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गुजरात चुनाव की चिंता!

गुजरात नरेंद्र मोदी का प्रदेश है। भाजपा का गढ़ है। गुजराती अस्मिता के प्रतीक के नाते भी गुजरातियों के बीच बतौर प्रधानमंत्री मोदी की अजेय धमक बनती है। फिर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी गुजरात में चुनाव, एक-एक बूथ के अनुभवी जानकार है। इसलिए इस बात की तुक नहीं बनती है कि गुजरात के विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी-अमित शाह दिन-रात एक करेंगे। हिसाब से इन दोनों के बिना प्रचार के ही भाजपा को मजे से विधानसभा चुनाव जीतना चाहिए। तब मैं क्यों लिख रहा हूं कि कैबिनेट फेरदबल के बाद गुजरात के चुनाव में दोनों पूरी ताकत लगाएगें। 

कई कारण है। एक तो शिद्दत से चुनाव लड़ना नरेंद्र मोदी-अमित शाह की आदत-स्वभाव है। ये चुनाव लड़ा कर, लड़ कर ही नेता बने हैं। दूसरे, गुजरात में चुनाव लड़ने की भाजपा-संघ की मशीनरी का मतलब नरेंद्र मोदी-अमित शाह है। वहां दूसरा कोई न तो अब है और न किसी दूसरे को बनने दिया गया है। पार्टी में कोई दूसरा जननेता, जातिनेता है ही नहीं जो भाजपा को चुनाव लड़ा सके। नरेंद्र मोदी ने अपने पर निर्भर इस मॉडल को बहुत कायदे से वैसे ही गुजरात में पैंठाया है जैसे वे अब अखिल भारतीय स्तर पर पैंठा रहे है। मैं हू तो वोट है और इसलिए मेरी सत्ता है का फार्मूला क्योंकि दिल्ली में शिफ्ट हुआ है सो मुख्यमंत्री विजय रूपानी या आनंदीबेन पटेल, नीतिन पटेल आदि कोई भी गुजराती नेता अपने बूते या सामूहिक नेतृत्व से भाजपा को वहां चुनाव नहीं जीतवा सकता। 

इसलिए गुजरात का विधानसभा चुनाव सौ टका नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा जाएगा। वे प्रधानमंत्री है। गुजरात के गौरव है इसलिए रिकार्ड तोड़ बहुमत से गुजराती भाजपा को जीताएं, यह कोर प्रचार बिंदु होगा। और इस चुनौती में गंभीर पहलू यह है कि यूपी में जब आंधी हुई तो गुजरात में उससे कम आंधी क्यों होनी चाहिए?  तभी अमित शाह ने गुजरात में 150 प्लस सीटों की जीत का लक्ष्य तय किया है।  

गुजरात में अब यह इसलिए मुश्किल भरा है क्योंकि वहा भाजपा बनाम कांग्रेस में सीधी आमने-सामने की लड़ाई है। वहां यूपी की तरह  विपक्ष बंटा हुआ नहीं है। दूसरे, पिछले तीन सालों में पटेलों के आरक्षण आंदोलन ने जमीनी समीकरण गड़बड़ा दिए है। कैसे? यह तथ्य दो टूक है कि 1998 से लगातार सत्ता में रहने के बावजूद इस प्रदेश में कांग्रेस के अभी भी कोई 39 प्रतिशत वोट कट्टर है। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की रिकार्ड आंधी में भाजपा ने सभी 26 सीटे जीती और 59 प्रतिशत वोट पाएं तब भी विपक्षी वोट 41 प्रतिशत थे। तब चुनाव में आप भी सीन में थी और कांग्रेस ने 33 प्रतिशत वोट पाए थे। 

आज आप खत्म है। वहा शायद ही अरविंद केजरीवाल चुनाव लड़ने जाए। दूसरे जनता दल यू और एनसीपी कुछ सीटों पर वोट कटवा का जो रोल अदा करते थे वह ताजा राज्यसभा चुनाव के बाद खत्म है।

