नीतीश व नवीन दोनों एक जैसे!

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और ओड़िशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक दोनों नाम के पहले अक्षर के मुताबिक वृश्चिक राशि के हैं। इस समानता के अलावा दोनों में कई और समानताएं हैं और कुछ असमानताएं भी हैं। पहले असममानताओं की चर्चा करें। नवीन पटनायक को ओड़िशा की सत्ता तश्तरी में परोस कर मिली। उनके पिता बीजू पटनायक ओड़िशा के और देश के बड़े नेताओं में से एक थे। वे भी ओड़िशा के मुख्यमंत्री रहे थे। उनके नाम से पार्टी बना कर नवीन पटनायक पहले चुनाव में ही जीत गए और तब से राज्य के मुख्यमंत्री हैं। इससे उलट नीतीश कुमार की राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है। विधायक बनने से पहले भी वे दो बार चुनाव हारे थे और जब अपनी पार्टी बनाई तो तीन चुनावों में विफलता के बाद उनको बिहार की सत्ता मिली। 1995, 2000 और 2005 के जनवरी में उनकी पार्टी चुनाव लड़ी पर सफलता नवंबर 2005 में हुए चुनाव में मिली। दोनों की असमानता यहां खत्म हो जाती है। उसके बाद सब कुछ एक जैसा है।

नवीन पटनायक ने सन 2000 के बाद से लगातार पांच चुनाव जीते हैं। नीतीश कुमार भी तीन चुनाव जीत चुके हैं। वे 15 साल से बिहार की सत्ता में हैं। उन्होंने एक साल के लिए अपनी पार्टी के जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था। उस अवधि को छोड़ दें तो वे खुद 14 साल मुख्यमंत्री रह चुके। उससे पहले वे कई बरसों तक केंद्र में मंत्री रहे हैं। बिहार के एक दूसरे नेता लालू प्रसाद कहा करते थे कि वे 20 साल राज करेंगे पर नीतीश कुमार ने बिना ऐसा कुछ कहे 20 साल से ज्यादा राज किया है। पहले केंद्र में मंत्री के तौर पर और फिर बिहार में मुख्यमंत्री के तौर पर। अगर वे इस बार जीतते हैं तो नवीन पटनायक की तरह नया रिकार्ड बनाएंगे।

दोनों में एक समानता यह भी है कि कामकाज का दोनों का रिकार्ड लगभग एक जैसा ही है। दो पिछड़े राज्यों में लगातार दशकों तक राज करने के बाद दोनों मुख्यमंत्री विकास का कोई पैमाना नहीं गढ़ सके। ओड़िशा से आज भी यह खबर पढ़ने को मिलती है कि बीमार का इलाज नहीं हो सका और मरने के बाद शव ले जाने के लिए भी एंबुलेंस नहीं मिल सका। कोई चार साल पहले 2016 में कालाहांडी के लक्ष्मीपुर जिले में एक व्यक्ति अपनी पत्नी का शव लेकर दस किलोमीटर पैदल चला था। उसके साथ उसकी बेटी भी थी। इस घटना पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया हुई थी, जिसके बाद राज्य सरकार ने कहा था कि अब ऐसा नहीं होगा। पर दो साल के बाद 2018 में गजपति जिले में एक व्यक्ति को अपनी बेटी का शव बोरे में रख कर पोस्टमार्टम के लिए रिक्शे से अस्पताल तक ले जाना पड़ा क्योंकि पुलिस कोई शव वाहन नहीं उपलब्ध करा पाई। इसके दो साल के बाद फिर यहीं खबर पढ़ने को मिली है। ओड़िशा के बेरहमपुर के एमकेसीजी अस्पताल में 19 फरवरी को एक चंद्रमा नाम की एक गरीब महिला की मौत हो गई। उसकी बेटी संतोषिनी बेहरा को शव वाहन नहीं मिल पाया तो वह अपनी मां का शव रिक्शे में लेकर गई।

सोचें, साढ़े चार करोड़ की आबादी वाले ओड़िशा में 20 साल से एक पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार है और एक ही व्यक्ति लगातार मुख्यमंत्री है। इसके बावजूद गरीबी का आलम यह है कि जिला अस्पतालों में शव वाहन या एंबुलेंस उपलब्ध नहीं है। खनिज संपदा से संपन्न इस राज्य में अगर नेतृत्व के पास विजन होता तो आज ओड़िशा देश का सबसे आधुनिक, विकसित और संपन्न राज्य होता। ओड़िशा में किसी चीज की कमी नहीं है। मेहनत करने वाले लोग हैं, वन संपदा है, खनिज संपदा है और समुद्र किनारे होने की वजह से बंदरगाह भी हैं तब भी प्रदेश देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शुमार है। एबसोल्यूट पॉवर्टी अगर कहीं है तो वह ओड़िशा में है। कामकाज की तलाश में देश भर में भटकते ओड़िशा के लोगों को देख कर भी इसका अंदाजा लगता है।

कमोबेश यहीं स्थिति बिहार की है। हालांकि बिहार में खनिज संपदा नहीं है, वन संपदा भी नहीं है और यह चारों तरफ से जमीन से घिरा राज्य है। फिर भी 15 साल के नीतीश कुमार के राज्य में विकास के नाम पर सिर्फ इतना हुआ कि बच्चियों को पोशाक मिली और साइकिल दी गई। न कहीं स्कूल-कॉलेज बनें हैं, न पुराने स्कूलों की दशा सुधरी है, न अच्छे शिक्षकों की बहाली हुई है, न अस्पताल बने हैं और न पूरे प्रदेश में एक भी फैक्टरी बनी है। दशकों से बंद पड़ी कोई फैक्टरी चालू नहीं हो पाई है। राष्ट्रीय स्तर पर नीतीश कुमार की सुशासन की छवि के अभूतपूर्व प्रचार के बावजूद कोई नया उद्योग धंधा बिहार में नहीं लगा और न पलायन रूका। आज भी बिहार के हजारों लोग हर दिन नौकरी की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते हैं और देश भर के तमाम कोचिंग संस्थान और निजी शिक्षण संस्थान बिहार के छात्रों के दम पर चल रहे हैं। दिल्ली के एम्स या चेन्नई के शंकर नेत्रालय तक जाकर देखें तो बिहार के मरीजों की भरमार मिलेगी।

शिक्षा और स्वास्थ्य की पूरी व्यवस्था फेल है। नीतीश कुमार के लिए चुनाव रणनीतिकार के तौर पर काम कर चुके प्रशांत किशोर ने 18 फरवरी को अपनी प्रेस कांफ्रेंस में विकास के सभी पैमानों पर नीतीश के 15 साल के कामकाज की विफलता गिनाई। उन्होंने बताया कि हर घर तक बिजली पहुंच गई पर बिजली उपभोग में बिहार सबसे पीछे है। एकमात्र यह आंकड़ा यह बताने को काफी है कि बिहार में कैसी गरीबी है। शिक्षा के पैमाने पर बिहार 2005 में भी सबसे नीचे थे और 15 साल बाद भी नीचे से दूसरे स्थान पर है। 15 साल के बाद भी नीतीश और उनकी पार्टी के लिए चुनाव जीतने का तरीका यहीं है कि लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के 15 साल पुराने राज को गाली दी जाए और सोशल इंजीनियरिंग के दम पर चुनाव लड़ा जाए। लालू का भय दिखा कर और जातियों का गणित ठीक करके अब तक चुनाव जीतते रहे नीतीश फिर इसी रास्ते पर चल कर चुनाव जीतने की उम्मीद कर रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares