Loading... Please wait...

सब्जबाग में उलझी समस्या

1989 से जाटों को आरक्षण के नाम पर उन्हें लगातार सब्जबाग दिखाए जा रहे हैं। केंद्र में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तब राजस्थान में जाटों को आरक्षण देने की शुरुआत की गई। धौलपुर और भरतपुर की पुरानी जाट रियासतों को छोड़ कर राज्य के अन्य भागों में रहने वाले जाटों को आरक्षण का लाभ दे दिया गया। यह सुविधा दिल्ली, उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के जाटों को भी बाद में मिल गई।

2009 के आम चुनाव से पहले यूपीए मंत्रिमंडल ने एक अधिसूचना जारी की जिसमें नौ राज्यों- बिहार, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश व दिल्ली के सभी जाटों को आरक्षण देने का प्रावधान था। इससे जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल करने को कानूनी मान्यता मिल जाती है। लेकिन इस अधिसूचना को पिछड़ा वर्ग आरक्षण संरक्षण समिति ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। मार्च 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी अधिसूचना को रद्द कर दिया। इस फैसले से दलितों व अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों में विद्वेष की मोटी रेखा खिंच गई जिसका समय-समय पर राजनीतिक लाभ के लिए फायदा उठाया गया।

इस प्रकरण में यह सवाल उठा कि क्या न्यायपालिका को विधायिका का फैसला बदलने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी अधिसूचना को खारिज करते हुए जो तर्क दिए उसमें प्रमुख था यह निष्कर्ष कि जाट पिछड़े वर्ग के मापदंड के दायरे में नहीं आते और आर्थिक व राजनीतिक रूप से उनके मजबूत होने की वजह से उन्हें आरक्षण देने से सचमुच जो पिछड़ी जातियां हैं, उनके साथ अन्याय होगा।  बहरहाल, विधायिका और न्यायपालिका के बीच उलझ गए इस मसले ने दिशाहीनता की ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि उसमें जाटों को अपनी मांग मनवाने के लिए हिंसक रास्ता अपनाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। मार्च 2015 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पुनर्निरीक्षण की मोदी सरकार की याचिका अभी विचाराधीन है। यही नहीं तब यानी 31 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में की गई एक और अपील भी खारिज कर दी गई थी कि अधिसूचना जारी होने के बाद आरक्षण कोर्ट से जिन जाट छात्रों का दाखिला हुआ था उसे बहाल रखा जाए। इससे जो असंतोष पैदा हुआ उसे राजनीतिक वादों और उन पर अमल न करने की रीति-नीति ने इस बार इतना भड़का दिया कि पूरा हरियाणा उसकी आग में झुलस गया और उसकी आंच पड़ोसी इलाकों तक महसूस की गई।

मौजूदा महाराष्ट्र के उपद्रव ने आरक्षण को लेकर फिर बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं। उनका जवाब तलाशने से पहले यह पड़ताल करना जरूरी है कि आरक्षण व्यवस्था किन उद्देश्यों के लिए शुरू की गई थी।इस सवाल का जवाब तलाशना भी जरूरी है कि आजादी के बाद समता मूलक समाज को अवधारणा को साकार करने के लिए दलितों और वंचित को आरक्षण देने की जो व्यवस्था लागू की गई थी, वह कई आड़े-तिरछे रास्ते तय करने के बाद वर्ग और जातिगत द्वेष व संघर्ष का मूल क्यों बन गई है?

वोट बैंक की राजनीति ने इस व्यवस्था को अपने फायदे काकैसे जरिया बना दिया? आजादी के समय की परिस्थितियों में संविधान में आरक्षण का प्रावधान अच्छी नीयत से किया गया था। उद्देश्य सदियों से आर्थिक व सामाजिक विकास के चक्र में पिछड़ गए तबको को समान अवसर देना था। दलितों और वंचितों की जो थोड़ी बहुत हैसियत बदली सो बदली, राजनीति करने वालों के हाथ में जरूर एक ऐसा झुनझुना आ गया जिसे बजा कर उन्होंने चुनावी फायदे के लिए जातियों, समुदायों को लुभाना शुरू कर दिया।

