महिला उत्पीड़न से भरी पड़ी फिल्में!

श्रीशचंद्र मिश्र नाना पाटेकर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा कर अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने एक आंदोलन को जन्म दे दिया है। यह उसी कड़ी का एक विस्तार है जिसकी शुरुआत कुछ समय पहले हॉलीवुड में हुई थी। नाना-तुनश्री प्रकरण ने फिल्म उद्योग को दो हिस्सों में बांट दिया है। एक तरफ अभिनेत्रियों ने खुलासा किया है कि अपने सफर में कैसे उन्हें किस तरह के मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा। खास बात यह है कि इस स्वीकारोक्ति में बड़ी स्टार अभिनेत्रियों की आवाज न के बराबर है।

दूसरा वर्ग उन दिग्गज कलाकारों का है जो इस ‘हादसे’ पर मौन है। इस मौन को उस आरोप की स्वीकृति का लक्षण भी कहा जा सकता है जो एक के बाद एक अभिनेत्रियां लगा रही हैं। पिछले साल केरल पुलिस ने लोकप्रिय और असरदार अभिनेता दिलीप के खिलाफ एक अभिनेत्री का अपहरण कर उसका यौन उत्पीड़न करने का मामला दर्ज किया था। इस पर सुपर स्टार मोहन लाल की अध्यक्षता वाले ‘एसोसिएशन आफ मलयालम मूवी आर्टिस्ट’ (एएमएमए) से दिलीप को बाहर कर दिया गया। अब एएमएमए ने दिलीप की सदस्यता बहाल कर दी है। जबकि मामले की अभी जांच चल रही है।

 विरोध में पीड़िता समेत एसोसिएशन की चार महिला सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया है। महिलाओं के प्रति फिल्म उद्योग की सोच का यह सिर्फ एक मामला नहीं है। फिल्मों में और फिल्म उद्योग में महिलाओं की स्थिति क्या है, इसे लेकर हॉलीवुड में उठी आवाज के बाद अपने फिल्म उद्योग में भी विरोध की आवाज उठनी शुरू हो गई है। लेकिन इससे तस्वीर उजली हो पाएगी, इसमें संदेह है। सवाल मानसिकता का है और महिलाओं को कमतर मानने की मानसिकता यह फिल्म उद्योग में गहरी है।

विरोध की आवाज पहल नहीं उठी तो कुछ संकोच की वजह से और कैरियर तबाह हो जाने के अंदेशे से। तनुश्री का ही कहना है कि आठ साल पुरानी घटना का जिक्र उन्होंने अब इसलिए किया है क्योंकि तब करतीं तो उन्हें तबाह कर दिया जाता।  केरल के अभिनेता पृथ्वी राजन सुकुमारन ने फैसला किया है वे महिला उत्पीड़न को बढ़ावा देने वाली किसी फिल्म में काम नहीं करेंगे।

लेकिन क्या एक अभिनेता का निश्चय रूढ़ हो गई फिल्मी मानसिकता को बदल पाएगा?  दिक्कत यह है कि महिलाओं पर बढ़ते अपराध और यौन प्रताड़ना के खिलाफ समाज और कानून के स्तर पर बढ़ी सक्रियता के बावजूद इस गंभीर समस्या को लेकर फिल्मों का रवैया हमेशा से संवेदनहीन रहा है। फिल्मों में शुरू से महिला उत्पीड़न का जिस तरह से चित्रण किया गया है उसमें महिला कलाकारों ने खुद को दोयम दर्जे का मानने की ग्रंथि पाल ली है। 2016 में रिलीज हुई फिल्म ‘पिंक’ ने इस जड़ता को तोड़ा और बेहद प्रभावशाली तरीके से।

