बीएमसी के बहाने भी शिव सेना पर दबाव

भाजपा की पुरानी सहयोगी शिव सेना बृहन्नमुंबई नगर निगम, बीएमसी पर पिछले 25 साल से काबिज है।

इस नगर निगम का बजट देश के कई राज्यों के बजट से ज्यादा है। इसका सालाना बजट 30 हजार करोड़ रुपए का है। इसे लेकर शिव सेना के ऊपर दबाव बन रहा है।

यह दबाव दो तरह का है। एक तो यह है कि केंद्रीय एजेंसियों की नजर नगर निगम में हुए कथित घोटाले पर है।

भाजपा के नेता किरीट सोमैया ने बीएमसी घोटाले में सीधे उद्धव ठाकरे का नाम घसीट दिया था, जिसकी वजह से लोकसभा चुनाव में सोमैया की टिकट कटी। पर अब स्थिति बदल गई है। सो, सोमैया की शिकायत वाले दस्तावेज झाड़-पोंछ कर निकाले जा रहे हैं।

पिछले दिनों बीएमसी में काम करने वाले तीन ठेकेदारों के यहां एक घोटाले के सिलसिले में छापेमारी हो गई है। सो, उद्धव ठाकरे की पार्टी किसी कानून पचड़े में उलझने की चिंता में है। दूसरा चिंता यह है कि बीएमसी में शिव सेना को अपने दम पर बहुमत नहीं है। 227 सदस्यों के इस निकाय में शिव सेना के 94 पार्षद हैं, जबकि बहुमत का आंक़ड़ा 114 का है।

उसे 20 पार्षदों की जरूरत होगी। अभी भाजपा के 86 पार्षद हैं। बीएमसी में स्थिरता के लिए कांग्रेस पार्टी शिव सेना को समर्थन दे सकती है। कांग्रेस के 28 और एनसीपी के नौ पार्षद हैं। समाजवादी पार्टी के भी छह पार्षद हैं। अगर भाजपा से अलग होने के बाद शिव सेना अगर कांग्रेस और एनसीपी के समर्थन से बीएमसी पर कब्जा बनाए रखती है तो जाहिर है कि कांग्रेस और एनसीपी इसकी भी कीमत वसूलेंगे। इससे सरकार बनाने की प्रक्रिया में चल रही बातचीत में शिव सेना की स्थिति थोड़ी कमजोर हुई है और कांग्रेस, एनसीपी की मोलभाव करने की ताकत बढ़ी है।

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