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सुल्तानियत ही रहेगी कांग्रेस में!

राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
लोकसभा चुनाव के पूर्व से राहुल गांधी को कांग्रेस की बागडोर सौंपने का कोरस करते रहने वाले जयराम रमेश को अब इतनी निराशा हो गई है कि उन्होंने यहां तक कह डाला कि कांग्रेस की ‘‘सल्तनत चली गई लेकिन सुल्तानियत नहीं गई’’। उधर गुजरात से अहमद पटेल का राज्यसभा के लिए चुना जाना पार्टी के पुनुरूत्थान की दिशा में एक कदम माना जाने लगा है। 
रमेश की सुल्तानियत की अभिव्यक्ति और पटेल के चुनाव जीतने की बात एक ही दिन में सामने आई है। रमेश के कथन का निहितार्थ समझने से पूर्व अहमद पटेल के निर्वाचन के प्रभाव को सम्भालने से आगे की चर्चा को समझने में सहूलियत होगी। यदि तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाय से अहमद पटेल का चुना जाना ठीक उसी प्रकार है जैसे उत्तराखंड में हरीश रावत का विश्वास जीतना। दोनों ही मामले कांग्रेस में विद्रोह और भाजपा द्वारा लाभ उठाने की ललक के रूप में सामने आए हैं। 
गुजरात के दो विधायकों का वोट निर्वाचन आयोग द्वारा अवैध करार देने से पटेल जीते और उत्तराखंड विधानसभाध्यक्ष द्वारा आठ कांग्रेसी विधायकों की सदस्यता रद्द किए जाने पर उच्च न्यायालय से हरीश रावत को सफलता मिली। दोनों ही मामलों में भारतीय जनता पार्टी को ‘‘मुंह की खानी’’ पड़ी थी तो क्या अगले कुछ महीने में होने वाले गुजरात विधानसभा के चुनाव परिणाम भी उसी प्रकार होंगे, जैसे उत्तराखंड के हुए है?
गुजरात और उत्तराखंड दोनों राज्यों के कांग्रेसियों की एक ही शिकायत रही है। और वह यह कि राहुल गांधी ने उनकी नहीं सुनी। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से तो उन्होंने मिलना तक स्वीकार नहीं किया। असम कांग्रेस के स्तंभ बिस्वा शर्मा ने तो कांग्रेस छोड़ने का कारण बात की सुनने के बजाय उनकी मौजूदगी में राहुल गांधी का कुत्ते से खेलते रहना बताया। गुजरात के शंकर सिंह वघेला ने अनसुनी का आरोप राहुल गांधी पर ही लगाया और उत्तराखंड में उन्होंने हरीश रावत की ही सुनी जिनके नेतृत्व में कांग्रेस की जैसी शर्मनाक पराजय हुई, उसकी तुलना मनमोहन सिंह की दो कार्यकाल की सत्ता के बाद लोकसभा में मात्र 44 सदस्य जीत पाने की उपलब्धि से हो सकती है। 
उत्तराखंड, असम, गुजरात ही नहीं अन्य किसी भी राज्य में कांग्रेस की स्थिति की समीक्षा करने से स्पष्ट होता है कि राहुल गांधी किसी न किसी रूप में उसके लिए जिम्मेदार हुए हैं लेकिन प्रत्येक निर्वाचन में मतदान प्रक्रिया पूरी होते ही ‘‘हार के लिए राहुल जिम्मेदार नहीं’’ का कीर्तन शुरू हो जाता है। तो क्या जयराम रमेश और उनके समान ही जो सल्तनत जाने के लिए सुल्तानियत को कारण मानते हैं, अभी भी कांग्रेस का उद्धार राहुल गांधी की अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी में निहित देख रहे हैं?