इससे आरक्षण एक सुविधा और विशेष अधिकार देने वाले रास्ते के रूप में सभी को मोहने लगा। यह अपने आप में काफी दिलचस्प है कि भारतीय परिस्थितियों में आरक्षण की अवधारणा का सूत्रपात 1756 में ईस्ट इंडिया कंपनी की मद्रास रेजीडेंसी के राज्यपाल लार्ड पैरी ने कंपनी में 32 फीसद नौकरियां गैर ब्राह्मणों को देने के एलान से किया था। पिछड़े और वंचित तबके की सुध 1902 में कोल्हापुर के महाराज शाहू छत्रपति ने उन्हें नौकरियों में पचास फीसद आरक्षण देकर ली।

आजादी के बाद संविधान सभा की बैठक में अनुसूचित जाति को सरकारी नौकरियों, संसद व विधानसभाओं और शैक्षणिक संस्थानों में 15 फीसद और अनुसूचित जनजातियों को सात फीसद आरक्षण देने पर सहमति बनी। आरक्षण से वर्ग गत असमानता दूर नहीं हो सकती, इस दलील पर तब पीएस देशमुख, महावीर त्यागी आदि ने आरक्षण का विरोध किया। सरदार पटेल का तो मानना था कि सामाजिक समरूपता के लिए देश में जागृति लाना जरूरी है। बहरहाल विरोध के बावजूद दस साल के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू कर दी गई। तब पिछड़े व वंचित होने को जाति से जोड़ दिया गया। आर्थिक आधार पर वंचितों को लाभ देने के बारे में विचार ही नहीं हुआ।

दस साल के लिए लागू हुआ आरक्षण तब से जारी है। इसके असर का आकलन करने की जरूरत कभी महसूस ही नहीं की गई। बल्कि उसका दायरा बढ़ता चला गया। आरक्षण की अवधि बार-बार बढ़ाने का प्रस्ताव संसद में हमेशा बिना किसी बहस के ध्वनिमत से पास होता रहा। इस बीच सवर्ण जातियों और दलितों के बीच की जातियों की पहचान करने की कवायद भी शुरू हो गई। जनवरी 1953 में अन्य पिछड़ा वर्ग की पहचान के लिए बनाए गए काका साहब कालेलकर की अध्यक्षता वाले आयोग ने दो साल बाद 2399 जातियों को पिछड़ा माना। इनमें से 837 जातियों को बेहद पिछड़ा बना कर उनके लिए आयोग ने आरक्षण की सिफारिश की।

उस आयोग की सिफारिशों पर तो अमल नहीं हुआ लेकिन आरक्षण को अपना बुनियादी अधिकार मानने की चाहत इससे बढ़ने लगी। बीपी मंडल की अध्यक्षता में 1979 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार ने एक और आयोग बैठाया। आयोग ने 3743 जातियों को पिछड़ा बताया। 1989 में वीपी सिंह सरकार में देश भर में हुए विरोध के बावजूद पिछड़ी जातियों के लिए 27 फीसद आरक्षण की व्यवस्था कर दी। इससे अन्य जातियों को लगने लगा कि आरक्षण ही उनकी समस्याओं का समाधान है। राजनीतिक लाभ के लिए इस चाह को हवा भी दी गई।

आरक्षण का इस्तेमाल अपने वोट बैंक को बढ़ाने के लिए करने की प्रवृत्ति का यह नतीजा है कि पिछले कुछ सालों में हर जाति में आरक्षण की मांग उठने लगी है। संपन्न जातियों के लोग भी आरक्षण की सुविधा में गोते लगाने को आतुर है। इससे संतुलन बुरी तरह गड़बड़ा गया। आज की स्थिति यह है कि पांच हजार से ज्यादा पिछड़ी जातियां है और सभी को आरक्षण चाहिए।  पिछड़ी जातियां कौन सी हैं और उन्हें आरक्षण की जरूरत क्यों है, इसका आकलन कभी नहीं किया गया। न ही यह जानने की व्यवस्था की गई कि जिन पिछड़ी जातियों को आरक्षण की सुविधा दी गई उसका उन्हें कितना लाभ हुआ? आरक्षण जाति के आधार पर दिया जाए या गरीबी को इसका पैमाना बनाया जाए, इस पर भी कभी विचार नहीं हुआ। इसी का नतीजा है कि आरक्षण का कोई मापदंड नहीं बन पाया है। अब आर्थिक आधार पर आरक्षण मुहैया कराने की जो सुगबुगाहट हुई है, उससे भी समस्या का कोई हल निकलने वाला नहीं है।

61 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2018 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech