वैक्सीनेशन कोई इवेंट नहीं है!

बहुत समय नहीं हुआ, जब इवेंट का मतलब सिर्फ कल्चरल इवेंट होता था। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावा किसी और कार्यक्रम को इवेंट नहीं कहा जाता था। राजनीतिक रैलियां होती थीं, सभा और सम्मेलन होते थे, रोड शो होते थे लेकिन इनको इवेंट नहीं कहा जाता था। सरकारों द्वारा कानूनों का निर्माण एक सहज प्रक्रिया मानी जाती थी और बड़े से बड़े कानून के लिए भी आधी रात का सत्र बुला कर उसे इवेंट बनाने की जरूरत कभी नहीं महसूस की गई। किसी वैज्ञानिक उपलब्धि और मेडिकल इमरजेंसी को इवेंट बनाने के बारे में तो सोचा ही नहीं जा सकता था। लेकिन संयोग से अभी केंद्र में ऐसी सरकार बनी है, जो हर छोटी-बड़ी चीज को इवेंट में बदल देती है।

इस सरकार ने एक सौ के करीब नई योजनाएं शुरू की हैं और हर योजना एक बड़े इवेंट के तौर पर शुरू की गई। यह अलग बात है कि इनमें से ज्यादातर योजनाओं का क्या हासिल हुआ वह किसी को पता नहीं है। अब तो लोग उन योजनाओं के नाम भी भूलने लगे हैं। इसी सरकार ने जीएसटी कानून को आधी रात का सत्र बुला कर इवेंट बना दिया। उसके बाद इस कानून में जीएसटी कौंसिल ही दर्जनों बार बदलाव कर चुकी है और साढ़े तीन साल बाद भी कारोबारी और साथ साथ अर्थव्यवस्था भी इसकी मार से कराह रही है।सरकार ने मंगल यान के प्रक्षेपण को भी इवेंट बना दिया था। किसी अंतरिक्ष यान के प्रक्षेपण का सफल नहीं होना बहुत स्वाभाविक बात है, लेकिन जब इसे देश की चुनी हुई सरकार और मीडिया एक बड़े इवेंट में तब्दील कर दे तो मिशन का विफल होना वैज्ञानिकों से लेकर देश के आम नागरिक के मनोबल पर भी बड़ा असर डालता है। भारत के मंगल यान मिशन के सफल नहीं होने का ऐसा ही असर हुआ।

बहरहाल, अब यहीं काम कोरोना वायरस को रोकने के लिए चल रहे वैक्सीनेशन अभियान के साथ किया गया है। इसे भी एक इवेंट बना दिया गया। जिस तरह से इसरो के पास दशकों का अनुभव था और उसके वैज्ञानिक अपना काम कर रहे थे उसी तरह वैक्सीन के क्षेत्र में भी भारत के पास दशकों का अनुभव है। भारत की निजी कंपनियां वैक्सीन की ट्रायल और निर्माण दशकों से कर रही हैं। केंद्र में भाजपा की पहली सरकार बनने से भी पहले से भारत में वैक्सीन का निर्माण हो रहा है और सारी दुनिया को भेजा जा रहा है। लेकिन कोरोना वायरस की वैक्सीन के बारे में ऐसा प्रचार कराया गया, जैसे पहली बार भारत में कोई वैक्सीन बनी है और पहली बार टीका लग रहा है!

वैक्सीनेशन को इस तरह से इवेंट में बदल देने और इसका श्रेय लेने की जल्दबाजी का नतीजा यह हुआ है कि वैक्सीन पर लोगों का भरोसा नहीं बन पा रहा है। चूंकि सरकार, मीडिया और वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों ने इसे एक इवेंट बना दिया, इस वजह से इससे जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात रिपोर्ट होने लगी। इसमें सोशल मीडिया का भी अपना हाथ रहा क्योंकि सत्तारूढ़ दल का आईटी सेल वैक्सीन बनने और लगने की पूरी प्रक्रिया का श्रेय प्रधानमंत्री को देने में लगा हुआ था। जब सारी छोटी-बड़ी बातें रिपोर्ट होने लगीं तो वैक्सीन के ट्रायल में आई समस्याओं से लेकर टीका लगने के बाद होने वाले साइड इफेक्ट्स की बात भी लोगों तक पहुंच गईं। ऐसा नहीं है कि यह पहली वैक्सीन है, जिसका साइड इफेक्ट हो रहा है। हर वैक्सीन का साइड इफेक्ट होता है। अब भी बच्चों को टीका लगाते हुए डॉक्टर बताते हैं कि बुखार आ सकता है या इंजेक्शन की जगह पर सूजन संभव है। इसके बावजूद लोगों को वैक्सीन पर भरोसा इसलिए होता है क्योंकि उन्हें इवेंट बना कर लांच नहीं किया गया था।

इस बार चूंकि वैक्सीनेशन को इवेंट बनाना था इसलिए कई पैमानों और मानकों का ध्यान नहीं रखा गया। एक साल के अंदर वैक्सीन तैयार की गई और भारत में एक वैक्सीन को तो तीसरे चरण के क्लीनिकल ट्रायल का डाटा आए बगैर इस्तेमाल की मंजूरी दे दी गई। अगर इसे इवेंट नहीं बनाया गया होता तो लोग इस बात का नोटिस नहीं लेते या इसके प्रति बहुत सजग नहीं रहते। दूसरी बात यह है कि कोरोना की वैक्सीन के बारे में डॉक्टरों से ज्यादा बात नेताओं ने की है। अगर सिर्फ डॉक्टर इसकी बात कर रहे होते तो तमाम कमियों के बावजूद लोगों का इस पर भरोसा बनता। लेकिन डॉक्टर की बजाय प्रधानमंत्री वैक्सीन की बात करते थे। वे वैक्सीन बनते हुए देखने दवा कंपनियों की फैक्टरी में चले गए। इसकी तैयारियों पर लगातार वे बैठकें करते रहे। मुख्यमंत्रियों के साथ मीटिंग करते रहे। सिर्फ इसी की खबरें आईं। वैक्सीन पर बनी विशेषज्ञ समिति और दूसरे डॉक्टरों की बातों का जिक्र ही नहीं हुआ। वैक्सीन की मंजूरी से लेकर इसके लांच होने तक सेटेलाइट प्रक्षेपण की तरह उलटी गिनती चली और फिर एक बड़े इवेंट में इसे लांच किया गया।

अगर इसे इवेंट नहीं बनाया गया होता तो छोटी-छोटी कमियों को दरकिनार करके टीका लगवाते। पर चूंकि इसका इतना हल्ला मचा है कि 580 लोगों पर साइड इफेक्ट होने की खबर बड़ी खबर बन गई। ऊपर से प्रधानमंत्री सहित देश का कोई नेता टीका नहीं लगवा रहा है। सो, लोग भी हिचकने लगे हैं। उनका भरोस नहीं बन रहा है। यहीं कारण है कि केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य में रजिस्ट्रेशन कराने वालों में सिर्फ 25 फीसदी लोगों ने ही टीका लगवाया। जहां अच्छी स्थिति है वहां भी 70 फीसदी से ज्यादा लोगों ने टीका नहीं लगवाया है। इतने बड़े इवेंट की तरह इसे लांच किया गया पहले दो बार मॉक ड्रिल भी हुई इसके बावजूद इसके लिए बनाया गया डिजिटल एप्लीकेशन कोविन ज्यादातर जगहों पर फेल हो गया।

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