 रमेश जयराम ने सल्तनत जाने के लिए जिस सुल्तानियत को कारण माना है, वैसी ही धारणा अधिकांश कांग्रेसयों की भी है लेकिन उनमें अभिव्यक्ति करने का साहस नहीं है। एक पुराने कांग्रेसी ने तो यहां तक कह डाला कि कांग्रेसमुक्त भारत के लिए नरेंद्र मोदी, अमित शाह को कुछ करने की जरूरत नहीं है, सोनिया गांधी और राहुल गांधी बाखूबी उसको अंजाम दे रहे हैं। कांग्रेस का अस्तित्व कायम रखने के लिए सोनिया गांधी की प्राथमिकता अब सम्भवतः न तो राहुल गांधी को दायित्व सौंपने की मंशा है और न प्रियंका गांधी को मैदान में उतारने की है। वे कांग्रेस की औकात बचाए रखने के लिए विपक्षी दलों को नेतृत्व प्रदान करने की संभावना पर ही अधिक काम करती दिख रही है।  
कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी का यह 22वां साल है। यह भी एक मिसाल है। कोई और व्यक्ति इतने दिनों तक किसी राजनीतिक संगठन का चाहे वह किसी जनपद में सीमित क्यों न हो, सर्वेसर्वा नहीं रहा है। उनका राजीव गांधी से विवाह हुए आधे सदी से अधिक वक्त हो गया। इतने वर्षों में उन्होंने सत्ता में लगातार दस वर्ष बने रहने का रिकार्ड भी कायम किया है, लेकिन जिस देश में सबसे पुराने संगठन की बागडोर इतने अर्से से उनके हाथ में है, वे उसकी भाषा तक नहीं सीख सकीं। रोमन में अन्यों द्वारा लिखे भाषण को पढ़ने का उनका अभ्यास बना हुआ है। वे भारत के अवाम से कभी तादात्म नहीं बैठा सकती क्योंकि उन पर सुल्तानियत का अहंकार हावी है। 
यह अहंकार उत्तराधिकार में उनके बेटे ने भी पाया है जो अपने प्रधानमंत्री को ‘नानसेंस’ कहने में संकोच नहीं करते ओर किसी पीड़ित के साथ फोटो सेशन करने के बाद विश्व के किस देश में कहां चले जाते हैं, इसका पता उनके प्रधानमंत्री को भी नहीं रहता और वे उन्हें जन्मदिन की बधाई देने के लिए उनके (राहुल) फोन आने का इंतजार करते रहते हैं। राहुल गांधी को अपने कुल के त्याग पर भरोसा है और उसी के सहारे वे पार उतरना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने अपने आसपास जो चौकड़ी इकट्ठा की है वह भी कुलवादी ही हैं उनके लुप्त आचरण में समानता है। 
सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द अभी भी कुछ ‘‘भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य’’ आदि हैं जो दुर्योधन की अनीति पर हाय-हाय तो जरूर करते हैं लेकिन नमकख्वार बने रहने की विवशता से बिधे हुए हैं। लोकसभा चुनाव के बाद पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटोनी ने जो समीक्षा प्रस्तुत की थी उसके अनुसार अल्पसंख्यकवाद की पराकाष्ठा ने कांग्रेस को आम जनों से दूर कर दिया है। जिन राजनीतिक संगठनों का यह आंकलन था कि हिन्दू समाज जातियों में सर्वथा बंटा रहेगा, मुसलमानों को अपने साथ जोड़ कर सफलता प्राप्ति की जा सकती है, उनके ही आचरण ने हिन्दू एकजुटता को देशहित के लिए मानसिकता प्रदान की है। कांग्रेस ही नहीं अन्य संगठन भी जेसे सपा और बसपा जिन्होंने इस अवधारणा का अतिरेक कर दिया था, राजनीति में हाशिये पर चले गए हैं। हकीकत में इन्होने मुसलमानों का भी भला नहीं किया। 
