सरकार की कानूनी टीम कर क्या रही है?

भारत सरकार की कानूनी टीम कमाल कर रही है। आए दिन उसे किसी न किसी अदालत में फटकार पड़ रही है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने भारत सरकार के दूसरे सबसे बड़े कानूनी अधिकारी की मौजूदगी में केंद्र सरकार को फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि वह अपने नागरिकों के साथ ऐसा बरताव नहीं कर सकती है। असल में प्रवर्तन निदेशाल, ईडी ने कांग्रेस के नेता डीके शिवकुमार को हाई कोर्ट से मिली जमानत का विरोध किया था और जमानत खारिज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने ईडी ने जो दस्तावेज पेश किए थे वे हूबहू वहीं दस्तावेज थे, जो ईडी ने कांग्रेस के दूसरे नेता और पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम की जमानत के विरोध में पेश किए गए थे। सरकार के कानूनी अधिकारियों और बड़े बड़े वकीलों ने इतना भी जरूरी नहीं समझा था कि नाम के साथ पदनाम बदल दें। सो, दस्तावेजों में डीके शिवकुमार को पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री बताया गया था। उनके वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने इस ओर अदालत का ध्यान दिलाया और अदालत में ही सरकारी वकीलों का मजाक उड़ाया।

छोटे छोटे मामलों को छोड़ दें तो एक और बड़े मामले में सरकार की कानूनी टीम ने एक बड़ी गलती की थी। राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किए गए दस्तावेजों में अटॉर्नी जनरल ने दावा किया था कि राफेल मामले में सीएजी की रिपोर्ट पर संसद की लोक लेखा समिति ने विचार कर लिया है। जबकि उस समय तक सीएजी की रिपोर्ट ही संसद में नहीं रखी गई थी तो पीएसी के विचार का सवाल कहां से उठता है। अदालत में दूसरे पक्ष का कहना था कि सरकार ने जान बूझकर अदालत को गुमराह करने के लिए यह गलत जानकारी दी। हालांकि बाद में सरकार ने इसे सुधार लिया। राफेल मामले में पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिककर्ताओं के वकील ने अदालत का इस ओर ध्यान दिलाया था। पर अदालत ने उन्हें बताया कि सरकार ने इसे सुधार लिया है।

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