  फिल्म मुख्य रूप से इस मुद्दे पर केंद्रित थी कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने तमाम तरह के कानूनों के बावजूद पीड़िताओं को न्याय मिलने में किस-किस तरह पर अड़चने आती हैं। कानून की जानकारी न होना एक बड़ी बाधा है। उस पर पुलिस का रवैया और अदालती कार्यवाही की अपमानजनक स्थितियां पीड़िता के मनोबल को तोड़ देती है और वह यथास्थिति को स्वीकार करने पर बाध्य हो जाती है। ‘पिंक’ इसी बेचारगी को खत्म करने का रास्ता दिखाती है। फिल्म सराही गई है, लेकिन एक फिल्म से जागरूकता नहीं आ सकती और न ही अन्याय से लड़ने की सभी को हिम्मत मिल सकती है।

इसके लिए फिल्मों के माध्यम से लगातार चोट किया जाना जरूरी है। लेकिन विडंबना यह है कि अरसे से महिलाओं पर होने वाले अपराधों को बड़े पैमाने पर दिखाने वाली फिल्मों ने समस्या के मूल जाकर उसका कोई सार्थक समाधान सुझाने की बजाए यौन प्रताड़ना को एक चटपटे मसाले के रूप में ज्यादा इस्तेमाल किया गया है, चाहे वह पारिवारिक प्रताड़ना हो या अपना सतीत्व साबित करने की चुनौती, फिल्मों ने हमेशा महिलाओं की एक बेचारी तस्वीर ही दिखाई है अपवाद के रूप में उन्हें अन्याय का मुकाबला करते हुए कुछ फिल्मों ने दिखाया लेकिन हर मोड़ पर उन्हें शोषण का शिकार होना पड़ा।

सवाक दौर की शुरुआती फिल्मों में फिर भी महिलाओं का एक अलग अस्तित्व दिखाने की छिटपुट कोशिश की गई। ‘स्वयं सिद्धा’ की नायिका अधपगले से शादी कर दिए जाने को अपनी विवशता नहीं मानती। वह स्थितियों का मुकाबला करती है। ‘दुनिया ना माने’ की नायिका अधेड़ विधुर को अपने पति के रूप में स्वीकार नहीं करती। लेकिन कुल मिला कर समाज और परिवार से टकराने की हिम्मत करने वाली महिलाएं फिल्मों में कम ही दिखीं। पारिवारिक फिल्मों के दौर में तो महिलाओं की स्थिति और अधिक दयनीय कर दी गई। सेवा, ममता और समर्पण का उन्हें पर्याय बना कर हर पल उन्हें अग्नि परीक्षा से गुजारा गया।

आखिर में देवी बताने की औपचारिकता को महिलाओं के साथ न्याय मान लिया गया। लेकिन देवी कहलाने की इस प्रक्रिया में उसे कभी पति से अलगाव झेलना पड़ा या सास से प्रताड़ित होना पड़ा। यह सिलसिला आज भी थमा नहीं है। कहने को हाल फिलहाल के सालों में ‘कहानी’, ‘क्वीन’, ‘मर्दानी’ जैसी फिल्मों में महिलाओं की मजबूत शख्सियत उभारी गई। लेकिन आज भी ज्यादातर फिल्मों में महिलाएं शो पीस से ज्यादा कुछ नहीं हैं। दकियानूसी बंदिशों से आज भी उन्हें मुक्त नहीं किया गया है, संबंधों की उदारता पुरुषों के लिए है लेकिन महिलाओं के लिए मर्यादा रेखा है जिसे लांघना उनके चरित्रहीन   होने का प्रमाण मान लिया जाताहै।

  सालों पहले दो फिल्में आई थीं- ‘जीवनधारा’ व ‘आईना’। दोनों की नायिकाएं पारिवारिक परिस्थितियों में विवश होकर देह बेचने का काम करने लगती हैं। लेकिन जिस परिवार के लिए वे यह कदम उठाती हैं, वही उन्हें दुत्कार देता है। इस मामले में  कुछ साल पहले आई फिल्म ‘लागा चुनरी में दाग’ ने थोड़ा उदारवादी नजरिया अपनाया। हालांकि कालगर्ल बनी नायिका को सामाजिक सम्मान दिलाने का पक्ष बेहद नाटकीय रहा।अपराध का शिकार होने वाली महिला को ही अपराधी मान कर प्रताड़ित करने की आम मानसिकता फिल्मों पर कुछ ज्यादा ही हावी रही है।