जयराम रमेश और दिग्विजय सिंह उन कांग्रेसियों में आगे रहे हैं जो राहुल गांधी को संपूर्ण कमान सौंपने की वकालत करते रहे हैं। रमेश की सल्तनत की बरबादी के लिए कांग्रेस की सुल्तानियत ही जिम्मेवार है, यह समझ में सभी आ गया है। तभी दिग्विजय सिंह को सोनिया गांधी ने सभी दायित्व से जैसे मुक्त किया है वह समझ आता है।  लेकिन क्या इससे सुल्तानियत भी बची रह सकेगी, क्योंकि जहां तक सुल्तानियत का सवाल है वह तो अंतिम मुगल बादशाह के लिए प्रचलित मुहाविरे षशाह आलम, लाल किले से पाटनम अनुरूप सिमट चुकी है। 
विपक्षी एकता के लिए 12 अगस्त को उनके द्वारा बुलाई गई बैठक में राहुल गांधी को दूर रखा गया। इससे एक सप्ताह पूर्व कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक भी बिना उनकी मौजूदगी के हुई। गुजरात ‘‘संकट’’ को सुलझाने में भी उनकी कोई भूमिका नहीं रहा। क्यों? क्योंकि लोकसभा के बजट सत्र के दौरान राहुल के बढ़-चढ़कर भूमिका निभाने की कोशिश के कारण भाजपा की घोर विरोधी तृणमूल कांग्रेस से भी किनारा कर लिया था। इसलिए वर्षाकालीन संसद सत्र में राहुल गांधी की कोई भूमिका नजर नहीं आयी। 
बहरहाल सवाल है कि क्या सोनिया गांधी विपक्षी दलों की जुटान की नेता बन पायेंगी? लालू प्रसाद यादव तो यही चाहते हैं। इस जुटान के नाम पर जिन 16 दलों के साथ होने की बात की जा रही है उनमें टीएमसी को छोड़ कर किसी अन्य दल की अपने ही राज्य में डीएमके को छोड़कर कोई औकात नहीं है। वामपंथी दलों के साथ ये कागजी दल भी सोनिया गांधी का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं, इसका संकेत ममता बनर्जी द्वारा एक साक्षात्कार में की गई इस अभिव्यक्ति से स्पष्ट है कि विपक्षी दलों के लिए किसी नेतृत्व की आवश्यकता नहीं है। एक संयोजक चाहिए जो बैठकें आयोजित कर सके। 
विपक्षी एकता का अभियान नरेंद्र मोदी की राह रोक पाये इसका विश्वास किसी भी दल को नहीं है। वे केवल अस्तित्व बचाने के लिए एक मंच पर आ जाते हैं और अस्तित्व के दूसरे अवसर की तलाश में रहते हैं जैसा नितीष कुमार ने किया है और शरद पवार उसी रास्ते पर चलने का संकेत दे रहे हैं। इसलिए निरंतर क्षीण होती जा रही कांग्रेस के अस्तित्व के लिए विपक्षी एकता की पहल गारंटी के बजाय उसके मुख्य धारा से लुप्त होने के रूप में अधिक योगदान करने वाला साबित होगा। जैसा राज्यों में क्षेत्रीय दलों का पिछलग्गू बनते बनते वह अपने सबसे प्रभावी हिन्दीभाषी क्षेत्रों में हो चुकी है। 
कांग्रेस के भीतर घुटन है। सोनिया गांधी के 22 वर्षों के नेतृत्व ने उसमें जो दासत्व भावना पैठी है उसका लाभ कुछ नामधारी विशेष कर अदालतों में पैरवी कर सकने वाले लोग भले उठा रहे हों, आम कांग्रेसी क्षुब्ध है। दूसरे घरों की तलाश में उनकी बेचैनी कई राज्यों में विद्रोह के रूप में प्रगट हो चुकी है। बचे राज्यों में भी ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं। कांग्रेस के निरंतर पतन से दुखी कुछ बुद्धिजीवी समझे जाने वाले लोगों ने भी अब मोदी सरकार का महज विरोध और संसद को हंगामे की भेंट चढ़ाते रहने से हो रही हानि के लिए सोनिया गांधी को सचेत करना शुरू कर दिया है। 
कांग्रेस को नकारात्मकता और सुल्तानियत की मनोभावना से न हटने वाले नेतृत्व से जो हानि हो रही है उसकी भरपाई चलते फिरते इलाज से नहीं हो सकती। मेजर सर्जरी की जरूरत होगी। लेकिन सुल्तानियत की अभ्यस्त हो गई कांग्रेस में ऐसा हो सकेगा उसकी उम्मीद कम है। क्योंकि सोनिया राहुल का कीर्तन करने वाले पार्टी पर पूरी तरह हावी है। इसलिए सुल्तानियत की प्राथमिकता बनी रहेगी और सल्तनत जाती रहेगी।

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