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भाजपा सहयोगियों के बदले तेवर!

हरि शंकर व्यास

पिछले साढ़े तीन साल से बिना शर्त सरकार और भाजपा का समर्थन कर रही सहयोगी पार्टियों के तेवर बदले हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण तक भाजपा के सहयोगियों ने तीन तलाक बिल पर सरकार के साथ असहयोग दिखाया है और कई दूसरे मसलों पर भी विरोध किया है। भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी अकाली दल को यह बात बुरी लगी है कि बगल के राज्य हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री के शपथ समारोह में उसको नहीं बुलाया गया। पहले तो गुजरात में भी सरकार शपथ लेती थी तो बुलाया जाता था। अकाली दल ने हिमाचल में नहीं बुलाए जाने से पहले ही गुजरात के चुनाव नतीजों को लेकर भाजपा के ऊपर निशाना साध लिया था। अकाली नेता और पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखबीर बादल ने कहा कि गुजरात में लोगों ने भाजपा को उसके अहंकार के लिए सबक सिखाया है। 

इसी से मिलती जुलती बात दूसरी सबसे पुरानी सहयोगी शिवसेना ने भी कही। शिवसेना वैसे तो हर दिन सरकार के ऊपर हमले कर रही है, पर गुजरात चुनाव के प्रचार और नतीजों के बाद वह भाजपा का विरोध करते करते राहुल गांधी का समर्थन करने लगी। शिवसेना ने गुजरात में असली विजेता राहुल गांधी को बताया। इसके बाद संसद के शीतकालीन सत्र में शिवसेना के साथ साथ तेलुगू देशम पार्टी ने भी तीन तलाक बिल पर विपक्ष जैसा रवैया दिखाया। हर मामले में सरकार का साथ देने वाली टीडीपी ने भी कांग्रेस की हां में हां मिलाते हुए कहा कि तीन तलाक बिल को प्रवर समिति में भेजा जाए। सरकार का साथ देने वाली अन्ना डीएमके ने भी इसे प्रवर समिति में भेजने का समर्थन किया। विपक्ष से ज्यादा सहयोगियों का विरोध भाजपा के लिए हैरान करने वाला था। 

बिहार और उत्तर प्रदेश के सहयोगियों की नाराजगी भी बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनाव में टिकट बंटवारे से नाराज अपना दल ने चुनाव लड़ने से इनकार किया तो दूसरी सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ा। बाद में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी गुजरात भी चुनाव लड़ने पहुंच गई, जबकि इसके नेता उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार में मंत्री हैं। इन दोनों पार्टियों की नाराजगी अभी खत्म नहीं हुई है। 

बिहार और झारखंड की तीन सहयोगी पार्टियां इन दिनों भाजपा से नाराज हैं। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी खुल कर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। उनकी पार्टी इस बात से परेशान है कि केंद्र में साढ़े तीन साल से भाजपा की सरकार होने के बावजूद मांझी को कुछ नहीं मिला। उन्हें राज्यसभा में भेजने से लेकर राज्यपाल बनाने तक तरह की कई चर्चा हुई थी। केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने खुल कर नाराजगी तो नहीं जताई है पर पार्टी के कई नेता मान रहे हैं कि नीतीश कुमार के साथ गठबंधन होने के बाद स्थिति बदली है। तभी विपक्षी पार्टी के नेता लालू प्रसाद ने उनके सामने कुशवाहा समाज को ज्यादा टिकट देने का प्रस्ताव रखा है। इसी तरह झारखंड में आजसू के तेवर तीखे हुए हैं। कुड़मी समाज को आदिवासी का दर्जा दिलाने के आंदोलन के बहाने आजसू नेता सुदेश महतो अपने तेवर दिखा रहे हैं। भाजपा और आजसू में तनातनी चल रही है।  

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