गरिमा खोते अफसरों पर आफत - Naya India
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गरिमा खोते अफसरों पर आफत

सरकारें बदलती रहती हैं, नेताओं का आना जाना लगा रहता है लेकिन अधिकारी तो वही रहते हैं और यह विश्वास किया जाता है कि अधिकारी ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे उनकी गरिमा नष्ट हो, उन पर किसी प्रकार के आरोप लगें और कम से कम आपस में तो ईर्ष्याभाव ना रखें। लेकिन अब यही सब हो रहा है। अफसरों ने पहले मनमाफिक पोस्टिंग पाने के लिए नेताओं की जी हजूरी की, फिर उनके दबाव में उल्टे-सीधे काम किए और जब धीरे-धीरे व्यवहार में लचीलापन आता गया तो फिर स्वयं ही नेता जैसे बनने लगे और अब हालत यह है कि आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों के बीच गला-काट गुटबाजी उफान पर है।

आईएएस और आईपीएस के बीच पुलिस कमिश्नर प्रणाली को लेकर खींचतान है लेकिन आपस में ही जिस तरह की गुटबाजी है उसके कारण अफसरों की ना केवल गरिमा गिरी है वरन दक्षता भी प्रभावित हुई है। तंत्र के कमजोर होने का अंततः असर गण पर पड़ेगा और जिन लोगों ने तंत्र को कमजोर करने की कोशिश की है उन्हें भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। जब सभी जानते हैं कि पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करना आसान नहीं है तो क्यों हर बार राम मंदिर के मुद्दे की तरह इस पर बात की जाती है और फिर क्यों पीछे हट जाते हैं। इस मुद्दे पर अफसरों में तकरार शुरू हुई वह अन्य मुद्दों तक पहुंच गई और अब एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। यही हाल आईएफएस अफसरों के बीच भी है।

बहरहाल मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने अफसरों की आफत बढ़ा दी है। वैसे तो ब्लैकमेलिंग से जुड़े बहुचर्चित हनी ट्रैप मामले में नेता भी शामिल हैं लेकिन अफसरों पर आफत आ गई है। कोई भी आदेश अफसरों के हस्ताक्षर से निकलता है जो सिद्ध करता है कि किसको उपकृत करने के लिए कौन सा आदेश निकाला गया और हनी ट्रैप मामले में ऐसा ही नजारा है जिसमें नियमों को ताक पर रखकर उपकृत किया गया है। यही नहीं शुरुआती जांच में जिस तरह से पुलिस ऑफिसरों के बीच आपस में तनातनी चली उससे भी अफसरों पर संदेह गहराया है खासकर मंत्रालय और पीएचक्यू में बैठे कुछ अधिकारियों ने समूची अफसर बिरादरी पर संदेह बनवा दिया है जबकि मैदान में तैनात अधिकारी दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। राजनैतिक कार्यकर्ताओं का सामना कर रहे हैं उनकी समस्याओं का समाधान कर रहे हैं और विकास कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं लेकिन भोपाल में बैठे अफसर ना केवल अपनी गरिमा के विपरीत काम कर रहे हैं वरन अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन नहीं कर पा रहे हैं।

अब जब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इंदौर की जांच पर सवाल उठाए तब उन अफसरों पर आफत बनाई है जो यह मानकर चल रहे थे कि जांच अब ठंडे बस्ते में चली गई है। कोर्ट को जब यह बताया गया कि आरोपी महिलाओं की आवाज वीडियो की जांच भोपाल स्थित लैब में कराई जा रही है तो इस पर कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि निष्पक्ष जांच तो संभव है ही नहीं, सरकार भी आपकी, लैब भी आपकी तो फिर सही रिपोर्ट कैसे आ सकती है और सभी वीडियो आवाज सुनने के नमूने एसआईटी द्वारा जप्त सभी इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज हैदराबाद में भेजने के आदेश दिए वहीं शासन द्वारा स्टेटस रिपोर्ट पेश नहीं करने पर 15 दिन में पेश करने के लिए कहा। साथ ही इस केस के लिए एसपी अवधेश गोस्वामी को ऑफिसर इंचार्ज ओआईसी बनाया गया है। हाईकोर्ट के ऐसे निर्देश के बाद अफसरों के बीच हड़कंप है।

कुल मिलाकर हनी ट्रैप मामले के खुलासे के बाद शासन और प्रशासन में नए सिरे से जमावट करने की जरूरत महसूस की जा रही है। शुरुआती जांच के दौरान जिस तरह से अफसरों की आपस में तनातनी उजागर हुई थी उसके बाद ही लोगों में जांच के प्रति संदेह पैदा हुआ था और इसी के चलते कुछ लोग हाईकोर्ट की शरण में गए। ऐसे में विश्वास खो चुके अफसरों को महत्वपूर्ण पदों से हटाकर ही विश्वास अर्जित किया जा सकता है जिससे अफसरों की ना केवल खोई हुई गरिमा वापस लौटे वरन अफसरों के बीच अंतर भी साफ नजर आना चाहिए कि कौन कर्तव्य परायण है और कौन हनी-मनी के फेर में लगा हुआ है।

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