भ्रष्टाचार और वंशवाद पर फर्क नहीं

महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव में हर चुनाव की तरह भाजपा ने वंशवाद और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर प्रचार किया था। यह अलग बात है कि खुद भाजपा ने सबसे ज्यादा आरोपी मैदान में उतारे थे और नेताओं के बच्चों को भी खूब टिकटें दी थीं। जीते हुए विधायकों में भी सबसे ज्यादा ज्यादा दागी भाजपा के हैं। बहरहाल, इन दोनों राज्यों के चुनावों में मतदाताओं ने दिखाया कि उनको किसी नेता के भ्रष्टाचारी या दागी होने से फर्क नहीं पड़ता है और दूसरे यह भी दिखाया कि नेताओं के बच्चे उनको खास पसंद हैं। एकाध अपवादों को छोड़ कर सारे नेताओं के बेटे-बेटी-भतीजे चुनाव जीत गए।

महाराष्ट्र में पहली बार ठाकरे परिवार का कोई सदस्य चुनाव में उतरा। शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ने वर्ली सीट से चुनाव लड़ा और 70 हजार वोट से जीते। सबसे ज्यादा सीट से जीतने का रिकार्ड शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने बनाया। वे बारामती सीट से एक लाख 65 हजार वोट से जीते। पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के दो बेटों को इस बार कांग्रेस ने टिकट दी थी और दोनों जीते। उनके एक बेटे धीरज देशमुख ने लातूर ग्रामीण सीट पर एक लाख 20 हजार वोट के अंतर से जीत हासिल की। गोपीनाथ मुंडे के भतीजे धनंजय ने उनकी बेटी पंकजा मुंडे को हराया। वैसे कुछ नेताओं के बच्चे हारे भी पर ज्यादातर जीत गए।

इसी तरह हरियाणा में अकेले देवीलाल के परिवार से पांच सदस्य जीते हैं। रणजीत सिंह चौटाला निर्दलीय जीते तो अभय सिंह चौटाला इनेलो से और दुष्यंत व नैना चौटाला जननायक जनता पार्टी से जीते। कैप्टेन अजय सिंह यादव के बेटे राव चिरंजीवी भी चुनाव जीत गए तो कुलदीप बिश्नोई और किरण चौधरी भी जीत गए। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही हरियाणा लोकहित पार्टी के नेता गोपाल कांडा भी जीत गए। उनके ऊपर दो महिलाओं की आत्महत्या के मामले में गंभीर आरोप हैं और जमानत पर छूटे हैं। वे एक तरह से निर्दलीय चुनाव लड़े और लोगों ने उनको भी जीता दिया। दागी नेताओं का किसी पार्टी की टिकट से जीतना समझ में आता है पर कांडा जैसे नेता के निर्दलीय चुनाव जीतने का मतलब है कि समाज में बहुत कुछ सड़ रहा है।

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