इसलिए गुजरात में विधानसभा का अगला चुनाव 1998 के बाद आमने-सामने का सर्वाधिक विकट होगा। इस बात की बैकग्राउंड में 2015 के लोकल ब़ॉडी चुनाव के आंकड़े भी गौर करने लायक है। उस चुनाव ने याद करा दिया था कि मोदी-शाह के गुजरात छोड़ने के बाद भाजपा की जमीन खिसकी है। बतौर मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल बुरी तरह फ्लॉप है। तभी न चाहते हुए भी व अधबीच मुख्यमंत्री नहीं बदलने की सोच के बावजूद नरेंद्र मोदी ने आनंदीबेन का इस्तीफा करवाया। अमित शाह को कमान सुपुर्द करते हुए उनके खास विजय रूपानी को मुख्यमंत्री बनाया गया। 

अब विजय रूपानी जैन है। उनका एक-डेढ़ प्रतिशत वोटों पर भी असर नहीं होगा। फिर आज तो सूरत का साड़ी व्यापारी हो या राजकोट का मूंगफली व्यापारी सब नोटबंदी, जीएसटी के मारे हुए है। 

बहरहाल 2015 के नगरपालिका, पंचायत चुनाव में कांग्रेस ने एकदम ऐसा उछाला मारा कि आनंदीबेन की छुट्टी हुई।   

अब इन चुनावों के आंकड़ों पर गौर करें। 2010 में जिला पंचायत चुनाव में भाजपा को 50 प्रतिशत और कांग्रेस को 44 प्रतिशत वोट मिले थे। 2015 के चुनाव में ये वोट भाजपा के घट कर 44 और कांग्रेस के बढ़ कर 48 प्रतिशत हुए। ऐसे ही ताल्लुका पंचायत चुनाव में कांग्रेस के 42 से बढ़ 46 प्रतिशत वोट हुए तो भाजपा के 48 से घट 42 प्रतिशत वोट रह गए। यों गुजरात के देहात में कांग्रेस की पैंठ पुरानी है और भाजपा के परचम का कारण शहरी आबादी है। पर 2015 के लोकल बॉडी चुनाव में कांग्रेस ने शहरों में भी भाजपा को हैरान किया। 2010 में नगरपालिकाओं के चुनाव में भाजपा के वोट 48 प्रतिशत वोट थे वे 2015 में घट कर 45 प्रतिशत हुए।  वहीं कांग्रेस का वोट जो 30 प्रतिशत था वह बढ़ कर 40 प्रतिशत हुआ। और तो और राजकोट, अमदाबाद जैसे महानगरपालिका चुनाव में भी 2015 में कांग्रेस ने अपना वोट 33 प्रतिशत से बढा कर 41 प्रतिशत किया। वहीं भाजपा का दबदबा 52 प्रतिशत की जगह 50 प्रतिशत वोटों का हुआ। 

मतलब मई 2014 की लोकसभा चुनाव की सुनामी के बाद 2015 मे गुजरात में लोकल बॉडी के जो चुनाव हुए वे भाजपा के प्रदेश नेताओं की असफलता और प्रदेश सरकार की घटी पकड का प्रमाण है। यह आंकडा ध्यान रहे कि विधानसभा चुनाव की कसौटी में सन्, 2002, 2007, 2012 में कांग्रेस की सीटे क्रमशः 51-59 और 61 हुई और तीनों चुनाव में वोट प्रतिशत कोई 39 प्रतिशत। ऐसे ही भाजपा की इन तीन चुनावों में सीटों की संख्या 182 में से क्रमशः 127, 117 और 115 रही और वोट प्रतिशत रहा क्रमशः 50, 49 व 48 प्रतिशत। 

सो लोकसभा के 2014 के अपवाद को छोड़ गुजरात में भाजपा और कांग्रेस का वोट आधार लगभग स्थिर रहा है पर भाजपा के वोटों में क्रमशः छोटी ही सही कमी आती गई है। और 2015 के पंचायत-नगरपालिका चुनाव में भाजपा एकदम गिरने की तरफ बढ़ी। 

तभी मुख्यमंत्री को बदलने का फैसला हुआ। 

और अब टारगेट यह है कि भाजपा 150 प्लस सीट जीते तो अनिवार्य है कि आगे मोदी-शाह चौबीसो घंटे गुजरात चुनाव की चिंता करें। 

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