बिन ब्याही मां को कभी समाज ने स्वीकार किया हो, ऐसा दिखाने की हिम्मत कभी कभार ही कोई फिल्म दिखा पाई है।  कुंदन शाह की फिल्म ‘क्या कहना’ में जरूर नायिका बिना शादी के हुए बच्चे को अवैध नहीं मानती। उसके लिए वह पूरे समाज और परिवार से लड़ जाती है। लेकिन इस तरह का साहस नायिका को फिल्मों में करते हुए बहुत कम दिखाया गया है। ज्यादातर फिल्मों में ऐसी नायिकाओं के हिस्से में दुख और संताप ही आया है। आखिर में उनके आंसू पोछने की औपचारिकता निभा कर उनके साथ कथित न्याय करा दिया जाता है। यह सिलसिला दर्जनों फिल्मों में दोहराया जा चुका है। ‘आसरा’, ‘होली आई रे’, ‘आराधना’, ‘दाग’ जैसी अनेक फिल्मों के नाम लिए जा सकते हैं जिनमें विवाह किए बिना मां बनने का दंश नायिकाओं ने झेला। विवाह पूर्व हुए संबंधों के लिए दोषी नायक की अगर मौत हो गई तो बात अलग है, नहीं तो उसे कभी किसी फिल्म ने कटघरे में खड़ा नहीं किया।

दुष्कर्म बना फार्मूला यह अपने आप में बेहद शर्मनाक है कि एक अरसे तक फिल्मों में बलात्कार के दृश्य रखना अनिवार्य माना गया। जिस तरह आज कल फिल्मों में आइटम नंबर या पंजाबी रैप रखना जरूरी मान लिया गया है, उसी तरह नब्वे के दशक तक बलात्कार के दृश्य फिल्मों में रखने को एक नियम की तरह इस्तेमाल किया गया। बलात्कार को कितनी वीभत्सता और दरिंदगी से फिल्माया जाए, इसकी होड़ लगती रही। ऐसे दृश्यों को ज्यादा उत्तेजक बनाने के लिए सामान्य मर्यादा का भी ध्यान नहीं रखा गया। फिल्म ‘दोराहा’ की नायिका राधा सलूजा ने तो सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि शूटिंग के वक्त उन्हें बताया ही नहीं गया कि उन पर रेप का सीन फिल्माया जाना है। अचानक खलनायक (रूपेश कुमार) उन पर टूट पड़ा।

वे बचने के लिए बिलखती रहीं और निर्देशक शाट लेता रहा। फिल्म में स्थापित किया गया था कि आधुनिक जीवन शैली अपनाने का क्या नुकसान हो सकता है? लेकिन उसका खमियाजा महिला के हिस्से में क्यों? उसे शराब पीने और पार्टीबाजी करने की तरफ तो उसके पति ने धकेला था। फिल्म ने उसे सजा क्यों नहीं सुनाई? फिल्में वही दिखाती है जो आम जिंदगी में होता है। दुष्कर्म के लिए महिला के हावभाव और फैशन को दोषी माना जाता है। उस पर बेचारगी की मुहर लग जाती है। पुरुषों के लिए वह अपराध पौरुषता का प्रतीक बन जाता है। फिल्मों में तो यह पौरुष खूब दिखाया गया है। कभी ठाकुर व जमींदार के जरिए तो कभी पुलिस वाले या गुंडे के हाथों। ज्यादा शिकार होती हैं नायक की बहन। खलनायक का मकसद होता है नायक को मानसिक रूप से तोड़ना।

