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राजू श्रीवास्तव: हंसी का देसी किस्सागो

रात के अंधेरे में एक गांव में एक घर के दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। एक बूढ़ी महिला ने दरवाजा खोला और पूछा- ‘कौन हो भाई, क्या बात है?’ आगंतुक ने कहा- ‘अम्मा, राहुल भैया आए हैं।‘ महिला ने पूछा- ‘कौन राहुल भैया?’ वह व्यक्ति बोला- ‘अरे अम्मा वही, अपने राहुल भैया, वही आए हैं।‘ अम्मा- ‘मगर वो काहे आए हैं?’ आगंतुक- ‘अम्मा, वो आपके घर रुकेंगे, रात को यहीं सोएंगे।‘ महिला ने कहा- ‘हमरे घर कैसे सोएंगे, हमरे यहां तो एक ही चारपाई है।‘ आगंतुक बोला- ‘कोई बात नहीं, वो उसी पर सो जाएंगे।‘ महिला ने कहा- ‘मगर उस पर कैसे सो जाएंगे। उस पर तो बहिन जी पहले से सो रही हैं।‘

राजू श्रीवास्तव ने यह चुटकुला उन दिनों बनाया और पेश किया था जब कुछ नेताओं में उत्तर प्रदेश के गांवों में जाकर दलितों के घर भोजन करने और उनके यहां रात गुजारने के उपक्रम की होड़ लगी थी। देश के किसी भी अन्य स्टैंडअप कमेडियन के सुनाए इतने किस्से या चुटकुले लोगों को याद नहीं होंगे जितने राजू के याद हैं। वे किस्से किसी शादी में रिश्तेदारों व बारातियों के नखरों, शादी के भोजन, किसी बाढ़ के हालात, पति-पत्नी के बीच की तकरार, राजनीति, मीडिया, बाढ़ और यहां तक कि ट्रैफिक जाम को लेकर भी हो सकते थे। अपने शहर कानपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बोले जाने वाले शब्द, भाषा, वहां का लहजा और उससे पैदा हो सकने वाले हास्य की गहराइयां वे अपने साथ पूरे देश में बल्कि विदेशों में भी ले गए।

‘गजोधर’ और ‘संगठा’ जैसे काल्पनिक देहाती पात्रों के जरिए उन्होंने अनगिनत मज़ाहिया किस्से गढ़े। खूबी यह थी कि उन किस्सों में अपना पूरा निम्न-मध्य वर्गीय समाज, उसकी छोटी-छोटी खुशियां, उसकी परेशानियां, उसकी हताशा, उसके जोखिम और उसकी उम्मीदें झलकती थीं। स्टेज पर उन्होंने इस वर्ग के इन सब पहलुओं को तरह-तरह से उकेरा।

हास्य की स्थितियां गढ़ना और उनकी किस्सागोई राजू ने बाद में सीखी। उनकी शुरूआत तो मिमिक्री यानी जानेमाने लोगों की आवाज़ और अंदाज़ की नकल उतारने से हुई थी। वह भी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मिमिक्री से। पिता मेहमानों के सामने राजू से फरमाइश करते थे कि बेटा इंदिरा गांधी की आवाज़ बना कर सुनाओ। इसी मिमिक्री के सहारे उन्होंने स्टेज पर काम शुरू किया और इसी के भरोसे मुंबई पहुंच गए। ‘मैंने प्यार किया’, ‘बाजीगर’, ‘आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया’, ‘बॉम्बे टू गोवा’, ‘तेजाब’ आदि फिल्मों में उन्हें काम भी मिला। उनकी आखिरी फिल्म ‘कंजूस मक्खीचूस’ कुछ समय बाद ओटीटी पर आने वाली है। मगर राजू श्रीवास्तव शायद फिल्मों के लिए नहीं बने थे। उन्हें अपनी वास्तविक पहचान स्टेज पर स्टैंडअप कमेडियन के तौर पर मिली।

‘द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज’ से राजू की इस प्रतिभा को सबसे बड़ा मंच मिला। ऐसे मंचों पर कई साल तक उनका सिक्का चला। हालत यह हो गई कि इस शो के जजों में से एक शेखर सुमन ने एक बार राजू को मिले एक स्टैंडिंग ओवेशन के बाद कहा था कि ‘इस आदमी से ज्यादा इस देश को और कोई नहीं समझता।‘ जब दुनिया और मनोरंजन की दुनिया बहुत तेजी से बदल रही हो, ऐसे में स्टैंडअप क़मेडियन के तौर पर कुछ बरसों की एकछत्रता को भी राजू श्रीवास्तव की बड़ी उपलब्धि माना जाना चाहिए।

फिल्मों की ही तरह राजू श्रीवास्तव शायद राजनीति के लिए भी नहीं बने थे। पहले समाजवादी पार्टी में गए और फिर भाजपा में। देश में चल रहे विचारधारात्मक विभाजन का असर उन पर भी पड़ा। इसके असर में उन्होंने जो कुछ भी कहा था उसे लेकर उनके निधन के बाद सोशल मीडिया में विवाद भी उठा। सच्चाई यह है कि आज हम बहुत से फिल्मकारों को इस विभाजन के किसी एक तरफ खड़े देख रहे हैं। तो क्या भविष्य में उन्हें भी अपनी विधा की महारत की बजाय विचारधारा जनित उनकी टिप्पणियों के लिए याद किया जाएगा? तो फिर आज के हमारे डॉक्टरों, वकीलों, वैज्ञानिकों और पत्रकारों की पेशेगत उपलब्धियों का क्या होगा? वे सब भी तो बड़े पैमाने पर इसी तरह विभाजित हैं।

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