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जेरमी कॉर्बिन से क्या सीखें?

(image) ब्रिटेन में 8 जून को हुए संसदीय चुनाव ने दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में हाल के वर्षों में दिखे रूझान की फिर से पुष्टि की। यह रूझान इतने सुसंगत ढंग से आगे बढ़ा है कि अब इसे एक परिघटना कहा जा सकता है। परिघटना यह है कि स्थापित राजनीतिक दलों में लोगों का भरोसा लगातार क्षीण हो रहा है। इस कारण इन दलों का चिर-परिचित समर्थन आधार खिसक रहा है। लोगों की उम्मीदों का केंद्र अब ऐसे नेता बन रहे हैं, जो जनता से सीधा संवाद करते हैं। दक्षिणपंथ की तरफ से डोनल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी जैसे नेता उभरे। गौरतलब है कि दोनों अपनी-अपनी पार्टियों (अमेरिका में रिपब्लिकन और भारत में भारतीय जनता पार्टी) के जमे-जमाए नेताओं को धकियाते हुए पार्टी नेतृत्व पर काबिज हुए। 

दक्षिणपंथ हमेशा सुविधा की स्थिति में रहता है। यथास्थिति में स्वार्थ रखने वाले तमाम सामाजिक वर्गों तथा प्रतिगामी सांस्कृतिक मूल्यों से प्रेरित ताकतों का समर्थन उसे स्वाभाविक रूप से हासिल होता है। इसलिए उसके पास धन और संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहते हैं। फिर ऐसे नेताओँ के लिए सामाजिक विद्वेष और परंपरागत पूर्वाग्रहों को हवा देते हुए तथा निराधार बातों का प्रचार करते हुए मतदाताओं को लुभा लेना अपेक्षाकृत आसान बना रहता है। 

जबकि आधुनिक या उदारवादी मूल्यों अथवा वामपंथी एजेंडे के साथ मतदाताओं में लोकप्रिय होना कठिन है- क्योंकि यह धारा के विरुद्ध तैरने जैसा है। अतीत में विभिन्न देशों में वंचित तबकों के हितों के लिए लगातार संघर्ष करते हुए ऐसी पार्टियों ने अपना समर्थन आधार बनाया था। लेकिन सोवियत संघ के विखंडन के बाद जिस तरह उनमें मध्य-मार्ग अपनाने तथा नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों को स्वीकार करते चले जाने की प्रवृत्ति उभरी, उससे उनकी विशिष्ट पहचान और यहां तक कि खास भूमिका भी धूमिल हो गई। 2015 में डेविड मिलिबैंड ऐसी ही लेबर पार्टी को लेकर चुनाव मैदान में उतरे थे। तब पार्टी न सिर्फ पांच साल के कंजरवेटिव-लिबरल गठबंधन सरकार के दौरान पैदा हुए असंतोष का लाभ नहीं उठा सकी, बल्कि उसके अपने समर्थन आधार में भी सेंध लग गई। उसके बाद से लेबर पार्टी बड़े उथल-पुथल से गुजरी। 

पार्टी के स्थापित नेतृत्व को परास्त करते हुए सितंबर 2015 में जेरमी कॉर्बिन नेता बने। 2016 में ब्रेग्जिट जनमत संग्रह के बाद पुराने नेतृत्व ने प्रतिघात किया। लेकिन कॉर्बिन फिर नेता चुने गए। और अब कॉर्बिन ने लेबर पार्टी को फिर से जीवंत बना दिया है। आखिर उन्होंने ऐसा करिश्मा कैसे किया? 

