किस दिशा में बढ़ रही है राजनीति?

देश की राजनीति किस दिशा में बढ़ रही है? क्या इसकी दिशा बदल रही है या पिछले सात दशक में जैसी राजनीति होती रही है वैसी ही हो रही है, उसमें मामूली बदलाव आ रहा है? इन  सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। क्योंकि एक स्तर पर देखने में लगता है कि राजनीति की दिशा पूरी तरह से बदल गई है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी जैसी राजनीति कर रही है या उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की जैसी राजनीति है या कुछ हद तक समाजवादी पार्टी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, वाईएसआर कांग्रेस जैसी पार्टियों की राजनीति है। सबकी राजनीति कुछ बुनियादी तत्वों में बदलाव का इशारा करती है। इस लिहाज से कांग्रेस दुविधा में है और तभी उसे न माया मिलती दिख रही है और न राम!

भारतीय राजनीति का सबसे बुनियादी बदलाव मुस्लिम वोट बैंक के लिहाज से हुआ दिख रहा है। दशकों तक मुस्लिम एक वोट बैंक था और उसकी सरपरस्ती करने वाली पार्टियां मजबूत स्थिति में थीं। केंद्र में और अनेक राज्यों में कांग्रेस पार्टी उनकी सरपरस्त थीं। क्षेत्रीय पार्टियों के उदय के बाद कांग्रेस की स्थिति जहां जहां कमजोर हुई वहां ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की राजनीति करने वाली पार्टियों का उदय हुआ। जैसे बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस आदि। पर अब यह राजनीति अपने अंत की ओर बढ़ती दिख रही है।

हो सकता है कि वह वक्ती विराम हो पर फिलहाल इस किस्म की राजनीति के सफल होने की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही है। तभी भारतीय राजनीति की जो मौजूदा तस्वीर दिख रही है उसमें मुस्लिम आवाम की सरपरस्ती करने वाली कोई भी पार्टी मौजूद नहीं है। मुंहजबानी पार्टियां जरूर उनका नाम ले रही हैं पर उन्हें यह अंदाजा है कि इसका राजनीतिक नुकसान हो सकता है।

सोचें, दिल्ली में कांग्रेस को खत्म करके जिस पार्टी को मुसलमानों ने अपना रहनुमा चुना उसके नेता राजघाट पर जाकर शांति की प्रार्थना करने के अलावा कुछ नहीं कर रहे हैं। उसके नेता भी विधानसभा तक में बैठ कर हनुमान जी के राजनीतिक विमर्श की चर्चा कर रहे हैं। उन्होंने मुसलमानों को उनके हाल पर छोड़ा है कि वे अपनी लड़ाई खुद लड़ें। क्योंकि आम आदमी पार्टी बहुसंख्यक हिंदू वोट खोने का खतरा नहीं मोल ले सकती है। उसे पता है कि पांच-छह फीसदी वोट के इधर उधर होने से समूचा खेल बदल जाएगा।

दूसरी मिसाल उत्तर प्रदेश में मुस्लिम राजनीति का प्रतीक रहे आजम खां, उनकी पत्नी तंजीम फातिमा और बेटे अब्दुल्ला आजम के जेल जाने की है। सोचें, आजम खां एक फर्जी सर्टिफिकेट के मामले में पूरे परिवार के साथ जेल चले गए और समूचे उत्तर प्रदेश में एक पत्ता नहीं हिला। समाजवादी पार्टी के नेता भी उनके बचाव में सड़कों पर नहीं उतरे। छिटपुट बयानबाजी के अलावा कोई विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ। यह बदले की राजनीति है और उनकी प्रताड़ना विशुद्ध रूप से इस वजह से है कि वे मुस्लिम हैं। पर उत्तर प्रदेश की तमाम सेकुलर पार्टियों के मुंह पर ताला लगा है। कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी या समाजवादी पार्टी किसी ने इसे मुद्दा नहीं बनाया।

किसी जमाने में शहाबुद्दीन के समर्थन में लालू प्रसाद की पूरी पार्टी सड़क पर उतर आती थी। मुख्तार अंसारी और अतीक अंसारी के समर्थन में सपा-बसपा के कार्यकर्ता सड़क पर तांडव कर देते थे। पर अब आजम खां का पूरा परिवार जेल चला गया और कहीं कोई हलचल नहीं है? इसके दो स्पष्ट कारण हैं। पहला तो यह कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के भाजपा की कमान संभालने के बाद उनकी पार्टी ने काफी हद तक हिंदुओं को एक वोट बैंक के तौर पर सोचने के लिए प्रेरित किया है।

हिंदू कंसोलिडेशन की इस प्रक्रिया में तमाम तरह की झूठी-सच्ची खबरों और तथ्यों के सहारे एक अलग नैरेटिव विकसित किया गया। हिंदुओं को जाति के बंधन में बंध कर विचार करने की बजाय बतौर हिंदू अपनी पहचान को मजबूत करने के आग्रह पर जोर दिया गया। इससे पहले हिंदू विमर्श में अलग-थलग हो जाने वाली पिछड़ी जातियों को इस विमर्श का केंद्र बनाया गया। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से भाजपा को इस विमर्श को मजबूती से स्थापित करने में मदद मिली।

ध्यान रहे मंडल की राजनीति के समय या उससे पहले भी सेकुलर विमर्श मोटे तौर पर पिछड़ी और दलित जातियां ही चलाती रहीं। सवर्ण तो अपनी आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा की खोल में बंद रहे। तभी पिछड़ी जातियों को आगे करके भाजपा ने हिंदुत्व के नैरेटिव को मजबूती दी है। और दूसरा कारण यह है कि मुस्लिम समाज ने अपने को बदलने का प्रयास नहीं किया।

हैरानी इस बात से है कि भारत में राजनीतिक रूप से सबसे जागरूक मानी जाने वाली मुस्लिम कौम ने इस बदलाव को नहीं समझा। वे वहीं राजनीति करते रहे, जो 70 साल से कर रहे थे। वे भाजपा से अपनी दूरी और दुश्मनी दोनों दिखाते रहे। ऐसा नहीं है कि यह दुश्मनी नरेंद्र मोदी और अमित शाह के आने से बनी है। उनसे बहुत पहले, जब अटल बिहारी वाजपेयी जैसे उदार नेता प्रधानमंत्री थे, तब भी मुस्लिम मतदाता इसी सोच में वोट करता था कि जो भाजपा को हराएगा उसे वोट देंगे। यानी भाजपा दुश्मन है, चाहे वह कुछ भी करे। इस सोच की वजह से मुस्लिम समाज अलग थलग हुआ। चूंकि अब भाजपा मुख्यधारा है इसलिए बाकी पार्टियों को उसकी राजनीति पर ही प्रतिक्रिया देनी है।

भाजपा ने अपनी विचारधारा को राजनीति का केंद्र बना दिया है इसलिए बाकी पार्टियों को उसी विमर्श को फॉलो करना है। तभी मुस्लिम कौम बिना सरपरस्ती के है। उसके नाम की राजनीति करने वाली पार्टियां उसे बंधुआ मान कर दूसरे वोट की राजनीति में लगी हैं और तभी मुस्लिम समाज अपने मसीहा की तलाश कर रहा है। उसकी तलाश असदुद्दीन ओवैसी या बदरूद्दीन अजमल की ओर जा रही है, जो अंततः देश की राजनीति के लिए बहुत घातक होने वाली है।

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