गवर्नेंस एजेंडा कहां है?

दिल्ली के चुनाव नतीजों के बाद अमित शाह ने ईमानदारी से स्वीकार किया कि भारत-पाकिस्तान की बात करना या गोली मारो जैसे नारे देने से भाजपा को नुकसान हुआ है। शाहीन बाग को करंट लगाने वाले अपने बयान का बचाव करते हुए शाह ने कहा कि उन्होंने चुनावी करंट की बात कही थी। अब उन्होंने चाहे जिस करंट की बात कही हो पर यह जरूर सही है कि शासन, प्रशासन और कामकाज की बातों से हट कर बेकार की बातें करने से भाजपा को नुकसान हुआ। भाजपा के पास कोई चेहरा ऐसा नहीं था, जिसके पास गवर्नेंस का अनुभव हो और न सरकार की ओर से गवर्नेंस का कोई एजेंडा था। दिल्ली के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने कह दिया कि अरविंद केजरीवाल सरकार के मुकाबले पांच गुना ज्यादा सब्सिडी देंगे। यह बात किसी को कैसे हजम हो सकती है! क्या भाजपा एक हजार यूनिट बिजली फ्री दे देती? भड़काऊ बातों के साथ साथ ऐसी अगंभीर बातों ने भी पार्टी का नुकसान किया।

असल में भाजपा दिल्ली को समझ नहीं पाई। उसे सबसे पहले इस बात का अध्ययन करना चाहिए कि शीला दीक्षित ने कैसे 15 साल राज किया। वे राजनीति भी करती रहीं और पार्टी के सारे पुराने दिग्गज नेताओं को एक एक करके निपटा दिया। पर दिल्ली के लोगों को भरोसा दिलाया कि वे बेहतरीन शासन देने वाली एक कुशल प्रशासक हैं। उनके आने से पहले दिल्ली में बिजली की हालत खराब थी, पानी की स्थिति भी बहुत खराब थी, यातायात की सेवा बदतर थी, डीजल बसों का प्रदूषण चरम पर था। उन्होंने अपने गवर्नेंस मॉडल से लोगों को यकीन दिलाया वे इन समस्याओं को दूर कर देंगी। उन्होंने इसके लिए ईमानदार प्रयास किए। हालांकि वे पहले सीएनजी के खिलाफ थीं पर जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से इसे लागू करना पड़ा तो बड़ी ईमानदारी और मेहनत के साथ इसे लागू किया। उन्होंने दिल्ली में हरित इलाका बढ़ाया और मेट्रो का भी भरपूर विस्तार किया। उनके मुख्यमंत्री रहते केंद्र में छह साल तक भाजपा की सरकार रही पर कभी केंद्र के साथ उनका टकराव नहीं हुआ।

शीला दीक्षित ने जब सारी बुनियादी समस्या कमोबेश हल कर दी तब अरविंद केजरीवाल आए और उन्होंने शीला दीक्षित के बनाए बुनियादी ढांचे से मिलने वाली सारी सुविधाएं एक बड़े वर्ग को मुफ्त में देने का वादा कर दिया। इस तरह उन्होंने अपना गवर्नेंस का एक मॉडल बनाया। पांच साल इस पर अमल करके दिखाया और लोगों का भरोसा जीता। इसके मुकाबले भाजपा के पास क्या गवर्नेंस का मॉडल है? यह लोगों की स्मृति में है कि भाजपा ने दिल्ली के अपने पांच साल के शासन में तीन मुख्यमंत्री बदले और गवर्नेंस का कोई मॉडल नहीं बनाया।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का कामकाज गवर्नेंस का एक मॉडल हो सकता था पर बहुत होशियारी से अरविंद केजरीवाल ने पांच साल में यह स्थापित किया कि केंद्र की सरकार उप राज्यपाल के जरिए उनको कामकाज से रोक रही है। उन्होंने कानून व्यवस्था के मसले पर भी केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किए रखा। इसके अलावा नोटबंदी से लेकर जीएसटी और अब नागरिकता कानून की वजह से केंद्र का एक अलग ही मॉडल सामने आया, जिसे गुड गवर्नेंस का मॉडल नहीं कहा जा सकता है। नोटबंदी, जीएसटी और नागरिकता पर भी केजरीवाल को अपनी ओर से कोई कैंपने चलाने की जरूरत नहीं पड़ी। यह अपने आप अखिल भारतीय मुद्दा बना और बाकी सारी पार्टियों ने इस पर लोगों को जागरूक किया। इसका फायदा अपने आप केजरीवाल को दिल्ली में मिला।

पर यह सिर्फ दिल्ली की बात नहीं है, पूरे देश में भाजपा गुड गवर्नेंस का कोई मॉडल नहीं स्थापित कर पाई है। जो चेहरे या जो मुख्यमंत्री इसका प्रतीक हो सकते थे, उन्हें पार्टी ने हाशिए में रखा है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान गुड गवर्नेंस देने वाले मुख्यमंत्री के तौर पर दिल्ली में प्रचार में उतारे जा सकते थे पर भाजपा ने उनकी बजाय विभाजनकारी एजेंडा चलाने वाले नेताओं से प्रचार कराया। असल में भाजपा की समस्या यह है कि वह चुनाव जीतने के लिए गवर्नेंस की जरूरत नहीं समझ रही है। उसे लग रहा है कि सिर्फ राजनीतिक मुद्दों से चुनाव जीता जा सकता है। यह अधूरी सचाई है। राजनीतिक मुद्दों से विपक्षी पार्टी चुनाव जीत सकती है, जो सरकार में है उसे अपने कामकाज का मॉडल पेश करना होगा।

जैसे नरेंद्र मोदी ने गुजरात में मुख्यमंत्री रहते जो काम किए उसे उन्होंने गुजरात मॉडल की तर्ज पर पूरे देश में इस्तेमाल किया। इसका उनको फायदा मिला। पर अब गुजरात गाथा कहीं नहीं सुनाई दे रही है। उम्मीद की जा रही थी कि उसी तर्ज पर मोदी भारत गाथा लिखेंगे, लेकिन देश के शासन का कोई ऐसा मॉडल नहीं बना, जिस पर लोगों को यकीन दिला कर उन्हें राज्यों में भाजपा के लिए वोट करने को प्रेरित किया जा सके। गवर्वेंस का एजेंडा नहीं होना भाजपा के लिए दिल्ली में भारी पड़ा और दूसरे राज्यों में भी। आगे भी अगर अपने राजनीतिक एजेंडे के साथ साथ भाजपा ने गुड गवर्नेंस और किसी अच्छे, पुण्यता वाले प्रशासक का चेहरा आगे नहीं करेगी तो उसकी मुश्किलें खत्म नहीं होंगी।

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