वे ऐसा अपनी पुरानी छवि की बदौलत कर पाए। 30-35 साल से उन्हें लेबर पार्टी में हाशिये का नेता समझा जाता था। इस दौरान संसद में उन्होंने 400 से ज्यादा बार अपनी ही पार्टी के खिलाफ मतदान किया। जिन बातों पर माना जाता था कि ब्रिटेन में आम-सहमति है, उन पर वे अपने विवेक के मुताबिक रुख लेते थे। इसमें अनियंत्रित भूमंडलीकरण तथा देश के परमाणु हथियारों के विरोध से लेकर फिलस्तीनी गुट हमास के समर्थन जैसे रुख भी शामिल हैं। ऐसे रुख से देश में अलोकप्रिय होने का जोखिम था। लेकिन कॉर्बिन ये जोखिम उठाते रहे। बहरहाल, सादगी, मिलनसार स्वभाव और आम लोगों के लिए हमेशा सुलभ रहना उनके ऐसे गुण हैं, जिसकी वजह से लगातार सांसद बने रहे। उनके इन गुणों ने लोगों के दिमाग में उनके ‘प्रामाणिक’ होने की छवि बनाई। यानी उन्हें ऐसा नेता समझा जाता है, जो सियासी जरूरतों से अपने रुख नहीं तय करता। वह वो बातें कहता है, जिसमें उसकी आस्था है। 

इस छवि ने लेबर पार्टी के जमे-जमाए नेताओं, मीडिया और जनमत सर्वेक्षण एजेंसियों- सबके अनुमानों को गलत साबित कर दिया। आम धारणा थी कि एक नेता– जो खुलकर वामपंथी एजेंडे पर चल रहा हो, जिसे खुद को कार्ल मार्क्स का प्रशंसक कहने में कोई हिचक नहीं होती हो, जो रेलवे और अन्य संसाधनों के राष्ट्रीयकरण की वकालत करता हो और शिक्षा एवं चिकित्सा सेवा को मुफ्त मुहैया कराना जिसका एजेंडा हो- वह आज के ब्रिटेन में मतदाताओं का समर्थन हासिल नहीं कर सकता। इसी भ्रम में ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरीजा मे ने समय से तीन साल पहले मध्यावधि चुनाव कराने का फैसला किया। यह जेरमी कॉर्बिन का ही करिश्मा है कि उन्होंने ज्यादा ताकतवर होकर लौटने और कंजरवेटिव पार्टी का एकछत्र नेता बनने की टेरीजा मे की इच्छा पर पानी फिर गया। कंजरवेटिव पार्टी ने अपना बहुमत गंवा दिया। दूसरी तरफ लेबर पार्टी ने अपनी सीटों और वोट प्रतिशत दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि की। 

इस घटनाक्रम ने अमेरिका में ये चर्चा छेड़ दी कि वहां का लेफ्ट जेरमी कॉर्बिन से क्या सीख सकता है। जबकि खुद कॉर्बिन की तुलना अमेरिका में एक परिघटना की तरह उभरे बर्नी सैंडर्स से की जाती है। सैंडर्स की भी सबसे बड़ी खूबी यही है कि उन्हें ‘प्रामाणिक’ माना जाता है। कहा जाता है कि इन दोनों नेताओं ने पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों की मुख्यधारा राजनीति में समाजवाद शब्द को पुनर्जीवित कर दिया है। शीत युद्ध के दौर में अमेरिका में समाजवाद शब्द को खासा बदनाम किया गया। लेकिन आज सैंडर्स खुद को खुलेआम लोकतांत्रिक समाजवादी कहते हैं। 

पिछले वर्ष राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी पाने के लिए उन्होंने अनूठा अभियान चलाया। उनका असर यह हुआ कि डेमोक्रेटिक पार्टी अपेक्षाकृत अधिक वामपंथी एजेंडा अपनाने पर मजबूर हुई। कॉर्बिन 68 साल के हैं और सैंडर्स 75 वर्ष के। लेकिन ये दोनों अपने-अपने देशों में नौजवानों के बीच आज संभवतः सबसे लोकप्रिय नेता हैं। इन दोनों की खूबी है कि वे राजनीति को जनता के बीच ले गए। ट्विटर और मास मीडिया की बढ़ती गई पकड़ के बीच उन्होंने लोगों के बीच जाने, उनसे सीधा संवाद करने और नव-उदारवाद के खिलाफ उनमें मौजूद जन-असंतोष को लेकर एक नया राजनीतिक कथानक पेश करने की कोशिश की है। 

