हेमंत सोरेन की कृपा पर कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी ने ऐसा लग रहा है कि झारखंड में अपने सहयोगी हेमंत सोरेन के सामने सरेंडर कर दिया है। आपसी तालमेल से लेकर महागठबंधन बनाने तक में कांग्रेस ने वैसे ही काम किया है, जैसे हेमंत सोरेन चाहते थे। उनकी मर्जी से ही कांग्रेस ने अपने पुराने सहयोगी बाबूलाल मरांडी की पार्टी से तालमेल नहीं किया। मजबूरी में मरांडी को अकेले लड़ने की घोषणा करनी पड़ी। ध्यान रहे कांग्रेस और मरांडी 2009 के चुनाव में मिल कर लड़े थे तब कांग्रेस को 56 सीटें पर लड़ी थी और उसने 14 सीटें जीती थीं। आखिरी बार शिबू सोरेन की पार्टी जेएमएम के साथ कांग्रेस 2004 में लड़ी थी और नौ सीट जीत पाई थी। इस तमाम समीकऱण के बावजूद कांग्रेस ने मरांडी की पार्टी को अकेले लड़ने दिया।

कांग्रेस के भी कुछ नेताओं ने यह गलत धारणा फैलाई कि मरांडी अकेले लड़ कर भाजपा का वोट काटते हैं। पिछली बार वे अकेले लड़े थे तब भी भाजपा 37 सीट जीती। जबकि उससे पहले वे कांग्रेस के साथ मिल कर लड़े थे तब भाजपा 18 सीट ही जीत पाई थी। बहरहाल, जेएमएम के साथ तालमेल में कांग्रेस को खुद महज 25 से 27 सीटें मिलने की संभावना है। जेएमएम ने 45 सीटों पर लड़ने का फैसला किया है। असल में प्रदेश कांग्रेस बहुत बुरी स्थिति में है। उसके प्रदेश अध्य़क्ष अजय कुमार ने पार्टी छोड़ दी। जैसे जैसे बुजुर्ग नेता रामेश्वर उरांव को अध्यक्ष बनाया गया तो कई नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। लोकसभा का चुनाव लड़े पूर्व अध्यक्ष सुखदेव भगत और पूर्व नेता विधायक दल मनोज यादव भाजपा में चले गए। ले देकर कांग्रेस के पास प्रदेश में सुबोधकांत सहाय इकलौते नेता हैं लेकिन पार्टी आलाकमान उनकी कोई बात नहीं सुनती है। सो, अब तक जेएमएम या जेवीएम के साथ बराबरी की राजनीति करने वाली कांग्रेस जेएमएम की बी या सी टीम की तरह इस बार चुनाव लड़ेगी।

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