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आंखों से जो उतरी है दिल में

सोचिए, अब तक 69 लोगों को यह पुरस्कार दिया गया है और उनमें महिलाएं केवल सात? तो क्या हम फाल्के पुरस्कार के मामले में महिलाओं के साथ भेदभाव बरतते रहे हैं? और अब जबकि आशा पारिख को इसके लायक माना गया है तो क्या उस दौर की अन्य अभिनेत्रियों की भी बारी आएगी? और हिंदी की ही अभिनेत्रियां क्यों, दक्षिण की शारदा और बंगाल की सुचित्रा सेन का नंबर कब आएगा?

कुछ साल पहले राजेश खन्ना के निधन पर मेघनाद देसाई ने लिखा था कि वे उस दौर के आखिरी नायक थे जब प्रेम और उम्मीद बाकी थे। यानी जब लोगों में यह भरोसा था कि अभी भी चीजें ठीक हो सकती हैं। शायद उन्होंने सही लिखा था, क्योंकि उसके बाद ‘एंग्री यंग मैन’ का आगमन हुआ जिसका जन्म ही नाउम्मीदी से हुआ था। उसके साथ एक्शन बढ़ गया, अश्लीलता और फूहड़ता का परदे पर अतिक्रमण भी बढ़ गया जबकि भाषा अपना वज़न खोने लगी। आजादी के बाद के लगभग पच्चीस साल के वक्फ़े में जैसी फिल्में बनीं और उन्होंने जैसा गीत-संगीत दिया, वह धीरे-धीरे एक सपने की तरह हमसे दूर होता चला गया।

यह उस दौर के संगीत का ही प्रभाव है कि जब आप आशा पारिख का फिल्मी करियर याद करते हैं तो उनके अभिनय की बजाय उन पर फिल्माए गए गाने पहले याद आते हैं। ये ज्यादातर हिट गीत थे और इनकी संख्या इतनी ज्यादा है कि कोई कहां तक गिनवाए। और वे ही क्यों, उन दिनों ऐसे कई हीरो और हीरोइन थे जिनका अभिनय याद करें तो उनके गाने ज्यादा याद आएंगे।

आशा पारिख, जिन्हें इस बार दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया, उसी दौर की देन हैं। नरगिस और मधुबाला के बाद लोकप्रिय अभिनेत्रियों के क्रम में मीनाकुमारी, वैजयंती माला, नूतन, माला सिन्हा, साधना, शर्मिला टैगोर के साथ आशा पारिख भी थीं। इस लिहाज से, जैसा कि सूचना व प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा, भारतीय सिनेमा आज जिस मकाम पर है, इसे वहां तक लाने में आशा पारेख की भी भागेदारी मानी जाएगी।

‘आसमान’ नाम की एक फिल्म से बाल कलाकार के तौर पर उनकी शुरूआत हुई थी। डीएम पंचोली के निर्देशन की इस फिल्म में ओपी नैयर का संगीत था। दो साल बाद 1954 में बिमल रॉय जैसे फिल्मकार ने उन्हें ‘बाप बेटी’ में काम दिया। ये दोनों फिल्में नहीं चलीं। मगर सोलह साल की उम्र में आशा पारिख को निर्माता सुबोध मुखर्जी और लेखक व निर्देशक नासिर हुसैन ने ‘दिल दे के देखो’ में हीरोइन बनाया। शम्मी कपूर के साथ 1957 में आई यह फिल्म ऐसी चली कि आशा पारिख चल निकलीं।

इसके बाद नासिर हुसैन ने ‘जब प्यार किसी से होता है’, ‘फिर वही दिल लाया हूं’, ‘तीसरी मंजिल’, ‘बहारों के सपने’, ‘प्यार का मौसम’ और ‘कारवां’ तक यानी अगले चौदह साल तक आशा पारिख को अपनी हीरोइन बनाए रखा। निजी जिंदगी में वे खुद आशा पारिख के हीरो थे, हालांकि शादीशुदा और परिवार वाले व्यक्ति थे। आशा पारिख उनसे शादी इसलिए नहीं कर पाईं कि किसी का घर न बिखर जाए, मगर बदले में स्वयं उन्होंने भी कभी विवाह नहीं किया। 2002 में नासिर हुसैन साहब का निधन हुआ। वे आज के बड़े अभिनेता आमिर खान के न केवल चाचा थे, बल्कि उन्होंने ही ‘कयामत से कयामत तक’ में आमिर को लॉन्च किया था।

आशा पारिख ने अपने वक्त के लगभग सभी बड़े अभिनेताओं के साथ काम किया, सिवाय दिलीप कुमार और राज कपूर के। नासिर साहब की फिल्मों के अलावा उनके लिए ‘उपकार’, ‘शिकारी’, ‘दो बदन’, ‘कटी पतंग’, ‘मेरा गांव मेरा देश’ और बाद में ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ महत्वपूर्ण फिल्में रहीं। 1999 में ‘सर आंखों पर’ उनकी अंतिम फिल्म थी। उन्होंने खुद कई टीवी सीरियल बनाए। 1992 में उन्हें पद्मश्री दिया गया था। फिलहाल वे मुंबई में एक डांस एकेडमी और एक अस्पताल चलाती हैं।

हैरानी की बात यह है कि 79 बरस की आशा पारिख फाल्के पुरस्कार पाने वाली महज़ सातवीं महिला हैं। उनसे पहले सन् 2000 में गायिका आशा भोंसले को यह सम्मान मिला था। सोचिए, अब तक 69 लोगों को यह पुरस्कार दिया गया है और उनमें महिलाएं केवल सात? तो क्या हम फाल्के पुरस्कार के मामले में महिलाओं के साथ भेदभाव बरतते रहे हैं? और अब जबकि आशा पारिख को इसके लायक माना गया है तो क्या उस दौर की अन्य अभिनेत्रियों की भी बारी आएगी? और हिंदी की ही अभिनेत्रियां क्यों, दक्षिण की शारदा और बंगाल की सुचित्रा सेन का नंबर कब आएगा?

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