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Bollywood Breaking : Salman Khan का बड़ा ऐलान, Eid पर ही रिलीज होगी मोस्ट अवेटेड फिल्म राधे

Mumbai: कोरोना की दूसरी लहर का बॉलीवुड पर भी काफी असर पड़ा है. कई फिल्मों की डेट पहले से ही टाल दिये गये हैं.  ऐसे में स्थिति को सामन्य होने में अभी कितना समय लगेगा इसपर कुछ भी कह पाना अभी संभव नहीं है. ऐसे में सलमान खान की मोस्ट अवेटेड फिल्म  राधे को लेकर एक नई खबर आई है. सलमान खान ने कहा है कि  ईद में फिल्म ‘राधे’ रिलीज किया जाएगा.उन्होंने ट्रवीट कर अपने प्रशंसकों को इसकी जानकारी दी है.  बता दें कि पिछले साल भी कोरोना के कारण ईद के मौके पर सलमान खान की ये फिल्म रिलीज नहीं हो सकी थी. ऐसे में अब सलमान खान ने एक नई तरकीब निकाली है.

 

ऐसे रिलीज होगी राधे

सलमान खान ने फिल्म को रिलीज करने के लिए  एक नया रास्ता निकाला है. ‘राधे’ को अब सिनेमाघरों के साथ ओटीटी प्लेटफॉर्म और तमाम डीटीएच प्लेटफॉर्म्स पर भी एक साथ रिलीज किया जाएगा. बता दें कि  ‘राधे’ फिल्म के ओटीटी राइट्स जी5 के पास है.  ‘राधे’ को सीधे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उतारे जाने के सलमान खान खिलाप रहे हैं. उन्होंने कहा था कि फिल्म को पहले सिनेमाघरों में ही रिलीज किया जाएगा. अब इस पर फैसला कर लिया गया है.  राधे अब  सिनेमाघरों के साथ ओटीटी प्लेटफॉर्म पर तो आएगी मगर एक अलग अंदाज में. दर्शकों के फिल्म को देखमने के लिए ‘पे पर व्यू’ करना होगा.  मॉडल के तौर पर जीप्लेक्स और तमाम डीटीएच चैनलों पर एक साथ स्ट्रीम किया  जाएगा.  जहां फिल्म देखने के लिए हर दर्शक को निश्चित रकम चुकानी होगी.   इसके साथ ही  देश-विदेश में जहां भी सिनेमाघर खुले हैं, वहां के सिनेमाघरों में 13 मई को फिल्म ‘राधे’ को रिलीज किया जाएगा.

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ओटीटी और सिनेमाघर पर एक साथ रिलीज होने वाली पहली फिल्म

कोरोना के कारण कई चीजों में बदलाव हो रहा है. ऐसे में ‘राधे’  अब सिनेमाघरों के साथ ही ओटीटी व तमाम डीटीएच प्लेटफॉर्म्स पर एक साथ रिलीज होने के साथ अपनी तरह की पहली फिल्म बन गई है. ‘राधे’ बॉलीवुड की पहली ऐसी फिल्म होगी जो एक ही दिन पर सिनेमाघरों के साथ साथ ओटीटी के रास्ते दर्शकों तक पहुंचेगी. खुद सलमान खान ने भी इस खबर की पुष्टि सोशल मीडिया के जरिए कर दी है. बता दें कि सलमान ने कहा था कि अगर मौजूदा हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया तो ‘राधे’ को अगले साल ईद के मौके पर सिनेमाघरों में रिलीज किया जाएगा.

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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बेबाक विचार | लेख स्तम्भ | संपादकीय

जवाबदेही का सवाल है

अगर किसी कानून का दुरुपयोग हो रहा हो या उसकी खामियां सामने आ रही हों, तो न्यायिक व्यवस्था को यह अवश्य बताना चाहिए कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। साथ ही उस दुरुपयोग या खामी की कीमत जिन्हें चुकानी पड़ी, उनके नुकसान की भरपाई कौन करेगा। वरना, लोकतंत्र अपूर्ण बना रहेगा।

लोकतंत्र का मूलभूत सिद्धांत होता है- जवाबदेही। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें किसी को निरंकुश नहीं होना चाहिए। यानी सबकी किसी ना किसी के प्रति जवाबदेही होती है। इसलिए अगर किसी कानून का दुरुपयोग हो रहा हो या उसकी खामियां सामने आ रही हों, तो न्यायिक व्यवस्था को यह अवश्य बताना चाहिए कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। साथ ही उस दुरुपयोग या खामी की कीमत जिन्हें चुकानी पड़ी, उनके नुकसान की भरपाई कौन करेगा। चूंकि अपने देश में यह जवाबदेही नहीं निभाई जाती, इसलिए कहा जा सकता है कि भारतीय लोकतंत्र कभी अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सका। पिछले कुछ सालों में तो यह जहां तक पहुंचा था, वहां से भी वापस लौटता दिखता है। बहरहाल, ये सारे सवाल एक ताजा न्यायिक फैसले से उठे हैँ। पिछले हफ्ते गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून (यूएपीए) के तहत लगे आरोप में नौ साल जेल में बिताने के बाद मोहम्मद इलियास और मोहम्मद इरफान नाम के दो व्यक्तियों को एक विशेष अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया।

अदालत ने कहा कि दोनों के खिलाफ कोई सबूत नहीं है। 33 साल के मोहम्मद इरफान और 38 साल के मोहम्मद इलियास को महाराष्ट्र पुलिस के आतंक विरोधी दस्ते (एटीएस) ने अगस्त 2012 में गिरफ्तार किया था। उनके अलावा दो और लोगों को गिरफ्तार किया गया था। पांचों के खिलाफ आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा से संबंध होने के आरोप लगाए गए थे। चूंकि मामला हथियार बरामद होने और राजनेताओं, पुलिस अफसरों और पत्रकारों की हत्या करने की योजना बनाने की एक साजिश का था, 2013 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने जांच अपने हाथों में ले ली थी। लेकिन एनआईए भी मोहम्मद इलियास और मोहम्मद इरफान के खिलाफ ऐसे सबूत नहीं जुटा पाई, जिनसे अदालत उन पर लगे आरोपों पर भरोसा कर सके। रिहाई के बाद मोहम्मद इरफान ने जो कहा- असल सवाल वही है। उन्होंने कहा- “बस, नौ साल, जो गए, सब हवा में।” किसी जिदंगी में नौ साल और उस दौरान झेली गई मानसिक और अन्य यांत्रणाओं का क्या महत्त्व होता है, इसे एक मानवीय व्यवस्था ही समझ सकती है। यहां गौरतलब है कि यूएपीए के दो चरण हैं। पहला चरण 2008 में मुंबई पर आतंकवादी हमलों के बाद का है, जब ये कानून बना था। दूसरा चरण नरेंद्र मोदी सरकार की तरफ से इसे दिए गए नए रूप का है। नए रूप में इस कानून को जो कहर टूटा है, वह और भी भयानक है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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