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Saturday, April 17, 2021
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चीन के साथ टकराव में आगे क्या?

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भारत और चीन के बीच पिछले 45 दिन से चल रहा गतिरोध हिंसक टकराव में बदल गया है। चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा, एलएसी पर यथास्थिति बदल दी है। हालांकि सरकार यहीं कह रही है कि यथास्थिति बदलने का प्रयास किया है, जिसकी वजह से झड़प हुई, जिसमें भारत के कम से कम एक बड़े अधिकारी सहित 20 जवान शहीद हो गए।

सोचें, डोकलाम का 72 दिन का गतिरोध हिंसक झड़प में नहीं बदला था पर लद्दाख में 44 दिन में ही ऐसी हिंसक झड़प हो गई, जैसी पिछले 45 साल में नहीं हुई थी। इसका मतलब है कि चीन इस समय किसी न किसी वजह से बौखलाया हुआ है और वह जान बूझकर टकराव बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। ऐसे प्रयास वह पूरी दुनिया में कर रहा है। उसने दक्षिण चीन सागर में वियतनाम और फिलीपींस के साथ मोर्चा खोला है तो एशिया प्रशांत में ऑस्ट्रेलिया और भारत दोनों से टकरा रहा है। उसने अमेरिका के खिलाफ भी मोर्चा खोला है।

अब सवाल है कि सोमवार की रात को पूर्वी लद्दाख की गालवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत के पास आगे बढ़ने का क्या रास्ता है? पहला और सबसे उपयुक्त रास्ता तो यह है कि भारत किसी तरह से चीन पर दबाव बनाए कि वह गालवान घाटी, डेमचक, पैंगोंग और दौलत बेग ओल्डी में भारत की कब्जाई जमीन छोड़े। अगर वह इसके लिए तैयार नहीं होता है तो भारत को सीमित युद्ध की तैयारी करनी चाहिए और जिस तरह से पाकिस्तान से कारगिल की चोटी छुड़ाई गई थी उसी तरह से चीन के कब्जे से अपनी जमीन छुड़ाई जाए। पर कारगिल के बाद पिछले 20 साल में दुनिया बहुत आगे बढ़ गई है और अब विवाद सुलझाने के कई तंत्र विकसित हो गए हैं, जिनके जरिए बातचीत हो सकती है और तनाव कम किया जा सकता है।

भारत के चाहे अनचाहे भी दुनिया के देश और जो बहुपक्षीय मंच दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों को आपस में लड़ने नहीं देंगे। भारत के नहीं चाहने के बावजूद इसमें पंचायत होगी। भले अमेरिका या कोई एक देश नहीं आए पर किसी न किसी बहुपक्षीय मंच के जरिए वार्ता की शुरुआत हो सकती है। असल में समस्या को सुलझाने के लिए तनाव घटाना एक जरूरी शर्त है। तनाव घटने पर ही नए सिरे से बात शुरू हो सकती है। यह भी ध्यान रखने की बात है कि भारत और चीन के बीच हुई पुरानी संधियों के तहत इस इलाके में गोली नहीं चलाने पर सहमति बनी है। भारत को पता है कि अगर एक भी गोली चली तो टकराव और बढ़ जाएगा। चीन भी इस बात को समझ रहा है। सो, अगर युद्ध की संभावना को टालना है तो तनाव कम करने का प्रयास शुरू करना होगा।

सो, सवाल है कि तनाव कम करने के लिए क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग के बीच सीधी बात हो सकती है? पता नहीं ऐसे माहौल में बातचीत हो पाएगी या नहीं परंतु दोनों नेताओं के बीच हुई दो अनौपचारिक वार्ताओं में यह सहमति बनी हुई है कि दोनों देश आपसी विवाद को टकराव में नहीं बदलने देंगे। प्रधानमंत्री पहली बार अनौपचारिक वार्ता के लिए वुहान गए थे और उस समय जो सहमति बनी थी उसे वुहान स्पिरिट का नाम दिया गया था। इस उस वुहान स्पिरिट को आगे बढ़ाते हुए भारत में ममलापुरम में दोनों नेताओं के बीच दूसरी अनौपचारिक वार्ता हुई थी। उसी स्पिरिट में अब भी तनाव घटाने की बात हो सकती है।

दूसरा तरीका त्रिपक्षीय वार्ता का बताया जा रहा है। खबर है कि भारत, रूस और चीन के विदेश मंत्रियों की वार्ता होने वाली है। हालांकि इसमें भी सवाल है कि अगर भारत किसी पंचायत में अमेरिका को शामिल नहीं कर रहा है तो रूस को शामिल करना कितना ठीक होगा? आखिर रूस और चीन इस समय बेहद करीबी सहयोगी हैं, जबकि अमेरिका के साथ चीन का टकराव चल रहा है। बहरहाल, दोपक्षीय हो या त्रिपक्षीय पर यह सभी सामरिक जानकारों का मानना है कि अगले कुछ दिन में दोनों देशों के बीच तनाव घटाने की प्रक्रिया तेज होगी।

इस बीच बहुपक्षीय मंचों की भी भूमिका बन सकती है। बहुपक्षीय मंच का मतलब संयुक्त राष्ट्र संघ नहीं है। उसने तो दोनों देशों से शांति बनाने की अपील कर दी औरउसकी भूमिका खत्म हो गई। पर जो क्षेत्रीय संगठन हैं वे ब़डी भूमिका निभा सकते हैं। इसमें तीन क्षेत्रीय संगठनों का खासतौर से नाम लिया जा सकता है। ये तीन संगठन हैं- बिक्र्स, रिक्स और एससीओ। ब्रिक्स मतलब ब्राजील, रूस, इंडिया, चीन और दक्षिण अफ्रीका। रिक्स मतलब रूस, इंडिया और चीन और एससीओ मतलब शंघाई सहयोग संगठन।

ये तीनों संगठन यूरोपीय देशों से अलग दूसरे देशों के हितों पर विचार करने वाले हैं। भारत, रूस और चीन या शंघाई सहयोग संगठन वाले देश इस इलाके के भू-राजनीतिक स्थितियों को समझते हैं और एक दूसरे के हितों को भी समझते हैं। तभी इन मंचों के जरिए तनाव कम करने वाली बात हो सकती है। भारत को इस बीच अपनी सैन्य तैयारियां भी तेज करनी होंगी और जरूरी साजो-सामान इकट्ठा करना होगा। पिछले डेढ़ महीने में जो समय भारत ने गंवाया है उसकी भरपाई करनी होगी। बराबरी के प्लेटफॉर्म पर पहुंचने के बाद ही भारत तनाव घटाने की बात करे तो उसका कोई फायदा होगा। अगर चीन आक्रामक बना रहा और भारत बैकफुट पर रहा तो चाहे जिस मंच से वार्ता हो उसका कोई फायदा नहीं होगा।

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