मोदी सरकार को मिलेगा मंदिर का श्रेय!

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में वैसा ही फैसला सुनाया, जिसका अंदाजा पिछले कुछ समय से लगाया जा रहा था। प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई शुरू होने के बाद से ही लग रहा था कि विवादित जमीन पर निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा खारिज हो जाएगा और पूरी विवादित जमीन रामलला को मिल जाएगी। बिल्कुल यहीं फैसला आया। तभी शायद ही कोई व्यक्ति होगा, जिसको फैसले पर हैरानी हुई होगी।

हां, हैरानी की बात यह रही कि फैसला पांच जजों की एक राय से हुआ। यह 2010 में आए इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से लेकर 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक अदालतों में आए बदलाव को बताने वाला है। हाई कोर्ट का फैसला 2-1 के बहुमत का था। बेंच में मौजूद मुस्लिम जज ने फैसले से इत्तेफाक नहीं जाहिर किया था। उससे पहले भी अयोध्या पर जो भी फैसले आए हैं उनमें बेंच में मौजूद कम से एक जज की राय अलग रही है। पर इस बार फैसला आम राय का है।

बहरहाल, हाई कोर्ट में रामलला के वकील रविशंकर प्रसाद थे। यह निजी तौर पर उनके लिए भी बड़ी जीत है। केंद्र सरकार में मंत्री बन जाने की वजह से वे सुप्रीम कोर्ट में रामलला की पैरवी नहीं कर रहे थे। पर हाई कोर्ट तक मुकदमा उन्होंने लड़ा था। सो, इस आधार पर रविशंकर प्रसाद और भाजपा दोनों ही जीत का श्रेय ले सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पूरा श्रेय केंद्र सरकार को मिलना भी तय हो गया है क्योंकि सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार को ही मंदिर बनाने की जिम्मेदारी सौंपी है। सरकार एक ट्रस्ट बना कर मंदिर निर्माण कराएगी।

अब देखने वाली बात यह है कि इसमें विश्व हिंदू परिषद की क्या भूमिका होगी। आखिर विश्व हिंदू परिषद ने मंदिर निर्माण की पूरी तैयारी कर रखी है। अयोध्या में कारसेवकपुरम में मंदिर के लिए खंभे और दूसरी तमाम चीजें बना कर रखी गई हैं। यह भी देखना होगा कि सरकार उनका क्या करती है। ध्यान रहे विश्व हिंदू परिषद ने पहले कई बार कहा है कि वे मंदिर निर्माण कराना चाहेंगे पर सुप्रीम कोर्ट ने यह काम सरकार को सौंपा है।

अब आगे सरकार की मर्जी पर है कि वह इस मामले में विश्व हिंदू परिषद और राम जन्मभूमि न्यास आदि को किस तरह से शामिल करती है। इस बीच फैसले के बाद सूत्रों के हवाले से आ रही खबरों के मुताबिक भाजपा और विहिप के नेताओं ने यह भी साफ कर दिया है कि अदालत ने मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए पांच एकड़ की जो जमीन देने की बात कही है वह प्रस्तावित मंदिर के आसपास नहीं मिलेगी। यानी सरकार के पास अधिग्रहण वाली जो 67 एकड़ जमीन है उसमें से सुन्नी वक्फ बोर्ड को जमीन नहीं दी जाएगी। उनका कहना है कि प्रस्तावित मंदिर से कहीं दूर यह जमीन दी जाएगी। माना जा रहा है कि यह मामला फिर से अदालत में पहुंचेगा क्योंकि अदालत ने किसी प्रमुख जगह पर मस्जिद के लिए जमीन देने को कहा है। सरकार की अधिग्रहित जमीन के अलावा अयोध्या के अंदर किसी प्रमुख जगह पर एक साथ पांच एकड़ जमीन शायद ही मिले।

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