होता उलटा। सीधे सादे नायक में प्रतिशोध की भावना जाग जाती है और फिल्मों को मिल जाता है भीषण खून-खराबे का आधार। गांव का किसान (अदालत) या शहरी नौकरी पेशा (आज की आवाज) जब खुद न्याय करने उतर पड़ता है तो उसका रोमांच कुछ अलग ही हो जाता है। कानून का सहारा लेकर दोषी को सजा नहीं दी जा सकती, यह फिल्म वाले पूरी गंभीरता से मानते हैं। इसलिए आमतौर वे अदालत के पचड़े में फिल्म को नहीं उलझाते। पहले बड़ी तल्खी से नायक की बहन या कभी-कभी भाभी या पत्नी से बलात्कार फिल्माते हैं और फिर नायक को बदला लेने का लाइसेंस थमा देते हैं। अवतार भोगल की फिल्म ‘जख्मी औरत’ की नायिका तो पुलिस अफसर होने के बावजूद अपने साथ हुए दुष्कर्म की फरियाद व्यवस्था से नहीं करती। 

अपनी जैसी कुछ पीड़ित महिलाओं के साथ मिल कर वह अपराधियों को खुद सबक सिखाती है। ‘आज की आवाज’ के नायक को बांध कर उसकी बहन से बलात्कार किया जाता है। वह अपराधियों को देख चुका है लेकिन पुलिस को उनका हुलिया नहीं बताता। आधी रात के बाद शहर में वह अपराधियों की तलाश करता है और एक-एक कर उन्हें मार डालता है। ‘अदालत’ के किसान और ‘अनहोनी रात’ के चौकीदार को पता होता है कि उनकी बहन व पत्नी के अपराधी कौन हैं लेकिन वे प्रतिशोध खुद लेते हैं। शायद आम लोगों की तरह फिल्मों ने भी कानून पर भरोसा करने की जहमत नहीं उठाई। हालांकि बीच-बीच में फिल्में अदालती प्रक्रिया में भी दाखिल हुईं?

लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘इंसाफ का तराजू’ में कुछ हद तक इस बात को उभारा गया कि पीड़िता को अदालत में किस तरह के अपमानजनक सवालों का सामना करना पड़ता है। फिल्म की नायिका की पोशाक, हावभाव और जीवनशैली को उसके साथ हुए अपराध का दोषी मानते हुए यह साबित करने की कोशिश की गई कि दुष्कर्म हुआ ही नहीं और जो हुआ वह नायिका की सहमति से हुआ। वह तो उसकी छोटी बहन ने उसे आपत्तिजनक हालत में देख लिया तो खुद को शिकार के रूप में पेश कर दिया।

बहरहाल फिल्म ने यह सवाल जरूर उठाया कि दुष्कर्म के मामले में   सुनवाई खुले में क्यों हो और फैसला सुनाने में समय क्यों लगे? फिल्म में सुनवाई के दौरान खलनायक नायिका की छोटी बहन को भी शिकार बना लेता है। नायिका उसे गोली मार देती है। फिल्म ‘इंसाफ का तराजू’ में समाज की एक और घटिया सोच दिखी। दुष्कर्म का शिकार हो जाने के बाद उसके विवाह में बाधा आ जाती है। ऐसा कई फिल्मों में हुआ है जिनमें पीड़िता को न्याय तो मिला नहीं, उस पर हुए अपराध के लिए समाज ने उसे ही दुत्कार दिया। बलात्कार पीड़िता से कभी किसी फिल्म के नायक ने शादी की भी तो एकाध फिल्मों में ही।

ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘सत्यकाम’ का आदर्शवादी नायक बलात्कार पीड़िता से शादी तो कर लेता है और उसकी संतान को अपना नाम भी दे देता है लेकिन पीड़िता को पत्नी के रूप में अपनाता नहीं। इस मायने में ‘घर’ का नायक ज्यादा संवेदनशाली साबित हुआ। घर लौटते समय कुछ बदमाश उसकी पत्नी का अपहरण कर लेते हैं। सामूहिक दुष्कर्म का शिकार होने की वजह से दकियानूसी सोच के तहत वह खुद को अपवित्र हुआ मान लेती है। पति ऐसे समय में उसे अपनी पीड़ा से उबरने में मदद करता है। 

