फारूक के जरिए क्या संदेश?

केंद्र सरकार नेशनल कांफ्रेंस के नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला पर सख्ती के जरिए क्या संदेश देना चाहती है? एक तरफ तो सरकार दावा कर रही है कि राज्य में सब कुछ ठीक है। फोन लाइंस चालू हो गई हैं और स्कूल-कॉलेज खुल गए हैं पर दूसरी ओर नेताओं की नजरबंदी नहीं खत्म कर रही है। उसमें भी सरकार ने फारूक अब्दुल्ला पर कुछ ज्यादा ही सख्ती कर रखी है। माना जा रहा है कि इससे वह देश भर के अपने समर्थकों को यह संदेश दे रही है कि अब उसकी कश्मीर नीति बदल गई है और वह किसी के प्रति नरमी नहीं बरतने वाली है। पीडीपी के साथ मिल कर सरकार बनाने के अपने फैसले से हुए नुकसान की भरपाई के लिए ऐसा किया जा रहा है।

तभी नेताओं की नजरबंदी में कोई ढिलाई नहीं की जा रही है। फारूक अब्दुल्ला लोकसभा के सांसद हैं और अगर सरकार चाहती तो उनको संसद की कार्यवाही में हिस्सा लेने की छूट दे सकती थी। पर विपक्ष की मांग और फारूक की मर्जी के बावजूद सरकार ने ऐसा नहीं किया है। इतना ही नहीं पिछले दिनों फारूक अब्दुल्ला के पिता और शेर ए कश्मीर के नाम से मशहूर शेख अब्दुल्ला की 114वीं जयंती के मौके पर भी फारूक और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला को रिहाई नहीं मिली। सुरक्षा बलों की हिरासत में लेकर भी शेख अब्दुल्ला के मजार पर जाने की इजाजत नहीं दी गई।

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