सुशासन की बजाय समाज सुधार!

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार परमहंस हो गए हैं। उन्होंने सुशासन को भाग्य भरोसे छोड़ दिया है और खुद समाज सुधार में लगे हैं। लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के नेतृत्व वाले राजद का राज खत्म होने के बाद नीतीश ने सुशासन की जो पूंजी बनाई थी उसे उन्होंने गंवा दिया है। बिहार एक बार फिर जंगल राज का आभास दे रहा है। हत्या, बलात्कार, अपहरण, रंगदारी ये सब उसी तरह से वापस लौटे हैं, जो नब्बे के दशक में होते थे। अपराध के ताजा आंकड़ों के मुकाबिल हत्या और हत्या के प्रयास के मामले में बिहार नंबर एक है और बाकी राज्य उससे काफी पीछे हैं।

जो सड़कें दस साल पहले बनी थीं, वो सब टूटने लगी हैं और सरकार उनकी मरम्मत तक नहीं करा पा रही है। राज्य में कोई भी नया काम होता नहीं दिख रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों का भट्ठा बैठा है। मुख्यमंत्री ने दो टूक अंदाज में कहा कि वे केंद्रीय विद्यालय खोलने के लिए पांच एकड़ जमीन नहीं दे सकते हैं, जिसे खुलवाना है वह खुद जमीन खरीदे। शासन और प्रशासन के सारे काम छोड़ कर नीतीश कुमार समाज सुधार में लगे हैं।

वे वन, पर्यावरण, हरियाली आदि बचाने के लिए यात्रा कर रहे हैं। उन्होंने बिहार में गुटखा, तंबाकू आदि पर पाबंदी लगा रखी है। शराब पर पाबंदी चार साल से चल रही है। उनकी पुलिस हत्यारों, बलात्कारियों और सरेआम लड़कियों को जला रहे अपराधियों को पकड़ने की बजाय शराब की तस्करी रोकने और पैसे कमाने में लगी है। उन्होंने माता-पिता की सेवा कराने का कानून बनाना है और कथित तौर पर महिला अधिकार सुनिश्चित करने के लिए बगैर महिलाओं की सहमति के जमीनों की रजिस्टरी रूकवाई थी।

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