सिर्फ मुसलमान विरोध का मैसेज देना था!

केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने नागरिकता कानून में संशोधन बिल के जरिए जितना मैसेज अपने हिंदू हितैषी होने का देना था, उससे ज्यादा मैसेज मुस्लिम विरोध का देना था। सरकार को यह बताना था कि वह मुसलमानों को घुसपैठिया मानती है, उनकी विरोधी है और इस देश में उनको नागरिकता नहीं देने वाली है। तभी इस कानून में सिर्फ तीन देशों- पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर आने वाले शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया। ये तीनों देश इस्लामी हैं। पहले कहा जा रहा था कि कानून सार्क के बाकी देशों यानी पर लागू होगा। यानी नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका और मालदीव पर लागू होगा।

पर अगर इन देशों पर अगर इसे लागू किया जाता तो सरकार का मैसेज बहुत स्पष्ट नहीं होता क्योंकि म्यांमार, श्रीलंका और नेपाल मुस्लिम अल्पसंख्यक वाले देश हैं। म्यांमार से धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर आने वाले रोहिंग्या मुस्लिम हैं। श्रीलंका में भी धार्मिक उत्पीड़न का शिकार मुस्लिम हो रहे हैं। इसलिए अगर कानून में इन देशों को शामिल किया जाता तो कम से कम दो देशों के मुसलमानों को भी नागरिकता देने का प्रावधान करना होता। जबकि सरकार का मकसद यह मैसेज देना था कि वह मुसलमानों को छोड़ कर बाकी सबको नागरिकता देगी। इसलिए बिल को तीन देशों तक सीमित रखा गया।

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