रघुवर दास के साथ बड़ी समस्या

महाराष्ट्र और हरियाणा के बाद अब झारखंड में भाजपा के मुख्यमंत्री रघुवर दास बड़े संकट से घिरे हैं। ध्यान रहे 2014 में इन तीनों राज्यों में भाजपा बिना किसी का चेहरा प्रोजेक्ट किए चुनाव लड़ी थी और जीतने के बाद तीनों राज्यों में सबसे मजबूत जातियों को छोड़ कर दूसरी जातियों से मुख्यमंत्री बनाए गए थे। हरियाणा में गैर जाट, महाराष्ट्र में गैर मराठा और झारखंड में गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बने थे। पांच साल बाद के महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव में भाजपा को झटका लगा। वह बड़ी मुश्किल से दुष्यंत चौटाला के समर्थन से हरियाणा में सरकार बना पाई और महाराष्ट्र में उसकी सरकार नहीं बनी।

अब ऐसी ही स्थिति झारखंड के चुनाव में दिख रही है। मुख्यमंत्री रघुवर दास के खिलाफ चुनाव से पहले ही घेराबंदी शुरू हो गई है। भाजपा की 20 साल पुरानी सहयोगी आजसू गठबंधन तोड़ कर अलग लड़ रही है। लोजपा और जदयू भी अलग लड़ रहे हैं। दूसरी ओर जेएमएम, कांग्रेस और राजद का गठबंधन लड़ रहा है। इस बहुकोणीय लड़ाई में भाजपा मुश्किल में घिरी है। भाजपा और आरएसएस के जानकार सूत्रों का कहना है कि सबसे ज्यादा मुश्किल मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर है।

बताया जा रहा है कि संघ और भाजपा के स्थानीय नेतृत्व की ओर से भाजपा के आला नेताओं को समझाया गया था कि वे रघुवर दास का चेहरा प्रोजेक्ट न करें। यह भी कहा गया है कि रघुवर दास की चुनावी सभाएं कम कराई जाएं। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले चरण के ही प्रचार में पलामू में रघुवर दास को उम्मीदवार घोषित कर दिया। पर अब भी संघ व भाजपा के ज्यादातर पदाधिकारी चाहते हैं कि उनके नाम और चेहरे पर ज्यादा जोर नहीं दिया जाए। इसका कारण यह है कि उनके ‘अहंकार’ और ‘तानाशाही’ वाले बरताव से सभी पार्टियों के नेता नाराज हैं।

पार्टी के अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं में नाराजगी है। वे कह रहे हैं कि रघुवर दास ने पांच साल अपने को नरेंद्र मोदी मान कर राज किया है। दूसरे यह भी बताया जा रहा है कि गैर आदिवासी के साथ साथ गैर वैश्य वोट भी भाजपा के खिलाफ गोलबंद हो रहा है क्योंकि रघुवर दास ने पांच साल के कार्यकाल में सिर्फ वैश्य समुदाय को बढ़ावा दिया। यहां तक कि रांची में रामटहल चौधरी जैसे पुराने नेता की टिकट काट कर अपने समाज के संजय सेठ को टिकट दिया। एक ब्राह्मण और एकमात्र भूमिहार सांसद की टिकट काटे जाने से सवर्ण समाज में अलग नाराजगी है।

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