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ऐसे तो नहीं आएगा काला धन बाहर

श्रीशचंद्र मिश्र
सत्ता में एक हजार से ज्यादा दिन पूरे कर चुकी मोदी सरकार की अगर कोई सबसे बड़ी विफलता है तो वह देश-दुनिया में पसरा भारतीयों का काला धन बाहर लाने का संकल्प पूरा न हो पाना है। अब जीएसटी के सहारे देश में काले धन का चलन रोकने का सपना देखा जा रहा है। 2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी का यही सबसे लुभावन चुनावी एजेंडा था और उसके पूरा होने पर चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादे के मुताबिक हर नागरिक ने अपने खाते में 15 लाख रुपए आने का सपना पाल लिया था। सत्ता में आने के बाद कथित रूप से युद्धस्तर पर कोशिश भी की गई। अक्टूबर 2014 में मोदी सरकार ने उन 627 लोगों के नाम सुप्रीम कोर्ट के सौंपें जिनके एचएचबीसी बैंक की जिनेवा शाखा में खाते थे।

संसद में काला धन विधेयक पास हुआ इससे अघोषित विदेशी आय और संपत्ति पर कर लगाने का रास्ता खुला। लेकिन इस सारी कवायद का नतीजा बहुत ज्यादा उत्साहवर्धक नहीं रहा। हां, थोड़े बहुत बदलाव जरूर हुए। अब इसे विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के मोदी सरकार के अभियान का नतीजा माना जाए या स्विटजरलैंड की बैकिंग प्रणाली की गोपनीयता के खिलाफ चली वैश्विक मुहिम का कि पिछले कुछ समय में स्विस बैंकों में भारतीयों की जमा राशि 33 फीसद तक घट गई है। यह आंकड़ा भी स्विटजरलैंड के केंद्रीय बैंकिंग प्राधिकरण स्विस नेशनल बैंक (एनएनबी) ने पिछले दिनों जारी किया। इसके मुताबिक 2015 के अंत तक भारतीयों ने स्विस बैंक में जमा 59.64 करोड़ स्विस फ्रैंक निकाल लिए।

अब वहां के बैंकों में भारतीयों के 121.76 करोड़ स्विस फ्रैंक यानी 8392 करोड़ रुपए ही रह गए हैं। 2006 में स्विस बैंकों में भारतीयों के 6.5 अरब स्विस फ्रैंक यानी करीब 23 हजार करोड़ रुपए जमा थे। यूपीए सरकार के समय 2011 में इसमें 12 फीसद और 2013 में 42 फीसद का इजाफा हुआ था। 2015 के अंत तक इसमें तेजी से गिरावट होने का एक कारण निश्चित रूप से मोदी सरकार की काला धन खत्म करने की मशक्कत का नतीजा हो सकता है। लेकिन अभी ब्योरा ही सामने आया है। उस रकम में काला धन कितना है, पता नहीं। उसे वापस लाने का कोई रास्ता भी नहीं बन पा रहा है। लोकसभा चुनाव में बाहर से काला धन वापस लाने का वादा एक लोकप्रिय चुनावी नारा बन गया था। यह वादा अब मोदी सरकार का उपहास उड़ाने का विपक्ष का मजबूत हथियार बन गया है तो इसलिए कि सख्त नीतियां अपनाने के बाद भी सरकार विदेशों में जमा काला धन अपेक्षित मात्रा में वापस नहीं ला सकी है।

काला धन विधेयक में प्रावधान है कि विदेशों में अवैध धन रखने वालों को दस साल की सजा दी जा सकती है और उनसे जमा रकम पर 120 फीसद का जुर्माने के रूप में वसूला जा सकता है। समस्या यह है कि विदेशों में जमा भारतीयों के पैसे में काला धन कितना है, इसका पता लगाने का कोई जरिया नहीं है। स्विस बैंकों में सेविंग्स और डिपाजिट खातों में रकम जमा की जाती है। इसमें काला धन तलाश पाना आसान नहीं है। दिसंबर 2015 तक स्विस बैंकों में भारतीयों की जो जमा राशि घटी वह कहां गई, इसका पता लगाने का भी कोई साधन नहीं है। अगर यह काला धन है तो कई कर मुक्त देशों या मध्य पूर्व में उसके जाने की संभावना को नहीं नकारा जा सकता। हो सकता है कि हवाला के जरिए यह पैसा भारत आ गया हो। विदेशों में जमा काले धन के मामले में जिस तरह से कदम उठाए जा रहे हैं उससे अपराधियों को अपना बचाव करने का पूरा मौका मिल जाता है। वैसे भी जो लोग इस तरह का खेल खेलते हैं वे फर्जी कंपनियों का सहारा लेते हैं। उनके जटिल जाल को तोड़ पाना आसान नहीं है। सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि कर मुक्त देशों के वित्तीय संस्थान या वहां की सरकार आसानी से जानकारी नहीं देती। स्विटजरलैंड की सरकार ने बार-बार गुजारिश किए जाने के बाद भी ‘गुप्त’ खातों की जानकारी साझा करने से मना कर दिया है।

