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शम्मा जलाए रखना, जब तक कि मैं ना आऊं

गायक व संगीतकार भूपिंदर सिंह के निधन के बाद एक व्हाट्सऐप ग्रुप में एक छोटा सा वीडियो डाला गया। इसमें एक हॉल नुमा कमरे में भूपिंदर का पार्थिव शरीर फर्श पर लिटाया गया है और उसके चारों तरफ गोलाई में पचास-साठ लोग खड़े हैं जो सब मिल कर ऊंचे स्वर में गा रहे हैं – ‘नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा।’ उस हॉल में एक तरफ जमीन पर बैठे अन्य लोग भी दिख रहे हैं और शायद वे भी गा रहे हैं। यह वीडियो मुंबई के ओशीवारा श्मशान में भूपिंदर के अंतिम संस्कार से कुछ घंटे पहले उन्हें अस्पताल से घर लाए जाने पर बनाया गया होगा।

निश्चित ही भूपिंदर के पार्थिव शरीर के गिर्द खड़े लोगों ने इस मौके पर उनके और भी गीत गाए होंगे। उनमें शायद ‘एक अकेला इस शहर में’ भी रहा होगा जो भूपिंदर को अपने गाए गीतों में सबसे ज्यादा प्रिय था। ‘शम्मा जलाए रखना, जब तक कि मैं ना आऊं’ भी इन लोगों ने गाया होगा जिसकी मांग भूपिंदर और उनकी पत्नी मीताली के हर कॉन्सर्ट में की जाती थी। इसी तरह वहां ‘हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा’ भी जरूर गाया गया होगा जिसके बिना भूपिंदर का किस्सा ही अधूरा है। यह उनका पहला फिल्मी गीत था। संगीतकार मदन मोहन ने उन्हें दिल्ली से इसी के लिए बुलाया था। उन्हें इसमें मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे और तलत महमूद जैसे दिग्गजों के साथ गाना था जो कि एक नए गायक के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी।

रिकॉर्डिंग के बाद इस गीत पर भूपिंदर से अभिनय भी करवाया गया। बल्कि परदे पर गीत की शुरूआत ही उनसे होती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि वे इस गीत की पहली दो पंक्तियां मोहम्मद रफ़ी की आवाज में गाते दिखते हैं और फिर अपनी आवाज पर आते हैं। यानी एक ही अभिनेता पर दो आवाजें, एक ही गीत में। कहा नहीं जा सकता कि यह गड़बड़ कैसे हुई जबकि इस फिल्म यानी ‘हक़ीकत’ से चेतन आनंद, मदन मोहन और कैफ़ी आज़मी जैसे भारी-भरकम नाम जुड़े हुए थे। चीन के साथ 1962 की लड़ाई के बाद पंडित नेहरू ने खुद चेतन आनंद से ऐसी फिल्म बनाने को कहा था जो इस युद्ध को लेकर देश में छायी निराशा से लोगों को उबारने में मदद करे। व्यावहारिक रूप से यह देश की पहली युद्ध आधारित फिल्म थी। इस फिल्म और इसके गीतों को लोग आज भी सम्मान से याद करते हैं। चेतन आनंद इस प्रोजेक्ट में ऐसे खप गए थे कि उन्होंने अपने भाई देव आनंद की ‘गाइड’ का निर्देशन भी ठुकरा दिया था जिसे नोबेल पुरस्कार प्राप्त अमेरिकी लेखिका पर्ल एस. बक की सलाह और मदद से बनाया जा रहा था।

यह अलग बात है कि ऐसी गड़बड़ियां हमारी फिल्मों में पहले भी होती रही थीं। यहां तक कि महबूब खान की ‘मदर इंडिया’ जो कि ऑस्कर के लिए भेजी गई, उसके भी एक गाने में यह कमाल हुआ था। यह गीत था ‘दुख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे।’ इसमें पहले राजकुमार पर मोहम्मद रफी और मन्ना डे दोनों की आवाज फिल्मा दी गई और फिर राजेंद्र कुमार पर भी ऐसा किया गया। इसी तरह पहले नरगिस दो गायिकाओं लता मंगेशकर और शमशाद बेगम की आवाज में गाते दिखीं और फिर कुमकुम के साथ भी ऐसा हुआ। इस गीत की शूटिंग फिल्म के संगीतकार नौशाद की गैर मौजूदगी में हुई थी। लौट कर उन्होंने इस पर काफ़ी ऐतराज किया, पर महबूब ने कहा कि अब जाने दो, बहुत खर्चा हो चुका है, जो होगा देखा जाएगा। और दर्शकों ने इसे इसी रूप में स्वीकार किया जैसे बाद में ‘हो के मजबूर मुझे’ को किया।

बहरहाल, बॉलीवुड में किसी गायक या संगीतकार के निधन पर उसके पार्थिव शरीर के सामने उसके गीतों का एक स्वर में गायन कोई बहुत पुराना चलन नहीं है। सबसे पहले ओपी नैयर के निधन पर यह प्रमुखता से देखा गया। उनकी अंतिम यात्रा में उन्हें कंधा देने वाले लोग उनके संगीतबद्ध किए गीत गा रहे थे। जिस समय उनकी चिता को अग्नि दी गई तब ‘उड़ें जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी’ का समवेत गायन हो रहा था जिसमें सबसे ऊंची आवाज अन्नू कपूर की थी।

– सुशील कुमार

 

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