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होड़ पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने की

सबको चुनाव लड़ने का अधिकार मिलने का यह नतीजा है कि लोकसभा का चुनाव हो या विधानसभा का, बिना किसी विचारधारा या उद्देश्य के, ढेरों उम्मीदवार उठ खड़े होते हैं। रही राजनीतिक पार्टियों की बात तो इतनी भरमार किसी अन्य देश में तो क्या पूरी दुनिया में नहीं है। आज भारत में 1900 से ज्यादा पार्टियां हैं। इनमें से चार सौ से ज्यादा पार्टियां तो ऐसी हैं जिन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा। निर्दलियों और पार्टियों की भरमार चुनाव व्यवस्था को और उलझा रही हैं। निर्दलीय उम्मीदवारों की बात करें तो 1952 से 2004 तक के चौदह आम चुनाव में 37 हजार 440 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा। इनमें से एक फीसद से भी कम 214 ही चुनाव जीत पाए। 36 हजार 573 की जमानत जब्त हो गई। 

2004 में 2385 निर्दलीय उम्मीदवारों में से पांच ही जीत पाए। तब 38 करोड़ 97 लाख 79 हजार 784 मतदाताओं ने वोट डाले थे। इनमें से निर्दलियों को कुल 4.25 फीसद वोट मिले और 2385 निर्दलीय उम्मीदवारों में से 2370 की जमानत तक जब्त हो गई थी। 2009 में 3831 निर्दलीय उम्मीदवारों में से नौ ही लोकसभा पहुंच पाए। इनमें से 3806 की जमानत तक नहीं बच पाई। 2009 में 71 करोड़ 69 लाख 85 हजार 101 मतदाताओं में से 41 करोड़ 71 लाख 59 हजार 281 ने वोट डाले और इनमें से निर्दलीय उम्मीदवारों के हिस्से में करीब चार फीसद ही वोट आए। मतलब साफ है कि निर्दलीय उम्मीदवारों की राजनीतिक पटल पर कोई निर्णायक भूमिका नहीं बन पाई है। सैकड़ों निर्दलीय उम्मीदवार को कुल सौ वोट पाने को तरस गए। 96-97 फीसद निर्दलीय उम्मीदवारों की जमानत जब्त होना उनके चुनाव लड़ने के औचित्य पर सवाल खड़ा करता है। निर्दलीय चुनाव लड़कर जो नेता लोकसभा तक पहुंचने में सफल हो पाए हैं, वे लगभग सभी ऐसे नेता रहे जिनकी क्षेत्र विशेष में अपार लोकप्रियता रही है या जिन्होंने राष्ट्रीय अथवा राज्य स्तर की पार्टियों से अलग होकर चुनाव लड़ा। 

इसे देखते हुए क्या यह सही नहीं होगा कि निर्दलीय के चुनाव लड़ने की व्यवस्था ही खत्म कर दी जाए। इस पर बहस भी छिड़ती रही है। भले ही संविधान ने हर व्यक्ति को चुनाव लड़ने का अधिकार दे रखा हो लेकिन इसकी व्यावहारिकता क्या रह गई है, इस पर क्या विचार किया जाना चाहिए। पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों की भरमार ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को बिगाड़ा तो है ही। वे मत विभाजन कर निर्वाचन की सार्थकता को ही खत्म कर देते हैं। आंकड़े गवाह है कि ज्यादातर विजयी उम्मीदवार कुल मतदान का 35 से 40 फीसद ही बटोर पाते हैं। सीधा मतलब यह हुआ कि जीते। 80 फीसद सांसद या विधायक औसत बहुमत की सीमा पार नहीं कर पाते। 

मामला सिर्फ निर्दलीय उम्मीदवारों तक ही सीमित नहीं है। छोटी-छोटी पार्टियों की चुनावी प्रक्रिया में नगण्य हिस्सेदारी भी सवाल उठाती रही है। चुनाव आयोग भी गैर मान्यता प्राप्त दलों की बढ़ती हुई संख्या से होने वाली परेशानी का हवाला देते हुए इन पर अंकुश लगाने का सुझाव दे चुका है। चुनाव आयोग ने अपने स्तर पर इस दिशा में पहल भी की है। आयोग का मानना है कि अज्ञात स्रोतों से मिले कालेधन को खपाने के लिए पार्टियां बनाई जाती है। पार्टियों को चंदे या दान के रूप में मिलने वाली रकम पर कर छूट का लालच ज्यादा होता है। 

चुनाव आयोग में ऐसी सैकड़ों पार्टियां पंजीकृत हैं जो गैर मान्यता प्राप्त दलों की श्रेणी में आती हैं। लेकिन ये सभी चुनाव मैदान में नहीं उतरते। इस तरह के ज्यादातर पार्टियां छुटभैए नेताओं ने किसी बड़ी पार्टी से टूट कर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पालने-पोसने, अपनी कुंठा पर मरहम लगाने और राजनीति में आड़े-तरछे सामाजिक व धार्मिक विचार परोसने अथवा आर्थिक लाभ उठाने के लिए बनाई हैं। इस तरह की पार्टियों के नाम से ही इसका आभास हो जाता है। 48 पार्टियां तो अखिल नाम से शुरू होती हैं और इनमें 40 अखिल भारतीय हैं। 

भारत, भारतीय या भारती के नाम से शुरू होने वाली 120 पार्टियां हैं तो राष्ट्रीय या राष्ट्रवादी से शुरू होने वाली 147 पार्टियां हैं। इसी तरह अंबेडकर, दलित, हिंदुस्तान किसान आदि शब्दों से शुरू होने वाली भी कई-कई पार्टियां है। कुछ पार्टियों का उद्देश्य भले ही आम लोगों की भावनाओं को आवाज देना रहा हो। राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय दलों से मोहभंग हुए लोगों को सीमित ही सही, लेकिन प्रतिनिधित्व देने की मंशा भी इसमें छिपी हो सकती है। लेकिन ज्यादातर मामलों में ऐसे दल बनाना बैठे ठाले का शिगूफा ही लगता है। अन्नदाता पार्टी, आदिम भारतीय दल, जनरल समाज पार्टी, ‘अखिल भारतीय भारत माता-पुत्र पक्ष’, भारतीय मोहब्बत पार्टी, ज्वाला दल, टोला पार्टी जैसे नाम तो यही संकेत देते हैं।

ऐसे में क्या गैर मान्यता प्राप्त पार्टियों पर प्रतिबंध लगाना सही नहीं होगा। चुनाव आयोग ने अब ऐसी हर पार्टी पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। चुनाव नहीं लड़तीं। ऐसी पार्टियों को पंजीकृत किए रखने की आखिर क्या औचित्य है? उनकी उपस्थिति को राजनीति या लोकतंत्र की बीमारी माना जाए या हर व्यक्ति तक चुनाव में हिस्सेदारी लेने की संवैधानिक शक्ति देने की अनिवार्यता। अगर गैर मान्यता प्राप्त पार्टियों की कोई उपयोगिता नहीं है तो उनकी संख्या कम करने और उनके लिए अलग से नियम बनाने की क्या जरूरत नहीं है?
 

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