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कब तक तरसेगा बचपन?

श्रीशचंद्र मिश्र
मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट में भारत में बच्चों की दयनीय स्थिति समय-समय पर उजागर होती रही है। यह सबसे बड़ी सामाजिक विडंबना है और राजनीतिक उदासीनता भी कि बचपन की दहलीज पर खड़ी एक चौथाई से ज्यादा आबादी न पूरी तरह शिक्षित है। न कुपोषण से मुक्त है और ऊपर से पारिवारिक विषमताओं का शिकार हो रही है। हर साल एक परंपरा की तरह बाल दिवस मनाया जाता है लेकिन साल दर साल बचपन को हंसता खेलता माहौल मिलने की बजाए त्रासदी और यातना मिलने का अनुपात बढ़ता जा रहा है। 

कानून तमाम बने हुए हैं। व्यवस्था सुधारने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक कड़े निर्देश दे चुकी है पर स्थिति भयावह होती जा रही है। आजादी के 70 साल बाद तक बाल श्रम की जंजीर बचपन के गले में फंसी हुई है। संसद में मानसून अधिवेशन में चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन) एमेंडमेंट एक्ट पास हो जाने के बाद भी बाल मजदूरों की समस्या दूर करने के लिए काम करने वाले कई गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) ने 1986 के पिछले कानून में संशोधन को फिजूल बताया है। 

सरकार का तर्क है कि संशोधित कानून पिछले कानून से काफी बेहतर है और नया कानून बना कर सरकार ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के प्रस्ताव 138 व 182 का अनुमोदन करा दिया है। संशोधित कानून में व्यवस्था है कि 14 साल तक के किसी बच्चे से रोजगार नहीं कराया जा सकता। लेकिन इसी कानून में इस उम्र तक के बच्चों को अपने पारिवारिक उद्योगों में काम करने पर रोक का कोई प्रावधान नहीं है। संशोधित कानून की आलोचना इसी मुद्दे पर हो रही है। सरकार का मानना है कि स्कूल के समय के बाद बच्चे अगर अपनी पढ़ाई का नुकसान किए बिना पारिवारिक उद्योग में हाथ बंटाते हैं तो इसमें हर्ज क्या है? लेकिन बाल मजदूरों के लिए संघर्ष करने वाले संगठन चाहते हैं कि ऐसा व्यस्थित निगरानी तंत्र बनाया जाए जो खतरनाक उद्योगों की पहचान कर बचपन को उससे दूर रखे। उनका सुझाव यह भी है कि पारिवारिक उद्यमों के नाम पर भी किसी को बाल मजदूरी कराने की इजाजत न दी  जाए। 

समस्या सिर्फ बाल मजदूरी की ही नहीं है। बदलती परिस्थितियों में आज बच्चे ज्यादा असुरक्षित हो गए हैं। नीतियों और उनके क्रियान्वयन में असंतुलन ने न बच्चों को बाल मजदूरी के अभिशाप से मुक्ति दिलाई है और न ही सभी बच्चों के लिए स्कूल के दरवाजे खोले हैं। उपेक्षा, आर्थिक तंगी और दिशाहीनता तो कम उम्र में बच्चों को अपराध की तरफ धकेल ही रही है, बचपन भी अपराध का निशाना बन रहा है। यह स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। आंकड़ों की बात करें तो इस बात पर संतोष जताया जा सकता है कि 1998-99 में देश में पांच से 14 साल की उम्र के जो एक करोड़ 26 लाख बाल मजदूर थे, उनकी संख्या 2009-10 में घट कर 49 लाख 80 हजार रह गई। उपयुक्त कानून इस संख्या को और कम करने के लिए बनना चाहिए लेकिन जो संशोधित कानून बना है वह चोर रास्ते से बाल मजदूरों की संख्या बढ़ाएगा ही पारिवारिक उद्यमों में ईंट के भट्टे, कांच की चूड़ियां और बीड़ी बनाने के कारखाने आदि आते हैं। एक तरफ कानून है कि 18 साल में कम उम्र के व्यक्ति को तंबाकू उत्पाद बेचने पर पांच साल की सजा हो सकती है। संशोधित कानून दूसरी तरफ बच्चों को बीड़ी बनाने की इजाजत देता है। 1986 के कानून में 83 उद्योगों को बच्चों के लिए खतरनाक माना गया था। संशोधित कानून में उनकी संख्या तीन रह गई है। 

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