छेड़छाड़ को बढ़ावा फि ल्मों से महिलाओं का पारिवारिक उत्पीड़न अब उतना दिखाई नहीं देता। दुष्कर्म के दृश्य भी अब पहले की तरह अनिवार्य नहीं रह गए है। पहले की अपेक्षा फिल्में महिलाओं से सम्मानजनक व्यवहार करने लगी हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से क नया ट्रेंड विकसित हुआ है और वह है स्टॉकिंग यानी छेड़छाड़ की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का। यह संयोग ही है कि इसी अरसे में देश भर में एकतरफा प्रेम हिंसक हुआ है। लड़कियों की हत्या की जा रही है। उन पर तेजाब फेंका जा रहा है। कई मामलों में तो लड़कियां मानसिक दबाव में आत्महत्या कर रही हैं। क्या यह फिल्मों का असर है।

झगड़े से नायक-नायिका का आमना-सामना होने का सिलसिला तो फिल्मों में अरसे से चला आ रहा है। पहले की फिल्मों में शुरुआती कहासुनी के बाद नायिका नायक के ‘गुणो’ पर रीझ जाती थी। ऐसी फिल्मों ने यही संदेश दिया कि लड़की की शुरुआती ना के बावजूद कोशिश जारी रखी जाए तो वह मान जाएगी।  हाल फिलहाल की फिल्मों में भी यही दिखाया जा रहा है। दो साल पहले आई ‘बेशर्म’ में कार चोर नायक पर पढ़ी लिखी नौकरी पेशा नायिका फिदा हुई ही। ‘रंगीला’ में तो एक अभिनेत्री सड़क छाप के लिए अपना करिअर तक छोड़ देती है। ऐसे में लोगों को लगता है कि उनमें भले ही कोई योग्यता न हो, अपनी पसंद की लड़की का प्रेम पाना बेहद आसान है। 

कुछ फिल्मों ने प्रेम पाने के इस आसान रास्ते को ऐसा हिंसक रूप दिया कि उसका असर आम जीवन पर बेहद चिंताजनक रूप में दिख रहा है। युवाओं को लगने लगा है कि जब फिल्मों में खुद को पीड़ा पहुंचा कर नायक नायिका को पा लेता है तो उनके मामले में भी लड़की पहले मना करेगी, फिर मान जाएगी। यहां तक तो खैर फिर भी गनीमत है लेकिन फिल्में जब जबरन प्रेम थोपन  का हिंसक तरीका अपनाने लगती हैं तो उसकी नकल ज्यादा भयावह हो जाती है। ‘डर’, ‘अंजाम’ व ‘तेरे नाम’ ऐसी ही फिल्में थीं जिनकी नायिका से एकतरफा प्रेम करने वाले का जुनून हिंसा की तमाम हदें पार कर देता है। तीनों ही फिल्मों के प्रेमियों का दुखद अंत जरूर होता है लेकिन उसमें कोई सबक नहीं सीखता। 

असल में एक तरफा प्रेम के पागलपन को फिल्में इतने आकर्षक व रोमांटिक तरीके से पेश करती हैं कि कोई भी उससे आसानी से सम्मोहित हो जाता है और अंत की परवाह नहीं करता। तीन साल पहले फिल्म ‘रांझणा’ का उदाहरण इस मामले में बेहद सटीक रहा है। ब्राह्मण लड़का मुस्लिम लड़की के प्रेम में पागल हो जाता है। ब्लेड से अपना हाथ काट लेता है। फिल्म की चौतरफा आलोचना हुई। आरोप लगा कि इससे छेड़छाड़ को बढ़ावा मिलेगा। सही भी है। फिल्में जब तक महिलाओं को एक वस्तु की तरह मान कर उस पर हक जमाने को रोमांटिक पहचान देती रहेगी, आम जीवन में उसकी विकृत नकल देखने को मिलती रहेगी।

182 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।