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शंकर-जयकिशन लाए थे सबसे बड़ा ऑर्केस्ट्रा

पिछले साल नवंबर की 13 तारीख को वेनेजुएला में 8573 म्यूजिशियनों ने एक साथ एक ही धुन बजा कर दुनिया के सबसे बड़े ऑर्केस्ट्रा का विश्व रिकॉर्ड बनाया। इसमें बारह साल के बच्चों से लेकर 77 बरस के बुजुर्ग तक शामिल थे। वहां के ‘एल सिस्टेमा’ नामक ऑर्केस्ट्रा से जुड़े ये लोग कई दिन पहले से देशभक्ति की एक धुन का अभ्यास करते रहे। रिकॉर्ड बनाने के लिए वे काराकस की एक सैन्य अकादमी में जुटे और पांच मिनट से ज्यादा समय तक एक सुर में अपने वाद्य बजाते रहे। इन लोगों ने कुछ ही दिन पुराने रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में 8097 म्यूजीशियनों के बनाए रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया। खास बात यह है कि उन दिनों कोरोना चल ही रहा था और ऑर्केस्ट्रा में शामिल सब लोग मास्क पहने हुए थे।

वैसे भी पश्चिम के कई ऑर्केस्ट्रा ऐसे हुए हैं और हैं जिनमें सैकड़ों म्यूजीशियन दिखते हैं। जुबिन मेहता के साथ हम यह देख ही चुके हैं। 2016 में ‘आर्ट ऑफ लिविंग’वाले श्री श्री रविशंकर के दिल्ली में यमुना किनारे हुए ‘वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल’ में दावा किया गया था कि पचास किस्म के दस हज़ार वाद्य एक साथ बजाए गए। यह बात अलग है कि यह कार्य़क्रम संगीत की बजाय विवादों के लिए ज्यादा चर्चित रहा।

फिल्मी गीतों में आम तौर पर गिनती भर के वाद्यों से काम चल जाता है। बहुत हुआ तो तीस-चालीस साजिंदों से। फिर भी संगीत को ज्यादा असरदार बनाने के लिए कई संगीतकार बड़े ऑर्केस्ट्रा यानी ज्यादा वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल करते हैं। यह छोटे और बड़े बैंड जैसा मामला है। कोई भी धुन छोटे बैंड पर भी बजाई जा सकती है, लेकिन जब कोई ज्यादा वाद्यों वाला बैंड वही धुन बजाता है तो उसकी भव्यता और प्रभाव दोनों बढ़ जाते हैं।

एक सदी पहले मूक फिल्मों के समय थिएटरों में बाकायदा हारमोनियम, तबला, सारंगी और बांसुरी बजाने वाले बैठते थे जो फिल्म के दृश्यों के हिसाब से अपने-अपने वाद्य बजाते थे। इन लोगों को परदे के करीब इस तरह बिठाया जाता था कि दर्शकों की निगाह में न आएं। इन साजिंदों के लिए सीन के साथ तालमेल रखना बहुत जरूरी होता था। फिर जब बोलती फिल्में बनने लगीं तब भी शुरूआत में हाल यह था कि शूटिंग के समय ही संगीत बजाया जाता था जो उस सीन के साथ ही रिकॉर्ड किया जाता था। जैसे किसी बाग का दृश्य है तो पेड़ों के पीछे साजिंदे छुपे रहते और संगीत बजाते रहते। बाद में टेक्नोलॉजी थोड़ी आगे बढ़ी तो गाने अलग से रिकॉर्ड होने लगे और शूटिंग के बाद सीन के हिसाब से उसमें संगीत भरा जाने लगा। धीरे-धीरे स्थितियां और बदलीं। एक ही इन्स्ट्रूमेंट से कई वाद्यों का काम निकलने लगा, कई नए वाद्य पैदा हो गए, संगीत में अनेक प्रकार के स्पेशल इफेक्ट्स डाले जाने लगे और एक ही गीत के अलग-अलग गायक अलग-अलग वक्त पर जाकर अपना हिस्सा रिकॉर्ड कराने लगे।

बड़ा ऑर्केस्ट्रा कई संगीतकारों ने कई बार इस्तेमाल किया है। लेकिन नब्बे साल के अपने फिल्म संगीत में किसी गाने के लिए सबसे बड़ा ऑर्केस्ट्रा शंकर-जयकिशन की संगीतकार जोड़ी ने इस्तेमाल किया। राजकपूर की ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के गीत ‘आ अब लौट चलें’ के लिए ऐसा हुआ। इस गीत को शैलेंद्र ने लिखा था और मुकेश व लता मंगेशकर के अलावा कोरस के लिए इसमें साठ दूसरे गायक भी थे। मुंबई के ताड़देव के फेमस स्टूडियो में जब इस गीत की रिकॉर्डिंग शुरू हुई तो इनमें से कई को बाहर बैठाया गया क्योंकि अंदर जगह नहीं बची। रिहर्सल सुबह शुरू हुई थी, लेकिन अंतिम रिकॉर्डिंग रात तीन बजे जाकर हो सकी क्योंकि ट्रैफिक का शोर थमने का इंतजार किया जाता रहा। इस ऑर्केस्ट्रा में साठ वायलिन थे, बारह चेलो, चार डबल बास, दो मेंडोलिन, दो सितार और दस ब्रास ट्रंपेट के अलावा कई दूसरे इंस्ट्रूमेंट भी थे। इन करीब सौ इंट्रूमेंट को रिकॉर्डिस्ट मीनू कत्रक ने कुल छह माइक से रिकॉर्ड किया था। इस गीत को सुनते हुए आप इसके ऑर्केस्ट्रा की विशालता का भी अनुभव कर सकते हैं।

‘जिस देश में गंगा बहती है’ में निर्देशन हालांकि राधू करमाकर ने दिया था, लेकिन यह फिल्म राज कपूर की थी। राज कपूर खुद संगीत के अच्छे जानकार थे और उन्हें कुछ बड़ा करने की धुन सवार रहती थी। उन्होंने ही सबसे पहले शंकर-जयकिशन को ‘बरसात’ में मौका दिया था। वह भी यह सुन कर कि यह जोड़ी 100 साजिंदों वाला ऑर्केस्ट्रा संभाल सकती है। कहा जाता था कि अगर पचास लोग भी एक साथ एक धुन पर वायलिन बजा रहे हों तो शंकर और जयकिशन दोनों में यह काबलियत थी कि वे अचानक किसी को टोक देते कि अपना नोटेशन चेक करो। और वह व्यक्ति समझ जाता कि उससे गलती हुई है।

बड़े ऑर्केस्ट्रा के साथ बड़ी प्रतिष्ठा भी जुड़ गई है। इसीलिए अमिताभ बच्चन के जन्मदिन पर सोनी टीवी ने‘कौन बनेगा करोड़पति’में जिस ऑर्केस्ट्रा का इंतजाम किया उसके लिए बाकायदा जया बच्चन ने बताया कि‘यह 80 पीस ऑर्केस्ट्रा’है। यह चैनल चाहता तो दस-बारह पीस के ऑर्केस्ट्रा से भी अमिताभ की पुरानी फिल्मों के गीतों की धुनें बजवा सकता था, मगर तब जया शायद इसका जिक्र भी नहीं करतीं। जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है कि कम वाद्यों के साथ अच्छे गीत नहीं बन सकते।

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