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घाटी के हाल, जवानों की मौतः कौन जिम्मेदार?

श्रीशचन्द्र मिश्र
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जम्मू-कश्मीर में पिछले करीब तीन दशक में सुरक्षा बलों को दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ पाकिस्तान की शह और अलगाववादियों के समर्थन से फलते-फूलते आतंकवाद का सामना करने का संकट है तो दूसरी तरफ संघर्ष विराम का उल्लंघन करने की ना ‘पाक’ करतूतों का जवाब देने की जिम्मेदारी है। विडंबना यह है कि दोनों ही मामलों में सुरक्षा बलों का हौसला बढ़ाने की कोई सामाजिक व बौद्धिक पहल नहीं हो रही है। 

जहां तक पहली चुनौती का सवाल है तो केंद्र और राज्य सरकार घाटी के लोगों को अलगाववादियों से अलग-थलग करने में नाकाम रही है लेकिन व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी सुरक्षा बलों पर थोप दी है। उसके हर कदम पर ‘जुल्म’ की मुनादी पीटने वाले मानवाधिकारवादियों की जमात तो है लेकिन जवानों के हित में कोई आवाज उठाने वाला नहीं है। पथराव से किसी जवान की मौत हो जाए या घात लगातर जवानों की हत्या कर दी जाए अथवा भीड़ किसी जवान को पीट-पीट कर मार डाले तो यह सामान्य घटना। और अगर उग्र व हिंसक भीड़ को काबू करने के लिए सुरक्षा बल कोई कार्रवाई करे या आतंकवादियों को मारे तो वह मानवाधिकार उल्लंघन। मई के शुरू में सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में पांच आतंकवादियों को मार कर बरहान गैंग का लगभग सफाया कर दिया। इस पर एक दो चैनलों ने प्रचारित कर दिया कि मारे गए बेचारे तो आम नागरिक थे। यह है मानसिकता के दिवालिएपन का सबूत। 

अभी एक रिपोर्ट आई है जिसमें कहा गया है कि 2017 में सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मरने वाले आम लोगों की संख्या 2016 के मुकाबले 166.66 फीसद बढ़ गई। रिपोर्ट गृह मंत्रालय ने जारी की है। इसके मुताबिक 2016 में 15 नागरिक सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे गए। 2017 में यह संख्या 40 हो गई। निश्चित तौर पर बेकसूर लोगों की मौत दुखद है। लेकिन इन बेकसूर लोगों में कितने ऐसे थे जो पथराव व आगजनी में शामिल थे अथवा उन्होंने आतंकवादियों को पनाह दे रखी थी। 2016 में सुरक्षा बलों ने 150 आतंकवादियों को और 2017 में 213 आतंकवादियों को मार गिराया। इसके लिए उनकी पीठ भले ही न थपथपाई जाए और ‘निर्दोष’ लोगों की मौत के लिए उन्हें लांछित किया जाए लेकिन मानवीय आधार पर इस बात पर तो चिंता जताई जानी चाहिए कि आतंकवादी वारदातों ने 2016 में 82 और 2017 में 80 सुरक्षाकर्मियों की भी जान गई। 1990 से 2017 तक आतंकवाद से जूझते हुए 5123 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए हैं। क्या उनके लिए किसी की संवेदना नहीं जागती। 

यह तो हुई आतंरिक मोर्चे की बात। पाकिस्तान की तरफ से नियमित तौर पर होने वाली गोलाबारी में पिछले डेढ़ दशक के दौरान हर महीने औसतन दस जवानों की मौत को भी सामान्य मान लिया गया है। राजनयिक स्तर पर विरोध की औपचारिकता निभाई जा रही है। जवान शहीद हो रहे हैं। उस पर दुख जताने की बजाए इस तरह की राजनीतिक टिप्पणी का सामने आना कि ‘सैनिक तो सीमा पर मरने के लिए ही जाते हैं’ बताता है कि सेना को लेकर किस तरह की मानसिकता पनपती जा रही है। पाकिस्तान को माकूल और करारा जवाब देने की रणनीति अपनाने की बजाए यथास्थिति को ही बनाए रखा जा रहा है। 

चार साल पहले पेशावर के सैनिक स्कूल में हुए आत्मघाती हमले के बाद संभावना बनी थी कि शायद पाकिस्तान समझ जाएगा कि आतंकवाद की दुधारी तलवार उसके लिए भी घातक है और भारत विरोधी आक्रामकता से मुक्ति में उसका ज्यादा लाभ है। लेकिन लगता नहीं पाकिस्तान की सरकार और सेना ने उस हादसे से कोई सबक सीखा। 2014 में साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने आए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने की जोरदार वकालत तो की। लेकिन उनके लौटने के बाद से पाक सेना लगातार युद्ध विराम का उल्लंघन कर गोलीबारी कर रही है। 

साफ है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा का बार-बार उल्लंघन कर पाकिस्तान ने साफ कर दिया है कि न उसे शांति में भरोसा है और न ही युद्ध विराम समझौते को वह खास अहमियत देता है। यह राजनीतिक कूटनीति है या सेना का छद्म युद्ध?

