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इस सब से भाजपा को लाभ!

राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
भारतीय जनता पार्टी को जनता की निगाहों में गिराने के लिए जिन उपायों को कांग्रेस और सेक्युलरिज्म के नाम पर सक्रिय परोपजीवी संस्थाऔं व व्यक्तियों ने अपनाया है उनसे उलटे भाजपा का जनाधार बढ़ रहा है। गांवों में एक कहावत है ‘पीठ पीछे की झींक और ससुराल की गाली शुभ होती है’। सभ्यता की सभी सीमाएं लांघकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रवादी शक्तियों को साम्प्रदायिक साबित करने के लिए एक के बाद एक चलाये जा रहे अभियान का भाजपा के पक्ष में ही परिणाम हो रहा है जिसकी अभिव्यक्ति उक्त कहावत में निहित है। 

नरेंद्र मोदी के खिलाफ गुजरात में मौत के सौदागर के रूप में सोनिया गांधी ने जो अभियान शुरू किया था, उसके परिणाम सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं रहा। 2014 के लोकसभा निर्वाचन और बाद के राज्य विधानसभा चुनाव परिणामों से यह साबित होता गया कि घृणात्मक और कुत्सित अभिव्यक्ति से किसी व्यक्तित्व या संगठन को घेरने के प्रयास का परिणाम क्या होता है? विशेषकर यह अभियान जब उन लोगों द्वारा चलाया जा रहा हो जो सत्ता का निजी सम्पन्नता के लिए उपयोग को बढ़ाए गए भ्रष्टाचार के कारण अदालत में हाजिरी दे रहे हो। 

2002 में सोनिया गांधी के मौत का सौदागर की बात कहे जाने से लेकर गौरी लंकेश की हत्या के बाद की अभिव्यक्तियों को परवान चढ़ाते हुए अपनी कुत्सित अभिव्यक्तियों के लिए ‘‘सर्वश्रेष्ठ’’बने रहने वाले दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जिस शब्दावली को अपनाया है वह मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से विक्षिप्त हो कर अपना ही ताल थोपने वाली हरकत भले हो किंतु भाजपा के लिए वह शुभ ही साबित हो रही है। 

देश भर में उठा यह सवाल कि गौरी हत्या के पांच मिनट के अंदर ही राहुल गांधी सहित परोपजीवी बुद्धिजीवीयों को कैसे पता चल गया कि यह कुकृत्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की विचारधारा के प्रभाव में कारण हुआ है?  यह पहला ‘‘इल्हाम’’ नहीं है। जिस मुंबई हत्याकांड में एक पाकिस्तानी पकड़ा गया और उसे फांसी हुई सा अंजाम देने का आरोप संघ पर लगा कर दिग्विजय सिंह अपने इल्हाम की हकीकत पहले ही बयां कर चुके हैं। इसलिए यदि पहले की भांति अब कांग्रेस उनकी निजी अभिव्यक्ति से बचाव के बजाय उनके स्पष्टीकरण के बाद कुछ नहीं कहना है पर आ गई है तो कल वह ऐसी अभिव्यक्ति करने वालों को ‘‘नेहरू गांधी’’ शील्ड भी प्रदान कर सकती है। गौरी की हत्या के बाद जिन लोगों ने हत्या के कारणों और हत्यारों के बारे में जानकारी का दावा किए हैं, विशेष जांच दल को चाहिए कि उनसे ही दांवे को सत्यापित करने के लिए पूछताछ करें। कांग्रेस अपनी घृणात्मक अभिव्यक्ति से सत्तर साल तक की हैसियत खो कर मान्यता प्राप्त विपक्षी दल की हैसियत खो चुकने के बाद राज्यों में शून्यता की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही है। अपना अस्तित्व बचाने के लिए वह उन लोगों के गठबंधन की पिछलग्गू हिस्सा बनती जा रही है जिसके नेता भ्रष्टाचार में जेल हो आए हैं और जो जाने के लिए अदालत में बचाव के हर संभव दांवपेंच में माहिर लोगों का सहारा ले रहे हैं। 
उत्तरप्रदेश के बाद अब बिहार में उसकी शून्यता की स्थिति उभर रही है, जिन राज्यों में उसका शासन है वहां या तो उसके नेतृत्व को उलझने की औकात नहीं दिखाई पड़ती। 

