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अमित शाह का समझाना

हरि शंकर व्यास

नेता हो या आम आदमी, वह नहीं बूझ सकता कि एक राज्यसभा चुनाव से जमीनी राजनीति को कितनी तरह से प्रभावित किया जा सकता है। यूपी में एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया तो उसे यह मानते हुए मीडियाकर्मियों ने भी यह बात आई गई कि भाजपा तो है ही ऐसी। उस बात के हिंदुओं में क्या अर्थ बने, इसकी थाह बनी ही नहीं। ऐसे ही यदि विपक्षी राजनीति के नंबर एक प्रबंधक और मुस्लिम रहनुमा अहमद पटेल हारते तो गुजरात के हिंदूओं में कैसी हवा बननी शुरू होती, अमित शाह का क्या जलवा बनना शुरू होता इसकी गहराई नहीं बूझी जा सकती। 

बहरहाल, अमित शाह को बाजी के उलटे पड़ने का बडा गम है। तभी उन्होंने दिल्ली आ कर अपने सांसदों को कोई 10-15 मिनट समझाया कि कैसे अहमद पटेल की जीत कांग्रेस की हार है। अमित शाह ने बात को ऐसे लिया मानो यह उनकी निजी हार हो। हिसाब से इसकी जरूरत नहीं है। इसलिए कि अमित शाह ने पूरे देश में, भाजपा में यह मैसेज दिया है कि वे एक-एक सीट के लिए अपने को झौंक देने वाले है। संभव है यह मेरे लिए, आजाद भारत की राजनीति के गवाह और लौकतंत्र में मर्यादा को जरूरी मानने वालों के लिए भले सत्यानाशी एप्रोच हो मगर गुजरात भाजपा को तो अमित शाह ने मैसेज दे डाला है कि कैसे चुनाव लड़ना है। जंग में सब जायज है और जीतना ही है की किलिंग इन्स्टीक्ट उस वक्त बहुत सटीक बनती है जब जमात में खुन्नस और भूख बनी हुई हो।

उस नाते हम आप समझ नहीं सकते है कि गुजरात का आगामी विधानसभा चुनाव कैसी निर्ममता से लड़ा जाना है। 

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