ऐसा नहीं है कि नियंत्रण रेखा को अशांत करने की पाकिस्तान की कोशिश कोई नई बात नहीं है। 2012 में नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम सौ बार से ज्यादा मौकों पर तोड़ा गया। 2013 में यह संख्या करीब तीन गुना बढ़ गई और सीमा पर तनातनी लगातार कायम रही। अप्रैल 2018 तक इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। दिखावे के तौर पर शांति की बात करना और नियंत्रण रेखा पर छेड़छाड़ करते रहना उन लोगों के लिए एक बार फिर आफत बन गया है जो सीमा क्षेत्र में रहते हैं। तेरह दिसंबर 2001 को संसद पर हमले के बाद 26 नवंबर 2003 को भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर युदद्ध विराम का समझौता हुआ। उस दिन ईद-उल-फितर का त्योहार था और इस समझौते को दोनों देशों के बीच एक दूसरे को ईदी (उपहार) देने के रूप में देखा गया। युद्ध विराम का यह समझौता दुनिया के सबसे ऊंचे रण क्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर के लिए भी प्रभावी था। शुरुआती सालों में यह समझौता खासा कारगर रहा। सीमा पर रहने वाले लोगों को आस बंधी कि इससे आए दिन उनकी जान पर मंडराता खतरा खत्म हो जाएगा। 

युद्धविराम की शुरुआती सफलता से उत्साहित होकर भारत और पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा को आवाजाही व   व्यापार के लिए खोल दिया। सात अप्रैल 2005 को ह्यकारवां-ए-अमनह्ण बस को झंड़ी दिखा कर रवाना करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे शांति की दिशा में भारत और पाकिस्तान का बड़ा कदम बताया और पूरे विश्वास से कहा कि शांति की यह प्रक्रिया रुक नहीं सकती। उसी साल जुलाई में प्रधानमंत्री ने इच्छा जताई कि नवंबर, 2003 से अमल में आने के बाद युद्ध विराम का कोई उल्लंघन न होने की वजह से सियाचिन को शांति पर्वत माना जाए। लेकिन शांति की इन कोशिशों में जल्दी ही दरार पड़ने लगी। 

आतंकवाद का सबसे ज्यादा शिकार होने और जम्मू-कश्मीर में हिंसक वारदातों के बढ़ने की वजह से 2005 में भारत ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तारबंदी का काम पूरा कर लिया। युद्ध विराम की वजह से यह काम योजना के मुताबिक पूरा कर लिया गया और सीमा पार से घुसपैठ रोकने की कारगर व्यवस्था कर ली गई। पाकिस्तान ने इसी दौरान अपने क्षेत्र की हदबंदी ऊंची कर दी और इन दीवारों के पीछे नए बंकर बनाने शुरू कर दिए। 

यह निश्चित रूप से इस बात का संकेत था कि पाकिस्तान किसी खुराफात की तैयारी कर रहा है। सेना और सीमा सुरक्षा बल ने अक्सर इस तरह की गतिविधियों पर अपनी आशंका जताई लेकिन उनकी बात पर यह कह कर गौर नहीं किया गया कि युद्धविराम होने की वजह से कोई कारर्वाई नहीं की जा सकती। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तारबंदी का काम पूरा होने से पहले जनवरी, 2005 में पाकिस्तान ने तोप के गोले दाग कर युद्ध विराम का उल्लंघन किया। एक हफ्ते में उसने ऐसा दो बार किया। लेकिन भारत ने इसे खास महत्व नहीं दिया और पाकिस्तान की इस सफाई को मान लिया कि वह काम किन्हीं अवांछित लोगों द्वारा किया हो सकता है। 

इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया कि आतंकवादी उच्च क्षमता के तोप के गोले इस्तेमाल नहीं करते। यह हमेशा समझ से परे की बात रही है कि हकीकत को नजरअंदाज कर भारतीय राजनीतिक मानसिकता पाकिस्तान को करारा सबक देने की बजाए उसकी तरफ दोस्ती का हाथ क्यों लहराती रही। भारत में आतंकवादी हमले होते रहे और उनमें पाक सेना व खुफिया एजंसी आईएसआई के शामिल होने की पुष्टि होती रही। पाक सेना भारतीय जवानों के सिर काट कर ले गई लेकिन सरकार का आत्मसम्मान नहीं जागा। सिर्फ औपचारिक विरोध जताकर मामले की लीपापोती कर दी गई। दोषी कोई एक पार्टी नहीं रही। 