सैंडर्स डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी हासिल नहीं कर सके। हिलेरी क्लिंटन उन पर भारी पड़ीं। राष्ट्रपति चुनाव में हिलेरी क्लिंटन को धुर दक्षिणपंथी डोनल्ड ट्रंप ने हरा दिया। जेरमी कॉर्बिन के नेतृत्व में लेबर पार्टी भी कंजरवेटिव पार्टी को परास्त नहीं कर पाई। इसके बावजूद इन दोनों नेताओं ने दुनिया का ध्यान खींचा है, तो इसलिए कि प्रगतिशील विचारधारा को राजनीति में फिर से प्रतिष्ठित करने में वे सफल हैं। ऐसा करते हुए उन्होंने अपनी और समाजवाद की प्रासंगिकता नए सिरे से स्थापित की है। पिछले दो वर्षों में वामपंथी पश्चिमी मीडिया में उनके एजेंडों पर गंभीर बहस हुई है। 21वीं सदी में समाजवाद का क्या स्वरूप होना चाहिए, इस पर विचारोत्तेजक चर्चा हुई है। इन सबसे एक नई आशा का संचार हुआ है। 

तो अहम सवाल है कि क्या भारत में ऐसा होने की कोई संभावना है? जैसाकि इस लेख के आरंभ में कहा गया, दक्षिणपंथी राजनीति में ऐसा हुआ। पार्टी तंत्र और पुराने नेताओँ को दरकिनार करते हुए नरेंद्र मोदी का उदय वैसे ही रूझान की झलक है। लेकिन क्या उदारवादी अथवा वामपंथी दायरे में वैसा होना संभव है? यह कहने का आधार है कि ऐसा होने की परिस्थितियां आज मौजूद हैं। दक्षिणपंथी और सांप्रदायिक शक्तियों के तीखे ध्रुवीकरण के खिलाफ उदारवादी-वामपंथी राजनीति का उभार स्वाभाविक घटना होगी। देश के नौजवानों की बेचैनी खुद जाहिर है। इस अनुमान का पुख्ता आधार है कि अगर भारतीय राजनीतिक दलों में नए नेता के उभार की गुंजाइश होती और उनमें से किसी में सैंडर्स या कॉर्बिन नेता उभरता- तो भारत में भी आशा की राजनीति का सूत्रपात हो सकता था।

 बहरहाल, अपने विपक्षी दलों के बीच ही देखें, तो वामपंथी दल अगर कम-से-कम 1990 या 2000 के दशक जैसी हालत में भी होते, तो उनसे ऐसे किसी विकल्प की धुरी बनने की आशा की जाती। लेकिन आज उनके सांगठनिक या वैचारिक पुनरुद्धार करने की संभावना क्षीण नज़र आती है। ऐसे में उग्र हिंदुत्व का राजनीतिक विकल्प देने की उम्मीद कांग्रेस पर ही जाकर टिकती है। बेशक वह ऐसा अकेले नहीं कर सकती। लेकिन वह ऐसे व्यापक गठबंधन की धुरी अवश्य बन सकती है।

लेकिन मूल समस्या यह है कि कांग्रेस में किसी सैंडर्स या कॉर्बिन तो दूर, नरेंद्र मोदी के पैटर्न पर किसी नए नेता का उभार भी संभव नहीं है। ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि 2014 और उसके बाद अनेक राज्य विधानसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस ने अपने पुनरुद्धार की कोशिश की है। यह कोशिश ना नेता को स्तर पर हुई है, ना ही कार्यक्रम के स्तर पर। अमेरिका, विभिन्न यूरोपीय और अन्य लोकतांत्रिक देशों में जो रूझान है- यानी जिस तरह का ध्रुवीकरण मतदाताओं का हो रहा है, उससे भी कोई सीख कांग्रेस ने ली है, इसके संकेत नहीं हैं। उसने उन नव-उदारवाद आर्थिक नीतियों पर कोई पुनर्विचार नहीं किया है, जो उसने 1991 में अपनाईं। 

