मोदी, शाह की ताकत कहां गई?

क्या‍ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की ताकत घट गई है? कायदे से तो दूसरी बार बड़े बहुमत से चुनाव जीतने के बाद दोनों की राजनीतिक ताकत बढ़नी चाहिए थी। पर उलटा हो रहा है। ऐसा लग रहा है, जैसे दोनों अपने मनमाफिक फैसला नहीं कर पा रहे हैं। भाजपा की छोटी छोटी सहयोगी पार्टियों ने ऐसे फच्चर फंसाएं हैं, जिससे भाजपा निकल नहीं पा रही है।

हरियाणा में 24 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव के नतीजे आए पर 16 दिन के बाद भी राज्य में दो लोगों की सरकार चल रही है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की कैबिनेट सरकार चला रही है। 15 दिन से कैबिनेट का विस्तार नहीं हो पा रहा है। आखिर ऐसी क्या बात है, जो नहीं सुलझ रही है? क्या चौटाला को भाजपा समझा नहीं पा रही है? या अपनी पार्टी में खींचतान है। यह स्थिति तब है, जबकि भाजपा की पिछली सरकार में से एक को छोड़ कर सारे मंत्री और दिग्गज नेता चुनाव हार गए हैं। नए लोगों को पद देना है। इसके बावजूद भाजपा फैसला नहीं कर पा रही है।

याद करें कर्नाटक में क्या हुआ था। मुख्यमंत्री बनने के बाद करीब एक महीने तक बीएस येदियुरप्पा ने अकेले सरकार चलाई थी। भाजपा के दोनों शीर्ष नेता वहां मंत्रिमंडल नहीं बना पा रहे थे। एक महीने बाद जैसे तैसे मंत्रिमंडल का गठन हुआ। झारखंड में सहयोगी पार्टी आजसू ने भी भाजपा के दिग्गज नेताओं की नींद उड़ाई। उसकी सीटों की मांग की वजह से भाजपा उम्मीदवारों की पहली सूची काफी समय तक अटकी रही।

उधर महाराष्ट्र में क्या हो रहा है, यह सारा देश देख रहा है। शिव सेना ने सिर्फ सरकार का गठन रुकवाया, बल्कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भी निशाना बनाया। उद्धव ठाकरे ने भाजपा के शीर्ष नेताओं को हैसियत दिखाई। नतीजे आए दो हफ्ते से ज्यादा हो जाने के बाद तक सरकार नहीं बनी। भाजपा को चुनौती देते हुए शिव सेना ने कहा कि गोवा और मणिपुर दोनों जगह भाजपा नंबर एक पार्टी नहीं थी फिर भी राज्यपाल के सक्रिय सहयोगी से भाजपा ने सरकार बनाई पर महाराष्ट्र में नंबर एक पार्टी है फिर भी सरकार क्यों नहीं बना रही है? सोचें, गोवा और मणिपुर वाली ताकत, रणनीति या चाणक्य वाला दांव भाजपा महाराष्ट्र में क्यों नहीं दिखा सकी? 2016 से 2019 के बीच क्या बदल गया? झारखंड, दिल्ली, बिहार आदि में इस तरह की स्थिति बनी रहनी है।

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