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बदली रणनीति, बदला नैरेटिव

राहुल गांधी ने हिम्मत दिखाई। चार दुस्साहसी फैसले किए। एक, संसद में सीधे नरेंद्र मोदी पर हमला बोला। राफेल विमान सौदे को घोटाला बताया। दूसरे, अंबानी और रिलायंस पर सीधा हमला बोला। तीसरे, कांग्रेस कार्यसमिति में एलायंस का फैसला लिया। चौथा, यह घोषणा कराई कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लिए मरे नहीं जा रहे हैं। कांग्रेस दूसरी पार्टी के दूसरे नेता को भी बतौर प्रधानमंत्री स्वीकार कर सकती है। ये चारों बातंे मामूली नहीं है। 

इसमें रणनीति के नाते लोकसभा चुनाव में जैसे भी हो, भाजपा के आगे एक उम्मीदवार की कोशिश में कांग्रेस का एलायंस बनाने का एलान ऐतेहासिक है। राहुल गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस कार्यसमिति की यह पहली बैठक थी। जाहिर है बैठक का एजेंडा राहुल गांधी ने सेट कराया था। उस पर सभी सदस्यों ने एलायंस राजनीति की जरूरत बताई तो सीधा अर्थ है कि कांग्रेस में छोटा कार्यकर्ता हो या प्रदेश नेता सब 2019 के लोकसभा चुनाव को एलायंस रणनीति में लड़ने का मन बना चुके हैं। 

इस बात का मतलब है। इससे आगे कांग्रेस में यह नहीं होगा कि यदि बंगाल के प्रदेश कांग्रेस नेता ममता बनर्जी को पसंद नहीं करते है तो वे चुनाव से पहले चख-चख कराए कि तृणमूल कांग्रेस से एलायंस हो या नहीं। ऐसे ही यूपी में भले छह-आठ-दस सीटे मिले लेकिन बसपा-सपा से कांग्रेस का एलायंस गुथ गया है। ऐसे ही महाराष्ट्र में एनसीपी, तमिलनाड़ु में डीएमके आदि से कांग्रेस का एलायंस तय माना जाए।

अब एलांयस इसलिए व्यवहारिक, ज्यादा आसान होगा क्योंकि कांग्रेस ने ममता बनर्जी, शरद पवार, देवगौड़ा, मायावती आदि सभी महत्वकांक्षी नेताओं के लिए यह ऑप्सन बनवा दिया है कि यदि कांग्रेस से सद्भाव के साथ एलायंस बनाएगें तो चुनाव में विपक्षी एलायंस की सबसे बड़ी उभरने वाली पार्टी का आगे समर्थन मिल सकता है। मतलब राज्यवार एलायंस बनाते वक्त सीटों का लेन-देन आसान बनेगा। 

इस रणनीति के साथ राहुल गांधी ने संसद में नरेंद्र मोदी को नीरव मोदी की लूट का साझेदार बता, अनिल अंबानी की रिलायंस-डसाल्ट एविएशन के राफेल सौदे को घोटाला बता कर यह चुनाव नैरेटिव बनवा दिया है कि नरेंद्र मोदी चाहे जितनी सबके विकास की बात करें लेकिन असली विकास तो चुनिंदा गुजराती खरबपतियों का हुआ है। ध्यान रहे अंबानी का क्रोनी पूंजीवाद गांधी-नेहरू-प्रणब मुखर्जी परिवार की बदौलत है और अंबानियों ने आज देश की राजनीति, मीडिया, अफसरी तंत्र को जिस तरह प्रभाव में लिया हुआ है उसमें राहुल गांधी का अंबानी-रिलायंस को कटघरे में ले आना मामूली बात नहीं है। ध्यान रहे दिसंबर 2017 में अनिल अंबानी ने राहुल गांधी को अपनी सफाई में जो पत्र लिखा था उसमें भी आखिर में दुहाई दी थी कि उनके, अंबानी परिवार के तो कांग्रेस से यानी इंदिरा-सोनिया परिवार से कितने घने रिश्ते रहे हैं। 

उस दुहाई का राहुल गांधी पर असर नहीं हुआ और लोकसभा में खम ठोंक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर रॉफेल को स्कैम बता, सरकार को झूठा बता और फिर प्रेस कांफ्रेस से लगातार अंबानी, रिलांयस डिफेंस की पोल खोल का जो सिलसिला शुरू किया वह देश के नैरेटिव को बदलने वाला है!

हां, राहुल गांधी की हिम्मत, मर्दानगी का पर्याय अब नरेंद्र मोदी पर सीधा यह हमला है कि वे देश के चौकीदार नहीं है बल्कि लूट, घोटालों, खरबपतियों की थैलियों को भरवाने में साझेदार है। इसी पर आगे मोदी बनाम राहुल का नैरेटिव बनेगा। राहुल गांधी की 56 इंची छाती बनेगी। मोदी, भाजपा विरोधी जनता में, विपक्ष में, विरोधी नेताओं के बीच, अंतरराष्ट्रीय जमात में राहुल गांधी की यह इमेज बनने लगी है कि कुछ भी हो नरेंद्र मोदी की आंख से आंख मिलाकर उन पर सीधे आरोप लगाने का कोई तो मर्द नेता है भारत में!

और वह भी अपने को पप्पू कहलाते हुए, गले लगते हुए! 

यही आगे नरेंद्र मोदी के लिए गंभीर चुनौती है। तभी लोकसभा की बहस में वे निरूत्तर दिखाई दिए। राहुल गांधी पर जो कहां वह उलटा पड़ा। प्रमाण सोशल मीडिया है। मोदी ने जनता में जवाबी मैसेज दिया कि राहुल का गले लगना उनकी कुर्सी पर झपटा मारने की जल्दबाजी हैं। राफेल पर क्या शर्मनाक बोले जो दो देशों की सरकारों को बयान देना पड़ा या आंख मारने पर ऊंगलिया घूमा कर जवाबी मजाक की तमाम बातों पर बाद में सोशल मीडिया, जनता में इमेज का जो भी विमर्श बना है उसने लोगों के दिल-दिमाग में नरेंद्र मोदी की नहीं बल्कि राहुल गांधी की इमेज को अधिक गहरे पैंठाया हैं!

निश्चित ही इस बात को नरेंद्र मोदी, अमित शाह बखूबी जान रहे होंगे कि अब उनका राहुल गांधी पर ज्यादा फोकस उलटी मार वाला होगा क्योंकि उनके मुंह से जब भी राहुल गांधी का नाम निकलेगा तो लोगों के जहन में गले लगते राहुल गांधी, राफेल को स्कैम बताते, नीरव मोदी की लूट में मोदी की साझेदारी न कि चौकीदारी की बातें, जुमले ध्यान में आएगें। पप्पू का ख्याल नहीं होगा बल्कि मोदी-शाह से सीधे भिड़ने और हर तरह की कोशिश के साथ चुनाव की तैयारी में लोकसभा की बहस का आक्रामक चेहरा तब हर बार उभरेगा जब नरेंद्र मोदी जनसभाओं में राहुल गांधी का नाम लेगें। 

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