समाजवाद शब्द से तो पार्टी की एलर्जी कायम है। ये पार्टी आज भी यथास्थितिवाद और मध्यमार्ग पर चलते हुए जनादेश वापस पाने की उम्मीद में है। बल्कि उसे आशा यह है कि लोग नरेंद्र मोदी सरकार से आजीज आकर स्वतः उसे  सत्ता में ले आएंगे। जो स्थिति कांग्रेस की है, लगभग वही तमाम विपक्षी दलों की है। ये पार्टियां एक परिवार की मुट्ठी में बनी रहने को अभिशप्त दिखती हैं। नीति और कार्यक्रम के क्षेत्र में किसी अभिनव पहल के लिए वे तैयार नहीं हैं। 

विपक्षी दलों की अकेली रणनीति महागठबंधन बनाने की है। उनकी समझ है कि राजनीति आंकड़ों का खेल है। बंटे वोट एक जगह आएंगे तो विपक्ष भारतीय जनता पार्टी को हराने में सफल हो जाएगा। यह 1970 से 2000 के दशकों तक के अनुभव पर आधारित सोच है। जबकि मतदाता, उनकी आकांक्षाओं, प्रचार तकनीक आदि में बुनियादी बदलाव आ चुका है। बिहार में महागठबंधन का प्रयोग जरूर सफल रहा, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसा होगा, ऐसा कोई भी पूरे भरोसे से नहीं कह सकता- खासकर उस हालत में जब नेता के तौर पर एक तरफ विकल्प नरेंद्र मोदी होंगे, जबकि उनके मुकाबले विपक्ष सपने जगा पाने वाला कोई नेता पेश करने में विफल रहेगा। फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि मोदी के पास एक बार फिर अकूत संसाधन होंगे, उनकी पार्टी बांटने वाले एजेंडे को लेकर मैदान में उतरेगी और भाजपा के सहमना संगठन खुलेआम नफरत फैला कर मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की कोशिश करेंगे। 

अनेक देशों के हाल के तजुर्बे के आधार पर कहा जा सकता है कि ऐसी राजनीति का मुकाबला दो-टूक कार्यक्रम लेकर चलने वाला कोई “प्रामाणिक नेतृत्व” ही कर सकता है। इसके बिना अगर आंकड़ों के गणित से भाजपा को हरा दिया जाए, तब भी उससे कोई ऐसी राजनीति नहीं निकलती, जो न्याय, समता, प्रगति और सामाजिक सौहार्द पर आधारित व्यवस्था की तरफ देश को ले जा सके। जब तक इस दिशा में बढ़ने की आस नहीं जगती, देश के मतदाताओं- खासकर नौजवानों में वैसा उत्साह नहीं जगेगा, जिससे जेरमी कॉर्बिन जैसा चमत्कार हो सके। कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों का जैसा चरित्र बन गया है, उसके बीच उनमें जमीन से नेता उभरने की कोई आशा फिलहाल नहीं रखी जा सकती। लेकिन कार्यक्रम के स्तर पर वे जरूर पहल कर सकते हैं। अगर वे वैश्विक अनुभवों से सीख लें, तो उन्हें नव-उदारवाद को अलविदा कहना चाहिए। जेरमी कॉर्बिन ने ‘For the many, not the few’ शीर्षक से अपना जो घोषणापत्र बनाया, उसमें काफी सीखने के लिए है, बशर्ते हमारे विपक्षी नेता इसका साहस दिखाएं। 

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