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चाय नहीं इस दफा पकौड़े पर चर्चा!

चार साल पहले चाय के उबाल ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने में मदद की थी। पूरे देश में चाय पर चर्चा हुई थी। नरेंद्र मोदी, भाजपा और संघ ने विमर्श बनवाया था कि एक चाय बेचने वाला देश का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है। मोदी की पिछड़ी जाति और चाय बेचने की पृष्ठभूमि का बखूबी राजनीतिक इस्तेमाल हुआ। वैसे ही अंदाज में कुछ इस बार चुनाव से ठिक एक साल पहले पकौड़ा विमर्श शुरू हुआ है। सवाल है कि क्या पकौड़ा रोजगार पर चल रही चर्चा से भाजपा को फायदा होगा या यह बहस उलटी पड़ने वाली है?

शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी न्यूज को दिए इंटरव्यू में की थी पर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने राज्यसभा में दिए अपने पहले भाषण में इस विमर्श को राजनीतिक परिचर्चा के तौर पर मजबूती से स्थापित किया है। मोदी ने रोजगार के सवाल पर कहा था कि उनकी सरकार स्वरोजगार को बढ़ावा दे रही है। इसी संदर्भ में उन्होंने आगे कहा – जी टीवी के सामने ठेला लगा कर पकौड़े बेचने वाला भी दो सौ रुपए कमा कर ले जा रहा है, क्या यह रोजगार नहीं है?

इसके बाद जो बहस चली वह अभी तक जारी है। पिछले हफ्ते राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा की शुरुआत करते हुए अमित शाह ने कहा – सम्मान के साथ पकौड़े बेचना कोई अपमान की बात नहीं है, बल्कि उसकी तुलना भिक्षुक से करना अपमान की बात है। ध्यान रहे कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने कहा था कि अगर पकौड़े बेचना रोजगार है तो भीख मांगना भी रोजगार है। इसको अपना ट्विस्ट देते हुए भाजपा ने कहा कि चिदंबरम ने पकौड़े की तुलना भीख मांगने से की है। बाद में चिदंबरम ने जब राज्यसभा में बजट पर चर्चा की शुरुआत की तो तंज करते हुए कहा कि सरकार को चाहिए कि वह पकौड़े तलने को अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, आईएलओ के श्रम मानकों में रजिस्टर कराए। 

संसद की बहस के अलावा भाजपा और कांग्रेस में सड़क पर भी पकौड़ा बेचने की जंग छिड़ी है। कांग्रेस के नेता ठेला लगा कर पकौड़े बेच कर इसका मजाक उड़ा रहे हैं तो भाजपा के नेता इसे स्वरोजगार के बढ़ते अवसर के तौर पर दिखाने के लिए पकौड़े की रेहड़ी लगा रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि भाजपा के नेताओं ने प्रधानंमत्री मोदी की कही बात को पत्थर की लकीर मान कर उसे सही साबित करने की मुहिम छेड़ी है। कायदे से इसकी जरूरत नहीं थी। केंद्र सरकार के तीन साल पूरे होने के मौके पर इसी से मिलती जुलती बात अमित शाह ने कही थी। उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार ने आठ करोड़ स्वरोजगार के अवसर बनाए हैं।

इससे सरकार खुद ही रोजगार के सवाल पर अपने जाल में उलझ रही थी। स्वरोजगार के अवसर पैदा करने या पकौड़ा बेचने की सलाह देकर भाजपा नेता अपने लिए मुश्किल बुला रहे हैं। क्योंकि अंततः यह देश के करोड़ों बेरोजगारों का अपमान है। जिन बेरोजगारों को सम्मान की नौकरी दिलाने का वादा करके मोदी पिछला चुनाव जीते थे उनको अब वे पकौड़े की दुकान खोलने की सलाह दे रहे हैं। उनके भाषणों के वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें वे हर नौजवान को उसकी योग्यता कि हिसाब ने नौकरी देने की बात कर रहे हैं। जबकि अब उनकी पार्टी पकौड़ा बेचने को सम्मान की बात बता रही है। अमित शाह ने अपने भाषण में कहा कि बेरोजगार रहने से अच्छा है पकौड़े बेचना। इससे जाहिर है कि वे खुद यह मान रहे हैं कि सरकार बेरोजगारी दूर करने या बेरोजगारों को काम देने में विफल रही है। शिक्षित और प्रशिक्षित बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है। सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों में कटौती हो रही है। सिर्फ लोक सेवा आयोग, यूपीएससी की ओर से अखिल भारतीय सेवा के लिए निकाली जाने वाली वैकेंसी में 2014 के मुकाबले 2018 में 40 फीसदी की कमी आ गई है। निजी क्षेत्र में छंटनी का दौर चल रहा है और निजी कंपनियां थोक के भाव बंद हो रही हैं। सरकार निजी निवेश लाने में विफल रही है। सरकारी खर्च के दम पर बुनियादी ढांचे में सुधार के काम चल रहे हैं, लेकिन अब उसकी भी सीमाएं दिखने लगी हैं।

ऐसे में बेरोजगारों के लिए पकौड़े की दुकान लगाने का सुझाव भाजपा के लिए भारी पड़ सकता है। वह भी तब जबकि सरकार ने पकौड़े बनाने या दूसरे किसी स्वरोजगार के लिए कोई अतिरिक्त कानूनी या वित्तीय उपाय नहीं किए हों। ऐसा नहीं है कि अब छोटे स्वरोजगार के लिए आसानी से कर्ज मिलने लगा है या पकौड़े बेचने के लिए जरूरी बेसन, तेल और गैस की कीमतें कम हो गई हैं या पुलिस और नगरपालिका के कर्मचारियों की वसूली बंद हो गई है। फिर सदियों से चली आ रही स्वरोजगार की व्यवस्था का श्रेय लेने की सोच को क्या कहा जा सकता है! तभी टेलीविजन चैनलों ने पकौड़े बेचने वालों से कई जगह बात की। सबने यह तो माना कि वे मेहनत करके सम्मान से अपना जीवन चला रहे हैं, लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि वह अपने बच्चों से भी यहीं काम कराना चाहता है। सब चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी करें। इसी का वादा भी प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर मोदी ने किया था, लेकिन अब वे और उनकी पार्टी नौकरी व संगठित रोजगार को पकौड़े बेचने के विमर्श में बदल रही है। 

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