जिस महागठबंधन से भाजपा के प्रसार को रोकने की कवायद की जा रही है, उसके शीर्ष पर भ्रष्टाचार के आरोप में अदालती कार्यवाही में लिप्त संगठन को परिवार का दास मानकर आचरण कर रहे हैं। कांग्रेस के लिए दोनों प्रकार के ऐसे लोगों का साथ पकड़ना स्वाभाविक है, क्योंकि उसका अपना संगठन कुछ वैसा ही पहले से चल रहा है, जैसा लालू यादव का है। स्वयं और परिवार के लोग तथा सगे सम्बन्धी सभी कानूनी घेरे में आ गये हैं। जब ऐसे लोगों की हरकतें उसके अपने सुशासन के कार्य से ज्यादा भाजपा के पक्ष में जनमत बना रहे हैं, तो भाजपा और संघ को उनका संज्ञान लेकर उलझने की क्या जरूरत है? 
कांग्रेस के नेताओं और परोपजीवी संगठनों के छाती पीट कर किया जा रहा खिझाया में उलझने के बजाय सबका साथ और सबका विकास के उस रास्ते पर बढ़ते जाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जिसमें इतने घेरेबंदी के बावजूद भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशनसनीयता में कोई छेद नहीं हो। 

प्रधानमंत्री ने विश्व में भारत की साख पैठाने का जो काम अपने प्रथम विदेश प्रवास और योग की अंतराष्ट्रीयता स्वीकृति के साथ किया था, वह डोकलम पर चीन की हठधर्मी के ढहते और ब्रिक्स में आतंकवाद पर भारतीयता के अनुकूल चीन के भी हो जाने से और भी सुदृढ़ हुई है। भारत जिसकी अड़ोस पड़ोस भी चिंता नहीं करते थे, मोदी ने उसे न केवल, एशिया की सबसे मजबूत ताकत का स्वरूप प्रदान किया अपितु विश्व में भारत के रूख की समीक्षा का पैमाना भी बदलने का काम किया है। राज्य की सत्ता चाहे कांग्रेसी के हाथ में हो सीपीएम की हो या ममता बनर्जी की, वहां होने वाले अपराधों की जिम्मेदारी ‘‘भाजपा’’ की है, ऐसा अभियान लगातार चलाया जाता है, जैसा गौरी लंकेश के मसले में रहा है। कुछ ही महीने में कर्नाटक में संघ और भाजपा के दो दर्जन से अधिक कार्यकर्ताओं की हत्या, या केरल में और बंगाल में उनकी हत्याओं के चल रहे दौर की अनदेखी कर ट्रेन में बैठने के लिए सीट के झगड़े को गऊभक्तों की गुंडागर्दी के रूप में उभारने का न तो पहला प्रयास था और न गौरी की हत्या के लिए संघ भाजपा को दोषी ठहराने का अभियान ही। 

और तो और अभी कुछ ही दिन पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारत सरकार से यह जानना चाहा है कि दिल्ली की शाही जामा मस्जिद का मालिकाना हक 2004 में मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री की हैसियत से किस कानून के अंतर्गत दिया? ऐसा हक देने का औचित्य क्या है? यह सवाल अदालत ने एक मुसलमान द्वारा 2005 में मनमोहन सिंह के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका के संदर्भ में पूछा है। जामा मस्जिद धरोहर का दर्जा प्राप्त है। ऐसी सभी धरोहर के रखरखाव का दायित्व और स्वामित्व भी पुरातत्व विभाग का होता है। जामा मस्जिद की रख रखाव तो पुरातत्व विभाग ही करता है लेकिन मालिकाना हक एक इमाम के परिवार को मिला हुआ है जो प्रत्येक वर्ष होने वाली करोड़ों की आमदनी का लुफ्त उठा रहा है। उस पर उस वक्फ बोर्ड का भी नियंत्रण नहीं है जो इमाम नियुक्त करता है। 

अदालत की केंद्रीय सरकार से पूछताछ का प्रकरण सामने आते ही शोर मच गया, कहा गया कि भाजपा मस्जिद पर कब्जा करना चाहती है। नरेंद्र मोदी और भाजपा को मुस्लिम विरोधी साबित करने के अभियान की ही एक कड़ी है। इसी कड़ी में म्यांमार से विस्थापित रोहिंग्या मुसलमानों के भारत में शरण देने के लिए प्रदर्शन और अभियान शुरू हो गया है। यह अभियान वे चला रहे हैं जो अपने देश में विस्थापित का जीवन बिता रहे पांच लाख कश्मीरी पंडितों के पक्ष में मुंह खेालने से परहेज बनाए हुए हैं। इन और ऐसे सभी उन अभियानों को जो देश को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं न केवल नकारने बल्कि उनको सही परिपेक्ष में देखने का भारतीय जनमानस का आकार बढ़ता जाना, भविष्य के लिए शुभ लक्षण है।

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