अप्रैल 2003 में श्रीनगर की एक जनसभा में बोलते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए युद्ध विराम समझौते की नीव रखी थी। दोस्ती का यह प्रस्ताव ऐसे समय में दिया गया था जब ह्यआपरेशन पराक्रमह्ण के तहत सीमा पर तैनात की गई सेना को वापस बुला लिया गया था। ह्यआपरेशन पराक्रमह्ण पाकिस्तान पर यह दबाव डालने के लिए शुरू किया गया था कि वह आतंकवादियों को भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने से रोके। 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर हमले के बाद यह अभियान शुरू हुआ था जिसके तहत सीमा पर सेना का भारी जमावड़ा कर दिया गया था। 2003 में वाजपेयी ने दोस्ती के प्रस्ताव का यह कह कर समर्थन किया- ह्यहम दोस्त बदल सकते हैं लेकिन पड़ोसी को तो नहीं बदल सकते।ह्ण इसका एक राजनयिक व राजनीतिक तर्क भी दिया गया है। 

अमेरिका ने इराक में युद्ध छेड़ दिया है। ऐसे में अगर भारत व पाकिस्तान ने बेहतर रिश्ते कायम नहीं किए तो इस तरह की स्थिति इस क्षेत्र में भी पैदा होने का खतरा खड़ा हो सकता है।ह्ण संसद पर हमले के बाद अमेरिकी ने भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध की चेतावनी दी थी। तनाव कम करने के लिए अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने अपने उपमंत्री को बार बार नई दिल्ली व इस्लामाबाद भेजा। उनके प्रयास को ठेंगा दिखाते हुए जम्मू के पास कालूचक के सैन्य शिविर पर पाकिस्तान ने परोक्ष रूप से आत्मघाती हमला कराया जिसमें 38 सैनिक, उनकी पत्नियां व बच्चे मारे गए। युद्ध होना तय हो गया लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनयिक दखल से सेना शांति के समय की स्थिति में लौट गई। परदे के पीछे की गतिविधियां शुरू हुईं और यह महसूस किया गया कि पाकिस्तान के प्रति आक्रामक रुख बदलने की जरूरत है और इसका बेहतर तरीका यह है कि सीमा पर सेना का जमावड़ा घटाया जाए। 

सरकार बदली लेकिन स्थितियां नहीं। युद्ध विराम से दोनों पक्षों के आपसी रिश्तों पर  सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद भी पूरी नहीं हुई। जनवरी 2004 में पाकिस्तान ने घोषणा की कि वह अपने क्षेत्र से भारत के खिलाफ कोई आतंकवादी गतिविधि नहीं होने देगा। हालांकि इस घोषणा पर उसने कतई अमल नहीं किया जबकि मनमोहन सिंह ने बार बार पाकिस्तान को शांति के प्रति उसकी प्रतिबद्धता की याद दिलाई। सात जनवरी, 2013 को हुई वीभत्स घटना सिर्फ युद्ध विराम का उल्लंघन ही नहीं था, वह उससे भी ज्यादा था। पाक कब्जे वाले कश्मीर से पाक सैनिक आए, नियंत्रण रेखा पर पहुंचे और भारतीय सीमा में घुसने से पहले भारत की सैन्य गश्ती टुकड़ी को निशाना बनाया। उन्होंने दो भारतीय जवानों को मार डाला और एक का सिर काट लिया। दूसरे जवान का उन्होंने गला रेत दिया। 

इस घटना ने पाक सेना की क्रूरता को उजागर कर दिया। नियंत्रण रेखा के उल्लंघन का यह एक बड़ा मामला तो था ही। युद्ध विराम समझौते में सहमति बनी थी कि किसी भी तरफ की सेना सीमा नहीं तोड़ेगी। पाक सेना ने सीमा बार-बार लांघी। ऐसे में भारतीय सेना नियंत्रण रेखा के पाक क्षेत्र में सक्रिय 42 आतंकवादी शिविरों को ध्वस्त करने का अभियान तो चला ही   सकती थी। लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी हमेशा दिखी। 

जुलाई 2014 के मध्य तक नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा का पाकिस्तान की तरफ से उल्लंघन करने की 54 घटनाएं हुई हैं। मोदी सरकार ने भी यूपीए सरकार की तरह इस तरह की घटनाओं को हॉट लाइन व्यवस्था व फ्लैग मीटिंग जैसी औपचारिक व स्थापित प्रक्रिया के तहत विरोध जताने भर के योग्य मानती रही। भारतीय सेना की जवाबी गोलाबारी तक ही मामला सिमटा रहा। 

स्पष्ट है कि चाहे घाटी का आतंकवाद हो या पाकिस्तान की सेना का बार-बार युद्ध विराम का उल्लंघन, जवानों को दोनों मोर्चे पर जान गंवानी पड़ रही है। उन्हें भरोसा और प्रोत्साहन चाहिए। सेना देश का गौरव होती है। जवानों की मौत पर उदासीनता किसी स्वाभिमानी देश में तो संभव नहीं है। इजराइल का कोई सैनिक मारा जाए तो वहां की सरकार तमाम अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं को दर किनार कर उसका माकूल जवाब देने की तत्पर हो जाती है। इतनी राजनीतिक दृढ़ता तो हमारे देश में भी होनी चाहिए। 

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