पार्टियों के पास अंतरराष्ट्रीय नजरिया क्यों नहीं है? क्या अंतरराष्ट्रीय और सामरिक मसलों पर बात करने का अधिकार सिर्फ कांग्रेस और भाजपा को है? इस मामले में एक अपवाद आम आदमी पार्टी का है, जिसके नेता हर छोटी-बड़ी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटना पर प्रतिक्रिया देते हैं। पर बिहार के लोग, जिनको राजनीतिक रूप से बहुत सजग माना जाता है वे अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों को राजनीति का मुद्दा नहीं बनाते हैं।

बहरहाल, चीन ने भारत की सीमा में घुसपैठ की है। उसने कई इलाकों में भारत की जमीन कब्जाई है। लेकिन यह बिहार का मुद्दा नहीं है। बिहार रेजिमेंट के 20 जवान 15 जून को गलवान घाटी में शहीद हुए थे। परंतु उनकी शहादत भी बिहार के लोगों में यह भाव नहीं जगा सकी कि सीमा पर देश की संप्रभुता को चीन चुनौती दे रहा है और इस बारे में केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी से सवाल पूछा जाना चाहिए। हो सकता है कि राहुल गांधी चुनाव प्रचार करने जाएं तो वे कोरोना और अर्थव्यवस्था को संभालने में सरकार की विफलता का मुद्दा उठाएं और चीन के मसले पर भी सरकार को निशाना बनाएं। लेकिन बिहार की एक दर्जन क्षेत्रीय पार्टियां इसे मुद्दा नहीं बना रही हैं।

बिहार की क्षेत्रीय पार्टियों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा जातीय समीकरण साधने का है। हर पार्टी इसमें व्यस्त है कि किसने किन जातियों को कितनी टिकट दी है, किसकी कथित तौर पर अनदेखी की गई है, किसका ध्यान रखा गया है और किसके साथ किस जाति का समीकरण बैठ रहा है। एक पार्टी जाति के गणित से अपने को ऊपर दिखा रही है तो उसके नेता हिंदू-मुस्लिम और भारत-पाकिस्तान का चुनाव बनाने में लगे हैं। भाजपा के कई नेता बिहार में पाकिस्तान, आतंकवाद आदि का मुद्दा उठा चुके हैं, जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। असल में आर्थिक पिछड़ेपन और शिक्षा की कमी ने बिहार के लोगों को जाति व धर्म के सीमित एजेंडे में ही राजनीति करने वाला बना दिया है।

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