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विनोद खन्ना को मरणोपरांत दादा साहब फाल्के पुरस्कार

नई दिल्ली फिल्म अभिनेता विनोद खन्ना की पहली पुण्यतिथि से लगभग दो सप्ताह पहले आज घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में उन्हें प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किये जाने का ऐलान किया गया। पृथ्वीराज कपूर के बाद संभवत : पहला ऐसा मौका है जब किसी अभिनेता को मरणोपरांत भारतीय सिनेमा के इस सर्वोच्च सम्मान के लिए चुना गया है। अभिनेता का पिछले साल 27 अप्रैल को कैंसर की वजह से निधन हो गया था।

दिवंगत अभिनेता के बेटे राहुल ने पुरस्कारों की घोषणा के बाद आज एक मर्मस्पर्शी संदेश ट्वीट किया। राहुल ने लिखा इस बात को सुनकर बहुत गौरवांवित महसूस कर रहा हूं कि मेरे पिता को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के दौरान सिनेमा जगत के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से मरणोपरांत सम्मानित किया गया है ! उनकी पहली पुण्यतिथि करीब है , ऐसे में यह उनके जीवन और कार्य को सम्मानित करने का बहुत ही सुंदर तरीका है क्योंकि वह केवल अभिनेता नहीं थे बल्कि दिल से फिल्मों के बड़े प्रशंसक थे। ’’ खन्ना ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत नकारात्मक किरदारों से की थी लेकिन बाद में उन्हें मुख्य भूमिकाएं भी मिलने लगी। उन्होंने इस दौरान ‘ पूरब और पश्चिम ’, ‘‘ आन मिलो सजना ’, ‘ सच्चा झूठा ’ और ‘ मेरा गांव मेरा देश ’ जैसी फिल्मों में काम किया। अभिनेता की जोड़ी हिन्दी फिल्मों के मेगास्टार अमिताभ बच्चन के साथ सुपरहिट रही।

दोनों ने ‘ अमर अकबर एंथनी ’, ‘ परवरिश ’, ‘ रेशमा और शेरा ’, ‘ मुकद्दर का सिकंदर ’, ‘ जमीर ’, ‘ हेरा फेरी ’ और ‘ खून पसीना ’ जैसी फिल्मों में एकसाथ काम किया। सुनील दत्त द्वारा 1968 में निर्मित फिल्म ‘ मन का मीत ’ विनोद खन्ना की पहली फिल्म थी। उन्हें बतौर हीरो 1971 की फिल्म ‘ हम तुम और वो ’ से पहली सफलता मिली थी। उनके निजी जीवन में भी उस वक्त फिल्मों की तरह नाटकीय मोड़ आ गया जब वह 1982 में ओशो रजनीश के अनुयायी बन गए। विनोद पांच साल के अंतराल के बाद फिल्मों में लौटे लेकिन पुराना मुकाम हासिल करने के लिए उन्हें ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी और ‘ इंसाफ ’ और ‘ दयावान ’ जैसी उनकी फिल्में हिट रहीं।

पेशावर में 1946 में पंजाबी परिवार में जन्में विनोद खन्ना ने 1997 में भाजपा का दामन थामकर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। उन्होंने पंजाब के गुरदासपुर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। केवल 2009 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा लेकिन 2014 के आम चुनावों में एक बार फिर से इसी सीट से जीत हासिल कर वह संसद पहुंचे। साल 2002 में उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री बनाया गया था।

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