लद्दाख की जमीनी स्थिति क्या है?

भारत सरकार लद्दाख में चीन के साथ चल रहे गतिरोध पर तमाम किस्म की बातें कर रही हैं पर सारी बातें बहुत अस्पष्ट हैं। इसमें संदेह नहीं है कि सरकार की प्रतिबद्धता है कि वह देश की संप्रभुता और सीमा की सुरक्षा करेगी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बहुत जोर देकर संसद के दोनों सदनों में कहा कि दुनिया की कोई भी ताकत भारत को अपनी सीमा तक गश्त करने से नहीं रोक सकती है और भारत अपनी सीमा और संप्रभुता की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि न कोई सीमा में घुसा है, न कोई घुस आया है। भारत सरकार की ओर से यह भी कहा जा चुका है कि दुनिया की कोई भी ताकत भारत की एक इंच जमीन भी कब्जा नहीं कर सकती है। सो, सरकार की प्रतिबद्धता पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है।

पर सवाल यह है कि सरकार ये लद्दाख की वास्तविक जमीनी स्थिति क्यों नहीं स्पष्ट कर रही है? मीडिया चैनल और रक्षा व सामरिक मामलों के जानकार इधर उधर की सेटेलाइट तस्वीरों के हवाले बताते रहते हैं कि चीन की सेना यहां तक घुस गई तो वहां उसने बंकर बना लिए तो वहां सेना की तैनाती बढ़ा दी या अमुक जगह पर पक्का स्ट्रक्चर बना लिया आदि आदि। अगर सरकार अपनी ओर से दोनों सेनाओं की स्थिति स्पष्ट करे, यह बता दे कि भारतीय सेना इस समय किस बिंदु पर मौजूद है और कहां तक गश्त कर रही है तो अपने आप सारी उलझनें और अटकलें बंद हो जाएंगी। पर सरकार वास्तविक जमीनी स्थिति बताने की बजाय सूत्रों के हवाले से एक खास न्यूज एजेंसी को खबर देती है कि भारतीय सैनिक अमुक इलाके में अमुक-अमुक चोटियों पर बैठ गए हैं। इन खबरों में कभी भी यह नहीं बताया जाता है कि ये चोटियां पहले से अपनी ही हैं या नई चोटी है, जिस पर भारत ने कब्जा किया है या अपनी चोटी है पर भारतीय सेना पहले वहां तक नहीं जाती थी या भारत की चोटी है और चीन ने कब्जा कर लिया था उसे छुड़ा लिया गया, इस तरह के सवालों के जवाब नहीं दिए जाते हैं।

पिछले दिनों सूत्रों के हवाले से खबर आई कि देपसांग प्लेन के एक बड़े इलाके में भारतीय सेना पिछले 10-15 साल से गश्त नहीं करती है यानी भारत ने अपना कब्जा छोडा हुआ है। सवाल है इस खबर का इस समय क्या मतलब है? अब उन इलाकों की क्या स्थिति है, जिन पर भारतीय सेना पिछले 10-15 साल से गश्त नहीं करती थी? ध्यान रहे देपसांग का मैदानी इलाका पूरे लद्दाख की सुरक्षा के लिए बहुत अहम है। इस इलाके में सेना अपने ही इलाके में गश्त रोकने की जोखिम नहीं ले सकती है।

देपसांग के मैदानी इलाके में 972 वर्ग किलोमीटर इलाके को लेकर कहा जा रहा है कि यहां लंबे समय से गश्त नहीं होती है और इसी इलाके को लेकर खबर आई की चीन ने इस पर कब्जा कर लिया है। इस बारे में भी सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। मोटा-मोटी या ढके-छिपे शब्दों में बात कहने से बात नहीं बनेगी। इस चक्कर में ही भारत पूर्वी सीमा पर डोकलाम में बडी रणनीतिक बढ़त गंवा बैठा है। उसी से चीन को ज्यादा साहस मिला, जो उसने लद्दाख में भारत को परेशान करना शुरू किया है। यह इलाका लाइन ऑफ पेट्रोलिंग से आगे है। सो, सरकार को देपसांग में जमीन कब्जा किए जाने की खबरों के बारे में स्पष्ट रूप से जानकारी देनी चाहिए।

इसके अलावा भारतीय सेना के गश्त करने वाले इलाकों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कहा जा रहा है कि मार्च-अप्रैल में जब चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा, एलएसी पर गतिरोध शुरू हुआ उससे पहले ही पैंगोंग झील के पास भारतीय सेना की गश्त सीमित हो गई थी। क्या चीन की वजह से यह गश्त सीमित हो गई थी? खबर है कि पैंगोंग झील के पास चीन ने पेट्रोलिंग प्वाइंट चार से आगे भारतीय सेना को गश्त करने से रोक दिया। ध्यान रहे पेट्रोलिंग प्वाइंट आठ तक भारतीय सेना गश्त करती रही है और उसके आगे ही वास्तविक नियंत्रण रेखा का इलाका शुरू होता है। इस खबर के मुताबिक भारत को अपने ही इलाके में गश्त करने से चीन ने रोका।

यह भी कहा जा रहा है कि देपसांग के मैदानी इलाके में मई के पहले ही पेट्रोलिंग प्वाइंट 10, 11, 11ए, 12 और 13 तक चीन ने भारतीय सेना को गश्त करने से रोक दिया था। ये पांच पेट्रोलिंग प्वाइंट भारत की सामरिक स्थिति की मजबूती के लिए बहुत अहम हैं। भारत को इस बारे में भी लोगों को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए। अफसोस की बात है कि भारत सैन्य और कूटनीतिक दोनों तरह की बातें कर रहा है पर लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक चीन के साथ बने गतिरोध में भारतीय सेना की जमीनी स्थिति क्या है यह नहीं बताया जा रहा है। इस अस्पष्टता या कुछ हद तक जानकारी छिपाने से चीन को ही मजबूती मिल रही है। उसको लग रहा है कि भारत सरकार सूचना छिपा रही है, जिससे उसका हौसला बढ़ा है। सरकार को सुरक्षा के लिए लिहाज से गोपनीय मानी जाने वाली बातों को छोड़ कर जमीनी स्थिति के बारे में बताना चाहिए और साथ ही खुल कर चीन को हमलावर बताते हुए उसे कठघरे में खड़ा करना चाहिए।

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