स्विस सरकार काले धन के खिलाफ भारतीय अभियान में सहयोग करने और उसे विस्तार देने से सहमत तो हैं पर उसके लिए पुख्ता संधि की दरकार है। 2018 में एक करार होना प्रस्तावित है जिससे सूचनाओं का स्वतः आदान-प्रदान हो सकेगा। सालों से यही धारणा बनी हुई है कि देश के नेता, कारोबार या अन्य सेलिब्रिटी स्विटजरलैंड के बैंकों में अपना काला धन जमा करते हैं। इंटरनेशनल कंसोर्टियम आफ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आईसीआईजे) ने 2013 में जो सबसे बड़ा रहस्योद्घाटन किया, वह तस्वीर का दूसरा रुख दिखाने वाला था। आईसीआईजे ने 170 देशों व क्षेत्रों के व्यक्तियों व कंपनियों के दूसरे देशों में, खास कर उन देशों में जहां टैक्स की जकड़न नहीं होती, एक लाख बीस हजार से ज्यादा फर्मों व ट्रस्टों के अस्तित्व का ब्योरा देने के साथ साथ बड़े स्तर पर वहां पूंजी निवेश और गुपचुप तरीके से पैसों का लेन-देन करने का खुलासा भी किया। 612 भारतीय इस सूची में शामिल थे। इनमें सांसद भी थे और कारोबारी भी।

आईसीसीजे वाशिंगटन स्थित एक स्वतंत्र नेटवर्क है जो वैश्विक स्तर पर खोजबीन करने वाले पत्रकारों-संवाददाताओं का परिसंघ है। 46 देशों के 38 मीडिया संगठनों के 86 पत्रकारों ने 15 महीने की खोजबीन के बाद 260 जीबी का डाटा जुटाया। 2010 में विकीलीक्स ने अमेरिका के अनेक विभागों के जो दस्तावेज लीक किए थे, आईसीआईजे का ब्योरा उससे 160 गुना बड़ा था। पैसों को इधर उधर करने का ब्योरा 25 लाख खुफिया फाइलों और तीस साल के बीस लाख ई-मेल का जखीरा था। सूची में जिन जाने माने भारतीयों के नाम थे उनके बारे में खुलासा किया गया था कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवाएं मुहैया कराने वाली सिंगापुर की ‘पोर्ट कुलिस ट्रस्ट नेट’ (पीटीएन) और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड की ‘द कामन वैल्थ ट्रस्ट मिलिटेड (सीटीएल)’ जैसी संस्थाओं की मदद से बिटिश वर्जिन आईलैंड, कुक आईलैंड व समोआ जैसे कर वंचकों के लिए स्वर्ग माने जाने वाले देशों में फर्म पंजीकृत कराई। आईसीआईजे ने बताया कि पीटीएन और सीटीएल ने बाहरी देशों में कंपनियां स्थापित करने, निजी वित्तीय ट्रस्ट बनाने और आसानी से पकड़ में नहीं आने वाले बैंक खाते खुलवाने में उनकी मदद की।

आईसीआईजे के खुलासे में कांग्रेस के तब के लोकसभा सदस्य विवेकानंद गद्दम व राज्यसभा के निर्दलीय सदस्य विजय माल्या का भी नाम आया। उनके अलावा बड़ौदा के पूर्व रजवाड़े के कई सदस्य, उद्योगपति रविकांत रुइया, सोनू लालचंद मीरचंदानी, एमआरएफ समूह के सदस्यों, विद्या सागर ओसवाल, चेतन बर्मन डाबर, समीर मोदी, गुरबचन सिंह धींगड़ा, हीरा व्यापारी रश्मि कीर्तिलाल मेहता व भाविन रश्मि मेहता, पापड़ किंग लंकालिंगम गुरुगेसू, सत्यम कंप्यूटर्स के पूर्व अध्यक्ष रामलिंगा राजू के बेटे तेजा राजू, मैत्रेय विनोद जोशी आदि के नाम भी सूची में थे। इनमें से कुछ ने सूची में दर्ज कंपनियों से अपना नाता होने से मना कर दिया। कुछ ने अपने कारोबार को वैध बताया। 2015 में पनामा पेपर्स लीक होने से कई और विशिष्ट लोगों की कर मुक्त देशों में फर्जी या बेनामी कंपनियों की जानकारी मिली। दरअसल बड़े पैमाने पर पैसे का हेर-फेर करने वाले रसूखदार लोगों की सत्ता और राजनीति में मजबूत पकड़ होने की वजह से उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती। 

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